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बथानी टोला जनसंहार की बरसी पर 15 जुलाई को राष्ट्रीय कन्वेंशन दिल्ली में

तलहा आबिद

बथानी टोला जनसंहार की 16 वीं बरसी पर बुधवार 11 जुलाई को बिहार में एक विशाल ‘न्याय रैली’ आयोजित की गई. इस ‘न्याय रैली’ को संबोधित करते हुए भाकपा-माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि 16 साल पहले दिन-दहाड़े लालू राज में जनसंहार हुआ लेकिन अब नीतीश राज में न्यायिक जनसंहार हुआ. उस वक्त लालू क्या कर रहे थे, यह जनता को पता है. पर आज नीतीश सरकार क्या कर रही है, इसे भी लोग देख रहे हैं. भैयाराम यादव की हत्या हो या छोटू कुशवाहा की हत्या- दोनों में सुनील पांडेय और रणविजय शर्मा जैसे सत्ताधारी विधायकों का नाम आ रहा है. ये राजनीतिक हत्याएं हैं. जब 2 मई को छोटू कुशवाहा की हत्या की सीबीआई जांच की मांग को लेकर औरंगाबाद में प्रदर्शन हुआ तो ठीक फारबिसगंज की तर्ज पर पुलिस ने महिलाओं, नौजवानों और आंदोलन के नेताओं को, यहां तक कि दो बार विधायक रह चुके चर्चित माले नेता कामरेड राजाराम सिंह की एसपी ने खुद पिटाई की, लेकिन जब रणवीर सेना के संस्थापक की हत्या के बाद 2 जून को पटना में आगजनी और तोड़फोड़ की गई तो पूरी हुकूमत ही जैसे गायब हो गई.

नीतीश की जो सरकार दलितों-अल्पसंख्यकों, पिछड़ों को न्याय देने के वादे के साथ सत्ता में आई थी, उसने दूसरी बार सरकार बनते ही दर्जनों जनसंहारों के अभियुक्त ब्रह्मेश्वर को ज़मानत दे दी और फिर बथानी जनसंहार के तमाम अभियुक्तों को हाईकोर्ट से रिहाई भी करवा दी. इसलिए भाकपा-माले इस सरकार पर भरोसा करने के बजाए खुद सुप्रीम कोर्ट गई है, जिसके दबाव में सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा है. दीपांकर ने कहा कि भाकपा-माले को न्यायालयों से भी ज्यादा भरोसा बिहार के गरीब मेहनतकश जनता के संघर्षों पर है, इसीलिए कानूनी लड़ाई के साथ ही जनसंघर्षों के जरिए न्याय की लड़ाई को तेज किया जा रहा है.

आगे दीपांकर ने कहा कि इस वक्त बिहार में एक बड़ी लड़ाई की ज़रूरत है और जब-जब बिहार में बड़ी लड़ाई की जरूरत हुई है तो भोजपुर खड़ा हुआ है. ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कुंवर सिंह के संग्राम से लेकर 1942 के लसाढ़ी के शहीदों तक और साठ-सत्तर के दशक में सामंतवाद के विरुद्ध मास्टर जगदीश, रामेश्वर यादव, बुटन मुसहर, कामरेड रामनरेश राम, कामरेड जौहर के संघर्ष की जो विरासत है, माले उस विरासत की वाहक है. जिस लाल झंडे को खत्म करने के लिए भोजपुर की धरती को बच्चों, महिलाओं और गरीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों के खून से लाल किया गया, उस लाल झंडे के तले गरीबों ने वोट देने का अधिकार हासिल किया और उसी के जरिए सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और विकास की लड़ाई को आगे बढ़ाया जा सकता है.

न्याय रैली को संबोधित करते हुए दिवंगत छोटू कुशवाहा के ससुर उमेश कुशवाहा ने कहा कि वे अपने छोटू कुशवाहा की हत्या के खिलाफ न्याय की आकांक्षा को लेकर इस रैली में आए हैं, क्योंकि माले ही है जो उनके दामाद की राजनीतिक हत्या की साजिश के खिलाफ लगातार लड़ रही है, उन्हें सरकार पर कोई भरोसा नहीं रह गया है. जिन सामंती शक्तियों ने जगदेव प्रसाद जैसे नेता की हत्या की थी, उन्हीं सामंती शक्तियों ने आज छोटू कुशवाहा की हत्या की है.

शहीद भैयाराम यादव की पत्नी उषा यादव ने कहा कि उनके पति की हत्या के खिलाफ संघर्ष जारी है, जिन लोगों ने उनकी हत्या की है, जनता उन्हें जरूर दंडित करेगी.

इस न्याय रैली में माले पोलित ब्यूरो सदस्य स्वदेश भट्टाचार्य, रामजी राय, कविता कृष्णन, राजाराम, रामजतन शर्मा, राज्य सचिव कुणाल समेत कई राष्ट्रीय नेता भी मौजूद थे.

रैली से पहले स्वदेश भट्टाचार्य, अरुण सिंह, राजाराम और कामता प्रसाद सिंह के नेतृत्व में बथानी टोला के शहीद स्मारक पर पुष्प अर्पण करके उन्हें श्रद्धांजलि दी गई. रैली स्थल भी दो मिनट का मौन रखकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई. हिरावल और युवानीति के संस्कृतिकर्मियों ने शहीद गीत पेश किया.

वहीं आगामी 15 जुलाई को ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस फॉर बथानी टोला’ द्वारा दिल्ली में एक कन्वेंशन आयोजित किया जा रहा है. इसमें बथानी टोला जनसंहार के पीड़ित और मारे गए लोगों के परिजन हिस्सा लेंगे. यह कन्वेंशन कॉन्स्टीट्यूशन, स्पीकर हॉल में 15 जुलाई को 12 बजे दोपहर से 6 बजे शाम तक चलेगा. आरा के दलित छात्रावासों के छात्र, जिन पर ब्रह्मेश्वर मुखिया के मारे जाने के बाद रण्वीर सेना के लोगों ने हमला किया था, भी इस कन्वेंशन में अपनी दर्द भरी कहानी को बयान करेंगे. इस कन्वेंशन में बथानी टोला जनसंहार पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी जारी की जाएगी.

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