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क्या ग़रीब या पिछड़ी जाति का होना और जींस न पहनना गुनाह है?

क्या ग़रीब या पिछड़ी जाति का होना और जींस न पहनना गुनाह है?

दिनेश गौतम

मेवात, पंद्रह वर्षीय सलमा (बदला हुआ नाम) का अपहरण कर 4 पुरुषों के गिरोह ने (जिनमें से एक पास के गांव सिंगार के वर्तमान सरपंच है) द्वारा बलात्कार किया है. घटना 29 जून रात की है, जब 4 पुरुष, हनिस, आजाद, लियाकत और साजिद ने 12 बजे के आसपास 15 साल की लड़की का अपहरण कर लिया और अलवर, राजस्थान की ओर लेकर चले गए.

दुसरे दिन वो हनिस के गाँव लौट आये, जहाँ उन्होंने लड़की को बंधक बना कर रखा. इस दौरान उन्होंने लड़की के साथ कई बार सामूहिक दुष्कर्म किया. लड़की को शराब पिलाया और इनकार करने पर उसकी ज़बरदस्त पिटाई की तथा बलात्कार के दौरान उसके चेहरे, उपरी और निचले अंगों को बुरी तरह नोचा.

दो दिन के लगातार सामूहिक बलात्कार और मारपीट के कारण बेहोश हो गयी तब सरपंच ने मोबाइल द्वारा लड़की की माँ को सूचित किया की तुम्हारी लड़की जंगल में है उसे ले जाओ.

लड़की के परिवार वालो ने जब पुहाना थाने में शिकायत की तो थानाध्यक्ष ने दुत्कार दिया. तत्पश्चात वो सामाजिक संगठन ‘इम्पावर पीपुल’ से सहयोग से थानाध्यक्ष पर लगातार जनदबाव बनाया गया, तो उन्होंने बिना रिपोर्ट दर्ज कराये लड़की का मेडिकल करवाया.

मगर पुन्हाना की महिला डाक्टर ने लड़की के शरीर पर स्पष्ट चिन्हों के बावजूद बलात्कार की रिपोर्ट नकारात्मक दी. ज़ाहिर है कि पैसे का खेल शुरू हो चूका था और डॉक्टर ने थानाध्यक्ष के साथ साथ अपना ईमान बेच दिया था.

‘इम्पावर पीपुल’ की टीम ने इसकी शिकायत आरक्षी अधीक्षक मेवात से की, जहाँ से उन्होंने अविलम्ब प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया. इस तरह प्राथमिकी दर्ज हो सकी, लेकिन कोई गिरफ्तार नहीं किया गया.

पुलिस की शह और दबंग चरित्र ने 16 जुलाई को पुनः रंग दिखाया और एक आरोपी मोहम्मद आज़ाद लड़की के घर आया और उसे एक बार फिर से अपहरण करने की कोशिश की. इसबार ग्रामीणों ने उसे पकड़ लिया और उसे बांध दिया. पुन्हाना पुलिस को खबर की तथा मोहम्मद आज़ाद को पुलिस को सौंप दिया गया. यह घटना 16 जुलाई को 9 बजे रात की है, जो तीसरे दिन के अखबारों में भी छपी.

17 जुलाई को लगभग 2 बजे पुन्हाना के एसएचओ ने लड़की के माता-पिता पर दबाव बनाया कि वो सरपंच के खिलाफ़ आरोप वापस ले ले बदले में वो कारवाई कर देगा.

‘इम्पावर पीपुल’ ने इसी दिन 11 बजे राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) में शिकायत दर्ज कराई और उन्हें त्राहिमाम सन्देश भेजा कि पुलिस ने ना तो लड़की की सुरक्षा का कोई बंदोबस्त किया है और ना ही उसकी उचित इलाज हो पा रहा है. लेकिन हमारी गुहार अनसुनी चली गयी.

बार-बार फोन करने और मेल लिखने के बावजूद जब (एनसीपीसीआर) अपनी नींद से नहीं जगा, तो पुनः ‘इम्पावर पीपुल’ ने आरक्षी अधीक्षक से मिलने का विचार बनाया और पीड़ित के परिवार और पड़ोसियों के साथ एक टीम 20 जुलाई को नुह पहुंची, मगर एसएसपी किसी ज़रुरी कार्यवश किसी अन्य आलाधिकारी के साथ व्यस्त थे.

इसी दिन जब लड़की के परिवार वाले और उसके पड़ोसी गाँव पहुंचे तो उनके घर के तमाम सामान फेंक दिए गए थे और ज़बरदस्त तोड़ फोड़ की गयी थी.

23 जुलाई को स्थानीय थानाध्यक्ष ने तो सारी लाज शर्म ताक पर रख कर मोहम्मद आजाद को थाने से छोड़ दिया. तब ये पता चला की पुलिस ने उसे रिकार्ड में गिरफ्फ्तर ही नहीं दिखाया था, और वो स्थानीय पुलिस के अवैध संरक्षण में था.

अब सवाल उठता है की आखिर बाल अधिकार और नारी सशक्तिकरण के नाम की रोटी खाने वालों और सेमिनारों और टीवी पर आंसू बहाने वालों को ऐसे सामूहिक बलात्कार संवेदनशील क्यों नहीं लगते?

क्या ग़रीब होना, पिछड़ी जाति का होना और जींस ना पहनना गुनाह है? आखिर क्यों इस पर मीडिया, पुलिस और हमारे बुद्धिजीवी चुप रहते हैं? गुवाहाटी में एक लड़की के साथ हुई बदसलूकी से देश भर में आग लग जाती है, मगर इसके सामूहिक बलात्कार के बाद भी चुप्पी नहीं टूटती… वाह रे समाज और मीडिया का दोगलापन…

(लेखक  इम्पावर पीपुल से जुड़े हैं और ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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One comment

  1. thank you much for publishing this news and bringing it under lime light!

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