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शुक्रिया! आगे मैं और नहीं लिख सकता…

Syed Anwar kaifee for BeyondHeadlines

आज से चार साल पहले आज ही के दिन 19 सितम्बर 2008 को जब मैं अपने ऑफिस में था. अचानक किसी बैंक कर्मचारी ने आवाज़ लगायी- “ यार जामिया में एन्काउन्टर हो रही है, मालूम किया तो पता चला कि जामिया नगर के एल-18 में यह मामला चल रहा है. दो आतंकी मार दिए गए. 2 को पकड़ लिया गया और बाकी 2 भागने में सफल रहे.

मेरे लिए दुखद समाचार यह भी थी कि इस घटना में स्पेशल शेल के एक होनहार इंस्पेक्टर मोहन चन्द शर्मा आतंकी के गोलियों से बुरी तरह जख्मी हो गए. और एक सिपाही भी… एमसी शर्मा को होली फैमली अस्पताल के आईसीयू में रखा गया.

मैं उस समय पंजाब नेशनल बैंक में डाटा सेन्टर के इलेक्ट्रिकल का काम देख रहा था. शाम तक तो किसी तरह से दिन कट गया. फिर मैं भागता हुआ ओखला पंहुचा यहाँ का नज़ारा ही अलग था. मेरे मन में अनगिनत सवाल थे. लेकिन जुलेना से ही मीडिया और पुलिस की खचाखच भीड़ देख कर मैं दंग रह गया. इतने सारे पुलिस और मीडिया वालों को मैंने पहले कभी नहीं देखा था. सारे सवालात अब तक भूल चुका था. अब नए सवाल दिमाग में आने लगे थे.

खैर किसी तरह से उस घटना स्थल पर पंहुच पाया, और जानने की कोशिश की कि क्या सच में कुछ ऐसा हुआ है. बिल्डिंग को देखने से उस बात का यकीन करना मुश्किल था कि यहाँ से कोई भागने में कामयाब भी हो सकता है. क्योंकि जिस तरह का वो माकन था, उससे निकल कर भागना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन काम था. एक ही रास्ता था, जहाँ से एंट्री है. बाकी सब मोटे-मोटे लोहे के रॉड से घेरा हुआ है. वहां से कबूतर मैना ज़रूर निकल सकते हैं. लेकिन कोई बिल्ली नहीं…

रही बात आगे के रास्ते की तो वहां हर तरफ़ पुलिस के जवान मुस्तैद थे. फिर दोनों कैसे भागने में कामयाब हो गए. दूसरी बात कही गई थी कि उनके पास से एक एके-47 मिली थी, अगर आपके पास कोई हथियार होगी तो क्या आप उस्सका इस्तेमाल नहीं करेंगे? हो सकता था कि शायद आप न करें पर मेरे पास होती तो मैं ज़रूर करता…

कहानी कुछ हज़म नहीं हो रही थी. फिर जब दुसरे दिन ऑफिस गया तब सभी ने पूछा. मैंने बताया हाँ, हम जहाँ रहते हैं, वहां से कुछ दूर पर ही यह घटना हुई है. फिर मैंने सारी बातें वहां तैनात आर्मी से बताया. उस ने उसी वक़्त कहा यह फर्जी एनकाउंटर है. उस ने कहा कि मैंने भी बहुत ऑपरेशन किया है. बहुत लोगों को मारा है. हमें पता है सब…

यह तो रही एन्काउन्टर की कहानी… अब हमें मजाक ही मजाक में वहां बिनलादेन कह कर बुलाया जाने लगा. और कहा जाने लगा बचकर रहना. जानते नहीं हो तुम कि यह कहाँ का रहने वाला है. जामिया नगर का आतंकवादी के यहाँ का…

खैर मैं इन बातों को मजाक में ही लेता रहा. लेकिन मैंने नोटिस किया कि मैनेजर रैंक के लोग जब मैं जाता तो ज़रूर मेरी तरफ़ देखते… यह बातें पहले मैंने महसूस नहीं किया था. दूसरा इत्तेफाक उस वक़्त हुआ जब मैं जॉब के लिए मोटोरोला कम्पनी में इंटरव्यू के लिए गया. सारी काम की बातें हो गयी. लेकिन एड्रेस देखने के बाद यही पूछा गया. अरे एन्काउन्टर वहीं हुआ था ना…. मैंने कहा हाँ! उन्होंने कहा मैं आपको कॉल करूँगा. मैं समझ गया. चुपचाप अपने रूम पे आ गया. हमारे जैसे कितने लोगों ने इस बात को सुना और सहा होगा पता नहीं… शुक्रिया… आगे मैं और नहीं लिख सकता…

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