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राजनीतिक पुस्तकें हटा रही हैं काले चेहरों से धूल

रहीसुद्दीन रिहान

देश की आजादी के 66वें जश्न से पहले विवादों का दौर जारी है. एक ओर भारत के प्रथम नागरिक की ख्याति पाने के लिए यूपीए और एनडीए एक दूसरे पर नामांकन को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर विवाद खड़े कर रहे है, तो वहीं दूसरी ओर कई वरिष्ठ नेता अपनी पुस्तकों के ज़रिये पुराने अनकहें राज़ों का खुलासा कर नये विवादों को जन्म दे रहे हैं.

पुस्तकों से उठते विवादों की कड़ी में अब वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर की बुक ‘बियॉन्ड दी हेडलाईन्स’ ने नया अध्याय जोड़ा है. नैयर ने अपनी पुस्तक में आरोप लगाया है कि बाबरी विध्वंस में पी.वी. नरसिंह राव की मौन सहमति थी. नरसिंह राव उस समय तात्कालिन प्रधानमंत्री थे. हालांकि यह कोई नयी बात नहीं है. इससे पहले अनेक पुस्तकों ने राजनीतिक गलियारों को गरमाने के साथ ही सच्चाई को जनता के सामने लाने का काम बखूबी किया है.

बीते दिनों, पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की पुस्तक ‘टर्निग प्वाइंट-ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ और पूर्व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह की आत्मकथा ‘अ ग्रेन ऑफ सैंड इन द आवर ग्लास ऑफ टाइम’ से हुए खुलासों से भी कई सवालों का जवाब मिला है और कई नए सवाल खड़े हुए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी पुस्तक में छह दिसंबर 1992 की घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘मुझे सूचना थी कि मस्जिद गिराए जाने में राव की मौन सहमति थी. जब कार-सेवकों ने मस्जिद गिरानी शुरू की तो वे पूजा पर बैठ गए और जब आखिरी पत्थर भी हटा दिया गया तब ही वे पूजा से उठे.

नैय्यर साहब ने किताब के एक अध्याय में नरसिंह राव सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि मधु लिमटे (दिवंगत समाजवादी नेता) ने उन्हें बताया था कि पूजा के दौरान राव के सहयोगी ने उनके कान में कहा कि मस्जिद गिरा दी गई है. इसके कुछ क्षण बाद ही पूजा समाप्त हो गई. हालांकि कटघरे में घिरने के बाद अपने आप को पाक-साफ बतानें वाले नेताओं की तरह नरसिंह राव के पुत्र पीपी रंगा राव ने भी अपने पिता का पक्ष संभाला और नैय्यर के सभी दावों को अविश्वसनीय और अपुष्ट क़रार देते हुए खंडन कर दिया.

नैय्यर ने पुस्तक में आगे लिखा है कि मस्जिद गिराए जाने के बाद जब दंगे भड़कनें लगे तो राव ने कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को अपने आवास पर बुलाया था. वे दुखी मन से बता रहे थे कि किस प्रकार उनकी सरकार ने मस्जिद को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने विश्वासघात किया.

नैय्यर से पहले अर्जुन सिंह ने भी अपनी आत्मकथा में बाबरी विध्वंस में उस समय के तात्कालिक प्रधानमंत्री नरसिंह राव की भूमिका का जिक्र करते हुए नरसिंह राव को नीरो की उपाधि दी है. अर्जुन सिंह ने किताब में लिखा है कि ‘बाबरी विध्वंस के समय नरसिंह राव को स्थिति को देखकर मेरे दिमाग में अचानक नीरो की वो मशहूर छवि कौंध गई, जब रोम जल रहा था और वह बांसुरी बजा रहा था.’ आत्मकथा में आगे लिखा है ‘अयोध्या कांड पर प्रधानमंत्री नरसिम्ह राव सभी को खुश करने की कोशिश में थे. एक मौके पर तो उन्होंने आरएसएस प्रमुख से खुद जाकर मिलने का फैसला कर डाला.’ अर्जुन ने अपनी आत्मकथा में यह भी दावा किया है कि नरसिम्हा राव ने पूरे मामले को गंभीरता से नहीं लिया. राव को यह चेतावनी पहले ही दे दी थी कि किसी भी वक्त बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया जा सकता है.

अर्जुन सिंह ने अपनी आत्मकथा में ज्ञानी जैल सिंह और बिना नाम लिये कई कांग्रसियों पर भी निशाना साधा है. अर्जुन ने लिखा है कि ‘राजीव गांधी के कार्यकाल के समय ज्ञानी जेल सिंह और कई कांग्रेसियों ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए पूरी प्लानिंग कर रखी थी.’  अर्जुन सिंह ने साल 1987 के मध्य का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘विदेश मंत्रालय से रिटायर्ड हो चुके के.सी. सिंह ने मुझसे मुलाकात का वक्त मांगा. मैंने समय दे दिया. वे मेरे पास एक ऊट-पटांग सूचना लेकर आए कि तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह प्रधानमंत्री राजीव गांधी को उनके पद से हटाने वाले हैं. वे जानना चाहते थे कि क्या मैं राजीव की जगह लेने को तैयार हूं.’

गांधी परिवार के वफादार अर्जुन सिंह ने किताब में आगे लिखा है कि ‘मैंने ये बात राजीव गांधी को बता दी और राजीव गांधी ने मुझसे कहा कि आपने मुझे बताकर सही किया, अगर ये शख्स दोबारा आपसे मिलने के लिए वक्त मांगे तो पहले मुझे बता दीजिएगा.’ के.सी. सिंह आत्मकथा के इन दावों को अर्जुन सिंह की स्वंय की उपज करार दिया था.

शांत स्वभाव के मिसाइल मैन कलाम की किताब की वजह से भी पिछले दिनों राजनीतिकों और नेताओं के बीच काफी माहौल गरमाया. कलाम ने अपनी पुस्तक के एक अंश में अपने और यूपीए अध्यक्ष के बीच निजीं बातों पर रोशनी डाली है. कलाम ने लिखा है कि अगर साल 2004 में सोनिया गांधी अगर प्रधानमंत्री बनने के लिए दावा पेश करती तो वह उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवा देते. कलाम उस समय देश के राष्ट्रपति थे. उस समय राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर थी कि सोनिया गांधी ने खुद अपना नाम की बजाय मनमोहन सिंह का नाम इसलिए प्रस्ताविक किया था क्योंकि कलाम ने उनके विदेशी मूल के होने पर आपत्ति जतायी थी, हालांकि इसके प्रमाण कभी नहीं मिलें.

राष्ट्रपति चुनाव से एकदम पहले सिलसिलेवार नेताओं की पुस्तकों का लोकार्पण होना और कागज़ के पन्नों से इतिहास के अंधरों पर रोशनी डालना, राजनीतिक पार्टियों के बीच मची अंदरूनी कलह की ओर संकेत देती है. पुस्तकों के परत-दर-परत खुलासों से बेशक नेताओं की कुर्सी पर भले ही खतरा न मंडरा रहा हो, लेकिन जनता ने जिस खतरें के कारण अपनो को खो दिया, उन कसूरवारों का चेहरा भी जनता के सामने ज़रूर आना चाहिए. विवादों में घिरे नेता अपने को पाक-साफ होने के भले कितने ही दावे कर लें लेकिन एक बात तो साफ है कि धुआं वहीं उठता है जहां आग लगती है.

(यह लेखक के अपने विचार हैं. BeyondHeadlines आपके विचार भी आमंत्रित करती है. अगर आप भी किसी विषय पर लिखना चाहते हैं तो हमें beyondheadlinesnews@gmail.comपर ईमेल कर सकते हैं.)

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