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गरीबों को नहीं, गरीबी को घटाया जाए

गरीबों को नहीं, गरीबी को घटाया जाए

तरुण वत्स

दिल्ली सरकार दिल्लीवासियों के लिए सुविधाओं के पुलिंदे बांधने में लगी है. हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार राजधानी दिल्ली लगातार तीसरी बार देश में सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी स्थान पर अपने को बनाए हुए है. वहीं सरकार ने जो आंकड़े पेश किए, उनके अनुसार दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 76 हजार रुपये सालाना है. ये सब देखकर ऐसा लगता है जैसे सुहानी दिल्ली में सब कुछ अच्छा ही है.

इन आंकड़ों के पीछे की सच्चाई कुछ और ही है. दूर से खूबसूरत, सुहावनी और सभी के दिल को भाने वाली दिल्ली का हाल एक आरटीआई में उपलब्ध कराए गए जवाब में सामने आया है. आरटीआई से पता लगा है कि दिल्ली में हर सप्ताह एक व्यक्ति भूख व गरीबी के कारण या तो आत्महत्या कर लेता है या उसकी मौत हो जाती है. यही नहीं पिछले 14 सालों में 737 लोग गरीबी व भूख के कारण आपनी जान गंवा चुके हैं.

दिल्ली की विकास की गति 1982 में तेज़ हुई जब यहां एशियन खेलों का आयोजन किया गया था. दिल्ली को तेजी से चमकाने का काम तभी से शुरू हुआ. इसका एक कारण यह भी था क्योंकि दिल्ली, बैंकॉक के बाद दूसरा शहर बना जिसने इन खेलों की एक से अधिक बार मेजबानी की.

दिल्ली की स्वच्छ एवं सुन्दर शहर की छवि सभी ने अपने मन में बना ली थी. राजधानी को चमकने का एक मौका 2010 में फिर मिला. इस बार एशियन गेम्स नहीं, कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन दिल्ली में हुआ. इन दोनों खेलों के आयोजन के पहले और कुछ दिन बाद तक दिल्ली हरी-भरी, साफ, स्वच्छ और गरीबी मुक्त दिखी. न कोई भिखारी, न कोई मांगने वाला, न कोई कूड़ा बीनने वाले और पूरी दिल्ली में न कोई गरीब.

दरअसल, दिल्ली को अंतर्राष्ट्रीय बनाने का दावा करने वाली कांग्रेस सरकार ने इन आकड़ों को कभी सामने आने ही नहीं दिया. अक्टूबर 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली की साफगोई छवि को बरकरार रखने के लिए राज्य व केंद्र सरकार दोनों ने ही दिल्ली में हुए विकास का जमकर ढिंढोरा पीटा, लेकिन इस साल भूख और गरीबी से हुई मौतों के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा. हालात ये थे कि वर्ष 2010 में भी भूख से 18 और गरीबी के कारण 40 लोगों ने दम तोड़ा था.

हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं. पिछले साल वर्ष 2011 में दिल्ली में भूख और गरीबी से मरने वालों की संख्या 62 थी. इसमें से 15 लोगों को भूखा रहने के कारण अपना जीवन समाप्त करना पड़ा था. इतना ही नहीं, वर्ष 2012 में मार्च तक मरने वालों की संख्या 11 तक पहुंच गई है.

हर साल न जाने कितने ही लोगों का जीवन भूख व गरीबी के कारण समाप्त हो जाता है. इस पर न ही कोई रिपोर्ट आती है और न ही इस ओर कोई सुधार किए जाते हैं. दिन पर दिन महंगाई का सांप जरूर डंसता रहता है और आम आदमी की जेब पर डाका सरकार डालती रहती है. घर से निकलते या घर जाते वक्त फुटपाथों, खाली दुकानों के सामने, सड़कों पर, रैन बसेरों में बेघर इंसान जरूर दीख जाते हैं, लेकिन न तो जनता और न ही कोई सरकार इनकी परेशानी सुनने को तैयार होती है. वोट बैंक के बहाने नेता जी जरूर इन बेघरों, गरीबों के लिए झूठे वादे करते नज़र आ जाते हैं. आलम ये है कि सरकार महंगाई बढ़ाकर गरीब के मुंह का निवाला तक छीन लेती है

राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए विपक्षी दल भी कुछ दिन हो-हल्ला जरूर करते हैं लेकिन स्थिति जस की तस बनी रहती है. आंकड़ों पर गौर करें तो दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डी.सी.पी.सी.आर) ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसके अनुसार दिल्ली का 52 प्रतिशत हिस्सा ऐसे इलाकों में रहता है जहां सुविधाएं तो दूर, ठीक से बुनियादी सेवाएं भी नहीं पहुंच पाती हैं. करीब 1.8 लाख लोग दिल्ली के स्लम क्षेत्रों में रहते हैं. ये लोग ज्यादातर बेरोजगार या दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिक हैं जो जीवन की बुनियादी जरूरतों को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं. स्लम क्षेत्रों, अनधिकृत कॉलोनियों और 860 जे.जे. कॉलोनियों के साथ दिल्ली में करीब 20,000 झुग्गी  हैं जिनमें रहने वाले लोग भरण-पोषण के लिए भी तरसते हैं. इन सब को जानते हुए भी सरकार चुप्पी साधे रहती है.

इस बीच आम आदमी से जुड़े मज़ाकिया बयान ज़रूर सामने आते रहते हैं और मिडिल क्लास के जीवन को नेता जी हायर क्लास से जोड़ते नज़र आते हैं. दिल्ली की चमकती तस्वीर को तो सब दिखाते हैं लेकिन सच्चाई को दिखाने के लिए कोई सामने नहीं आता है. कोई इक्का दुक्का रिपोर्ट जरूर आती है जो बहस का विषय बनकर कुछ दिन तक बनी रहती है.

एक आम आदमी की जिंदगी से सरकार का कोई सरोकार है तो वो वोट और सिर्फ वोट तक ही सीमित है. आम आदमी के हालात उसकी बस्ती में जाकर नज़र आते हैं. कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां जाने पर दिल्ली सरकार के दावों की पोल खुलती नज़र आती है और राजधानी की सुन्दर छवि धूमिल पड़ जाती है.

जिस नेता पर जनता भरोसा करती है, उसे विधानसभा या लोकसभा तक पहुंचाती है, वही नेता जनता को दरकिनार करते हुए स्वहित में कार्य करने लग जाता है. सवाल ये उठता है कि क्या भोली जनता नेता जी पर भरोसा करके गलती करती है या सरकार ही इस ओर सुधार करने में अक्षम है. यदि हालात नहीं सुधरे तो आने वाले समय में भारत की राजधानी में सिर्फ अमीरों का बोलबाला होगा. संसाधनों की उपयोगिता हायर क्लास तक ही सीमित होगी. आजकल ऐसा लगता है कि गरीबी की बजाय गरीबों को ही हटाने की कवायद तेजी पकड़े हुए है. सरकार को चाहिए कि इस ओर भी ध्यान दिया जाए ताकि दिल्ली की सच्ची तस्वीर में गरीबी को घटाया जा सके.

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