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प्रकाशक राजेन्द्र यादव स्वयं को किसी संपादकीय में याद कब करेंगे?

आशीष कुमार अंशु

वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र यादव अक्सर प्रकाशकों को लेकर अपने विचार व्यक्त करते ही रहते हैं. लेकिन कभी उन्होंने प्रकाशक राजेन्द्र यादव का जिक्र अपने लेखों में नहीं किया. आने वाले समय हो सकता है कि राजेन्द्र यादव स्वयं प्रकाशक राजेन्द्र यादव को अपने किसी संपादकीय में याद करें, क्योकि उसके सिवा उन्हें लिखते हुए अब कम ही पाया जाता है.

प्रकाशक से संपादक बने राजेन्द्र यादव का एक किस्सा वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि रामदरश मिश्र ने सुनाया था, यह उन दिनों की बात है जब रामदरश जी का उपन्यास ‘पानी के प्राचीर’ हिन्दी प्रचारक सभा आ चुका था. इसके अतिरिक्त उनके दो काव्य संग्रह, एक निबंध संग्रह और तीन समीक्षा ग्रंथ भी आ चुके थे. तमाम साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में वे लगातार छप रहे थे. कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि लेखक और प्रकाशक बिरादरी में उनका नाम नया नहीं रह गया था. सन 1964 की बात है, जब उनका उपन्यास जल टूटता हुआ, पूरा हुआ. उन्हीं राजेन्द्र यादव ने जवाहर चौधरी के साथ मिलकर ‘अक्षर प्रकाशन’ की शुरूआत की थी.

मिश्रजी के अनुसार जब डा देवीशंकर अवस्थी को किताब की जानकारी मिली तो उन्होंने मिश्रजी को कहा- ‘देखिए अपने मित्र राजेन्द्र यादव ने नया प्रकाशन खोला है. मेरा आग्रह है कि आप यह उपन्यास उन्हीं को दीजिए. उस वक्त डा. मिश्र से यह किताब नामवर जी भी राजकमल के लिए मांग रहे थे. लेकिन डा. मिश्र ने देवीशंकर जी से अधिक स्नेह की वजह से राजेन्द्र यादव के प्रकाशन को दी. अक्षर प्रकाशन को. लेकिन राजेन्द्र यादव के प्रकाशन ने मिश्रजी की किताब के साथ क्या किया?

राजेन्द्र यादव के प्रकाशन से किताबों का पहला सेट आया, उसके बाद दूसरा सेट भी बाजार में आया लेकिन इन दोनों सेट में डा. मिश्र की किताब नहीं थी. फिर डा. मिश्र ने जवाहर चौधरी से बात की. उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया. चौधरी साहब आश्वस्त करते रहे, अगली बार आ जाएगा, अगली बार आ जाएगा.

डा. मिश्र के शब्दों में- जवाहर चौधरी की बातचीत से संकेत आ गया कि राजेन्द्र यादव अड़ंगा लगा रहे हैं. डा. मिश्र ने अपना उपन्यास वापस मांग लिया. अक्षर प्रकाशन से लौटकर कई प्रकाशकों के यहां वह किताब चक्कर काटती रही. अंत में कृष्ण बेरी ने 1969 में उसे छापा.

डा. मिश्र के शब्दों में- राजेन्द्र यादव की कृपा से उपन्यास लिखे जाने के पांच साल के बाद छपा. जब वह उपन्यास चर्चित हुआ तो नेशनल पब्लिसिंग हाउस ने उसे फिर से मांग कर छापा.

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