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ग्रीष्म कालीन नाट्य उत्सव की समीक्षा

ग्रीष्म कालीन नाट्य उत्सव की समीक्षा

अभिनव उपाध्याय

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ग्रीष्म कालीन नाट्य उत्सव में विभिन्न तरह के नाटकों का कलेवर इस वर्ष देखने को मिला. हालांकि कुछ नाटक पिछली बार की तरह दोहराए गए थे लेकिन उनका मंचन चाहे जितनी बार हो हर बार उन्हे दर्शकों का भरपूर प्यार मिलता है. मई के अंतिम सप्ताह से लेकर जून के अंतिम सप्ताह तक चलने वाले इस महोत्सव में दर्शकों को देखेन के लिए काफी कुछ था. निर्देशक रॉस्टन एबल के ओल्ड टाउन की खास प्रस्तुति को सराहा गया. हालांकि यह नाटक केवल वयस्कों के लिए था.

इसकी कथा एक ऐसे गांव की है जहां बहुत ही प्रतिभाशाली कलाकार रहते हैं उनकी कला का परचम दूर दूर तक था लेकिन प्रसिद्धि ने उनको घमंडी बना दिया और वह आपस में लड़ाई झगड़ा करने लगे. ऐसी स्थिति देखकर देवताओं ने उन्हें शाप दे दिया कि इस गांव का कोई भी व्यक्ति 25 की उम्र पार नहीं कर पाएगा. ऐसे में कलाकारों की संख्या घटने लगी. ऐेसे में उनको अपना अस्तित्व बचाने के लिए कि या गये प्रयास ही ओल्ड टाउन है.

दूसरा नाटक कामरेड कुंभकर्ण है. हास्य और परिहास के बीच महत्वपूर्ण सवाल उठाते इस नाटक की पृष्टभूमि में रामायण का पात्र कुंभकर्ण है. एक नाट्य  टोली जो रामायण की कथाओं का मंचन करती है और मौखिक परंपराओं में दक्ष है उसमें गायिका का बेटा कुंभकर्ण की भूमिका अदा करना चाहता है. लेकिन मुश्किल यह है कि उसके दादा और पिता जी स्वतंत्रता आंदोलनों से जुड़े हैं. लेकिन वह अंत में वास्तविक वजहों से गिरफ्तार कर लिया जाता है. इसके संदर्भ में इस नाटक के निर्देशक मोहित  टाकलकर का कहना है कि यह नाटक काफी कुछ कुंभकर्ण जैसा ही है. आधा ईश्वर आधा दानव, एक पांव स्वर्ग में तो दूसरा दलदल में, हताश करने वाला तो लुभावना भी. कामरेड को देखने के बाद ऐसा महसूस करेंगे कि हर सवाल के जवाब हमेशा नहीं मिलते! कहानी से एकसार होइए, और पाएंगे कि बावजूद इसके कि नाटक का देश काल इतना पुराना है इतना दूर का है और फिर भी आज के नजदीक का है.

यह नाटक कई ऐसे सवाल उठाता है जिसका उत्तर हमारे पास है लेकिन कहने का साहस नहीं है.

तीसरा नाटक लोकप्रिय निर्देशक रंजीत कपूर का चेखव की दुनिया था. यह महान रूसी लेखक अंतोब चेखब की छह कहानियों का कोलाज था. सभी कहानियां रिश्तों में मानवीय भावनाओं को दर्शाती हैं. मालिक नौकर के रिश्ते से लेकर घुलते प्रेम संबंधों, रोजमर्रा की आम स्थितियों से लेकर असाधारण परिस्थितियों तक सर्वहारा वर्ग के जीवनयापन की गहरी जिजीविशा से लेकर बुर्जुआ वर्ग के निरर्थक प्रलापों जैसी समस्त स्थितियों को दैनिक क्रिया कलापों से गूंथते हुए चेखव ने मानव जीवन के समस्त पहलुओं अपने रचना संसार में उजागर किया है.

चौथा नाटक प्रसिद्ध नाटककार विजय तेंडुलकर की कृति जात ही पूछो साधू की था. हास्य व्यंग के माध्यम से समाज की जाति व्यवस्था पर कटाक्ष करता यह नाटक प्रासंगिक लगा. इसका निर्देशन रजिंदर नाथ ने किया है. यह नाटक महीपत के लम्बे कथन के साथ प्रारंभ होता है. जिसमें वह अपने जीवन का ताना बाना बुनता है. उसका एक मात्र लक्ष्य एम ए की परीक्षा उत्तीर्ण करना था और उसे इस बात का कोई दुख नहीं था कि वह इसमें तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ था. अनगिनत इंकारों का मुकाबला करने के बाद वो सिफारिश से काम करवाने की बात सोचने लगता है. वह एक कालेज में अध्यापन शुरू भी करता है और उसके चेयरमैन की बेटी से उसे प्रेम भी हो जाता है लेकिन दूसरी जाति का होने के कारण महीपत की पिटाई भी होती है और वह स्कूल से निकाल भी दिया जाता है. यह नाटक हमारी बहुत सी दकियानूसी धारणाओं, हमारी संस्थाओं और हमारी प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है.

पांचवा नाटक मूल उपन्यास गीताजंलि श्री की कृति हमारा शहर उस बरस पर है. जिसका निर्देशन कीर्ति जैन ने किया है. इस नाटक की पृष्ठभूमि में एक शहर के जीवन में सांप्रदायिक वैमनस्य का हमला है जो स्थापित धारणाओं, स्थितियों और संबंधों को छिन्न-भिन्न कर देता है.

हनीफ और श्रुति पति-पत्नी हैं. कुछ दिनों से वह शरद के घर किराएदार हैं. उनकी जिंदगी मामूली से दिखने वाले पर लगातार हो रहे बदलाव आस पास घटित होते बड़े परिवर्तनों के संकेत हैँ और उनकी घनिष्ठता की परीक्षा लेते हैं. यह नाटक वर्तमान समय में हो रहे अल्पसंख्यकों पर हमले और उनकी मन:स्थिति बयां करते हैं. अंत में गहराई तक जड़े जमा चुके पूर्वाग्रहों और प्रवृत्तियों से अनभिज्ञ अपनी अपनी धार्मिक पहचानों को परिभाषित होने का विरोध करते ये लोग खुद में हो रहे बदलाव को करीब से महसूस करते हैं.

छठां नाटक पं आनंद कुमार का बेगम का तकिया है. इसका भी निर्देशन रंजीत कपूर ने ही किया है. इसका पहली बार निर्देशक 1977 में इन्होंने ही किया था यह नाटक तब से खेला जा रहा है और लोकप्रिय भी है. ढाई घंटे से अधिक का यह नाटक दर्शकों को बोझिल नहीं लगता. उपन्यास की पृष्ठभूमि  किसी ऊजड़ धरती के किनारे बसा हुआ राज मिस्त्रियों का गांव है जहां काम के लाले पड़े हैं. इसी गांव में दो भाई रहते हैं जिसमें लोभ-मोह, वासना तृष्णा, कर्म और अकर्म के दरमियान एक खींचतान है. यह अदृश्य के नियोजित निर्णयों और मनुष्य की महात्वाकांक्षाओं की प्रतीकात्मक व्याख्या है.   हास्य से भरपूर नाटक में जीवन के कई रंग देखने को मिल जाएंगे.

सातवां नाटक  प्रसिद्ध नाटककार फेडरिको गार्सिया लोर्का की कृति ब्लड वेडिंग है जिसका हिन्दी अनुवाद डा. महेन्द्र कुमार ने किया है और इसका निर्देशन नीलममान सिंह चौधरी ने किया है.

ब्लड वेडिंग एक ऐसे समुदाय की कहानी है जो अपने बर्बर भूदृश्य से पूरे जोशो खरोश के साथ जुड़ा हैं. जिंदगी का भरपूर आनंद उठाते हुए जमीं पर जी तोड़ मेहनत करते हैं. लेकिन इस खूबसूरती और जिंदादिली में खानदानी दुश्मनियों का जानलेवा जहर घुला रहता है. नाटक एक दुखातं कथा के साथ समाप्त होता है. इसकी निर्देशिका नीलम मानसिंह चौधरी का कहना है कि यह नाटक व्यक्तिवादियों और परंपराओं के जोश से भरे संघर्ष को रेखांकित करता है, और एक ऐसी खतरनाक खूबसूरत प्रकृति का जश्न मनाता है, जो एक तरफ आत्मा को ऊंचा उठाता है लेकिन दूसरी तरफ उसका खात्मा भी कर देता है.

ग्रीष्म नाट्य उत्सव में आठवें और नवें नाटक का मंचन एक ही क्रम में हुआ क्योंकि यह दोनों लघु नाटक थे. विजयदान देथा की कृति आदमजाद और फणीश्वर नाथ रेणु की कृति पंचलाइट का मंचन एक साथ हुआ इसका निर्देशन भी रंजीत कपूर ने ही किया. आदमजाद कहानी मानव जीवन के विभिन्न रंग समेटती हुई एक प्रस्तुति है. इसमें मानव के विद्रूप, लालची, वीभत्स और क्रूरतम चेहरे को रेखांकित किया गया है. इसमें धन के लालच में सब एक दूसरे को मार डालते हैं लेकिन धन पड़ा रह जाता है और किसी के काम नहीं आता है.

वहीं पंचलाइट हास्य से परिपूर्ण एक बेहद गंवई कृति है. यह भोजपुरी संगीत और परिवेश में है. यह गोधन और मुनरी की प्रेम कहानी है जिस पर मुरनी की मां और गांव वालों ने ग्रहण लगा दिया था लेकिन पंचलाइट के प्रकाश ने इन्हे भी रौशन कर दिया.

यह नाटक राष्टीय नाट्य विद्यालय के परिसर और कमानी सभागार में प्रस्तुत हुए.

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One comment

  1. Shreesh K Pathak

    अभिनव जी बढ़िया रिपोर्ट…! संक्षिप्तता की सीमा में रहते हुए तो बहुत ही सटीक वर्णन किया है आपने. मुग्ध पाठक तो वैसे ये चाहता था….कि उन सवालों से आप थोड़ा और जूझते जिनसे विभिन्न नाटकों के भिन्न भिन्न पात्रों ने जूझा होगा…! आपकी अपनी प्रतिक्रिया ठोस रूप में कम ही दिखी. शैली तो आपकी सजीव है ही…पर यही तो और पढ़ने की भूख जगाती है..!!!

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