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नीतिश राज का काला चेहराः राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता का घर जलाया, बेरहमी से पीटा

राजीव कुमार झा 

आबादी का एक बड़ा हिस्सा महंगाई और बेरोजगारी की मार से रोटी, कपड़ा और मकान की जुगत में परेशान हैं. कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बेवजह, बेआधार किसी न किसी राजनीतिक फायदे के लिए कानून को अपने हाथ में लेकर न केवल अशांति फैला रहे हैं बल्कि अराजकता का माहौल कायम करने में सफल भी हो रहें हैं.

बिहार के भोजपुर में रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्म्मेश्वर मुखिया की ह्त्या के बाद उपजे अनैतिक अराजकता, मोतिहारी में एक 23 वर्षीय  सब्जी व्यापारी वीरेन्द्र की कथित ह्त्या के बाद हुआ भयंकर उपद्रव और ऐसे ही कई मामले जो खबर नहीं बन सके इस बात के उदाहरण है कि कैसे आसानी से राजनीतिक फायदों के लिए समाज में अशांति फैलाई जा सकती है. ये छोटे-बड़े घटना-क्रम हमें न केवल किसी बड़ी अनहोनी की चेतावनी दे रहें हैं बल्कि सरकार एवं प्रशासन की नाकामी अथवा उदासीनता के प्रमाण भी है. पिछले दो वर्षों में राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की घटनाओं में हुआ इजाफा चिंतनीय है.

बीते 2 जून  की रात मोतिहारी ज़िले के हरियन चपरा मठिया गांव में एक सब्जी व्यवसाई विरेन्द्र साह की कथित ह्त्या के विरोध में 4 जून को जो हुआ वह जिले के इतिहास में काले दिवस के रूप में याद किया जाएगा. हालांकि ब्रह्म्मेश्वर मुखिया की ह्त्या की “सनसनी” में ये घटना नजरअंदाज कर दी गई.

मृतक विरेन्द्र की बहन बताती हैं कि 2 जून की रात को जब विरेन्द्र  घर  आया तो  उसने खाना नहीं खाया. फिर शौच के लिए वह बाहर गया. शौच के लिए बाहर गए विरेन्द्र को उसके आसपास के लोगों ने ही पिट-पिट मार डाला. मृतक के परिजनों के आरोपों के मुताबिक इस घटना को अंजाम देने वालो में सेवानिवृत दरोगा कृष्णनंदन राय एवं उनके परिजन और सेवा निवृत सैनिक सईद शामिल हैं. हमलावरों ने ही रात वीरेन्द्र की बहन को बताया कि वो जा कर अपने भाई को देख ले. जब वीरेन्द्र की बहन और उसके परिजन वहां पहुचे तब तक वह मर चुका था.

अगले दिन सुबह के लगभग पांच बजे लोगों को घटना का पता चला. स्थानीय प्रशासन भी मौके पर पहुंचा लेकिन घटना को गंभीरता से नही लिया. चंद घंटों में ही लोगों कि संख्या दो सौ तक पहुंच गई. कुछ ही देर में भीड़ आपे से बाहर हो गई और लूटपाट और आगजनी शुरू कर दी. गुस्साए लोगों ने (इसमें ज्यादातर वैसे लोग शामिल थे जिनकी मंशा हिंसा और स्वार्थ सिद्धि थी) सेवानिवृत दारोगा राय के घर पर तोड़ -फोड की, सईद हुसैन के घर में ही उनके परिवार वालों को बंद कर आग लगा दी गई. हालांकि डीएसपी सरोज ने उन लोगों को बाहर निकाला और जान बचाई. कई मोटरसाईकल जला दी गईं.

हिंसा के इस क्रम में उत्पातियों ने राष्ट्रपति अवार्ड विजेता आविष्कारक सईदुल्लाह, उनकी पत्नी और उनके बेटे को भी नहीं बख्शा. न केवल उनकी बेरहमी से पिटाई की बल्कि भयंकर लूटपाट भी की. इस से पहले कि पुलिस उपद्रवियों को अपने काबू में करती वो अपनी मंशा और उद्देश्य अंजाम तक पहुंचा चुके थे.

निसंदेह ऐसी छोटी-बड़ी घटनाएं देश के अलग-अलग हिस्सों में रोज होतीं रहती हैं लेकिन यह छोटी सी घटना हमें बहुत सी बातें सोचने पर मजबूर करतीं हैं. घटना स्थल पर जा कर वहा के कई लोगों और पीड़ितों से बातचीत करने पर कई और तथ्य मिले.

सबसे पहले तो यह स्पष्ट करना जरुरी है विरेन्द्र की मौत  चाहे जैसे भी हुई हो, यह ह्त्या हो अथवा स्वाभाविक मौत (लोगों का यह भी कहना है कि वह शराब का सेवन भी काफी करता था) वो उन तमाम गरीब और निचले तबके के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जो समाज के हाशिए पर हैं. इस तबके के घरों तक आज भी सरकार की कोई भी योजना चाहे वह शुलभ शौचालय हो अथवा इंदिरा आवास नहीं पहुंच पाई है. इन योजनाओं पर अरबों रुपये खर्च कने का सरकार जो दावा करती है वह वीरेन्द्र जैसे गरीबों तक किस हद तक पहुंचती है यह बताने की जरूरत नहीं. शौच के लिए किसी गरीब की ह्त्या का यह मुद्दा चम्पारण हीं नहीं बल्कि पुरे देश के लिए शर्मनाक है.

दूसरी बात यह कि दिखी की ह्त्या के दो दिन बाद (क्यूंकि यह घटना 2 जून की रात के लगभग एक बजे की है) स्थानीय समाचार पत्रों में यह खबर छाई रही. लेकिन खबरों पर गौर करें तो ऐसा लगा कि पहले उपद्रवियों की ताकत का फिर और प्रशासन का हीं महिमामंडन किया गया था. मीडिया का यह मुखौटा पीडितों के जले पर नमक छिडकने का काम कर गई. बिहार की पत्रकारिता कहां जा रही है यह यहां के समाचार पत्रों का साप्ताहिक आकलन कर सहज हीं जाना जा सकता है.

कभी अपने नए नए विचित्र आविष्कारों से विज्ञान जगत को अपनी ओर आकर्षित करने वाले और मोतिहारी के मोतीझील में पानी में साईकल चला कर सबको चौंका देने वाले और चम्पारण को राष्ट्रपति पुरस्कार दिलाने वाले आविष्कारक सईदुल्लाह और उनके परिजनों को राजनीतिक मुकहुते की आड़ में जिस तरह बेरहमी से पिटा गया वह नितीश सरकार के साथ पुरे देश के लिए शर्म की बात है. मैं जब उनके मिलने सदर अस्पताल पहुंचा, जहां वे इलाजरत थे, वहां उन्हें ऐसे रखा गया था जैसे हम गाँव के जानवरों को रखते हैं (वैसे बिहार के सदर अस्पताल में किसानों के घर के गाय और बैल भी अपना इलाज न कराएं…) बहरहाल, सईदुल्लाह की डबडबाई आँखें जैसे यह कह रहीं थीं कि क्या यही मेरे किये का फल है? क्या यहीं एक देशभक्त मुसलमान होने की सजा है? मैंने हिम्मत जुटा कर उनसे कुछ पूछना चाहा लेकिन इससे पहले ही वे बोल पड़े – “यहीं दिन देखना रह गया था बाबू …..क्या यह वहीं हिन्दुस्तान है….? क्या यह गांधी का वही वतन है…” और फिर वे निःशब्द हो गए…मुझमे भी कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं थी.

उधर सेवानिवृत सैनिक सईद परिवार सहित जान बचाने के लिए कहीं और पलायन कर चुके हैं. उनका अधजला खाली पड़ा घर स्थानीय मीडिया से जैसे यह पूछ रहा हो- क्या इसकी खबर नहीं छापोगे? छापोगे भी कैसे, हमने तो कभी विज्ञापन नहीं दिया ना!

वही के. राय जिन पर ह्त्या का कथित आरोप है, यहां शान से डटे  हुए  हैं…. भाई ! पुलिस में थे… ये दबंग हैं…!

स्थानीय मीडिया वन डे मिमोरी का फंडा अपना रही है. 4 जून के बाद एक दिन भी इस घटना से सम्बंधित खबर किसी ने नहीं छापी… उपद्रवियों के कोपभाजन के शिकार कैसे हैं? कहाँ गए?  कोई जन-प्रतिनिधि यह पूछने तक नहीं आया… आयें भी कैसे? यहाँ इनकी संख्या काफी कम जो है. यदि ये यहाँ अधित संख्या में होते तो वोट बैंक की खातिर प्रतिनिधियों का हुजूम भी इनके दरवाजे पर माथा टेकता !!! क्या हमारा देश अराजकता की तरफ नहीं जा रहा?  मिनट मिनट पर चक्का जाम और पल भर में देश बंद अभियान जैसे खेल हो गया है. प्रशासन पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. पुलिसिया कारवाई अल्पसंख्यकों और असहाय जनता पर कहीं ज्यादा होती है. आततायियों, उपद्रवियों, धार्मिक उन्मादियों और ताकतवरों को यहाँ बक्श दिया जाता है.

यदि सईद जैसे जवान और सईदउल्लाह जैसे वृद्ध वैज्ञानिक का देश में यहीं हश्र होता है और मदद की मंशा में भी राजनीति की गन्दी बू आती है तो फिर क्या जनतंत्र और क्या राजतंत्र ..!!!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और बिहार विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के शोध छात्र हैं)

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