Health

डॉक्टर और दवा के अभाव में मर गया!!!

Anita Gautam for BeyondHeadlines

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में डाक्टर मरीजों को मारने में जुटे हैं. पेशे से पत्रकार रह चुकी अनिता गौतम के परिवार के साथ अस्पताल में जो बिता उसको उन्होंने कलमबद्ध किया है.. .सरकारी स्वास्थ्य की पोल खोलती यह आपबीती आप भी पढ़ें…


मैं गत एक सप्ताह से अपने 12 साल के भतीजे को डेंगू से बचाने के कोशिश में जुटी हूं. दिल्ली सरकार के डेंगू और मलेरिया के ऐसे असंख्य अभियान चल रहे हैं, जिसमें उनका दावा है की मुफ्त चिकित्सा और मुफ्त दवा मुहैया कराई जा रही है. ऐसा मैं कुछ दिन पहले तक सिर्फ रोड किनारे पोस्टरों में पढ़ती थी, सच कितना है ये मैंने अब जाना है.

अपने परिवार के साथ घटित एक घटना बताती हूं. 20 सितम्बर, 2012 को जब मैं शाम के 6 बजे सेंट्रल दिल्ली के डॉ.राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल में अपने भाई को ले गयी जो 106.6 डिग्री बुखार से पीड़ित था, तो वहां के डॉक्टर ने एक क्रोसिन की गोली पकड़ा कर चलता किया और अगले दिन ओ.पी.डी में आने की मुफ्त में सलाह दे दी.

2 दिन तक हम लोगों ने बच्चे को पास ही के डॉक्टर को दिखाया किन्तु बुखार 104 पर आकर रूक गया. नज़दीक के उस डॉक्टर को हमने बार-बार बोला की आप टेस्ट करो, पर उन्होंने वायरल फीवर का हवाला देते हुए टाल दिया. 22 सितम्बर, 2012 को रात में जब फिर बुखार 105 डिग्री हुआ तब हम सेंट्रल दिल्ली के ही कलावती शरन बाल चिकित्सालय में ले गए. वहां जैसे-तैसे आपातकाल में डॉक्टर ने देखा और पैरासिटामोल की एक गोली खरीद कर खाने की सलाह देते हुए हॉस्पिटल में बेड ना होने पर चिंता जताते हुए कहा की पेसेंट को आप अपने वाहन में ही लेटने दें.

दोपहर बाद जब फिर डॉक्टर से बच्चे की हालत के बारे में बताया गया तब उन्होंने हॉस्पिटल के एक स्टेचर पर लेटाने को कहा. और डेंगू का टेस्ट किया. रात को किए गए इस टेस्ट की रिपोर्ट अगले दिन 23 सितम्बर, 2012 को आई और तब पता लगा कि डेंगू है. मरीज का प्लेटलेट्स काउंट 74,000 है.

वार्ड के बाहर जैसे-तैसे फिर एक दिन और बिता. पर बुखार कम होने का नाम ही नही ले रहा था. तभी एका-एक बच्चा को व्लड से सना पैखाना हुआ. डॉक्टर से दुबारा प्रार्थना की गयी और विषय की गंभीरता से लेने के लिये कहा गया. दुबारा जाँच में पता लगा की अब प्लेट-लेट्स काउंट 40000 हजार और कम होकर 34,000 हजार हो गया है. डॉक्टर की अनुपस्थिति में नर्स से रिपोर्ट के बारे में और रक्त-स्राव के बारे में बताया गया तो नर्स बोली, ” डॉक्टर का इंतजार करो”.

1 से 2 सरकारी भोजन का समय होता है, फिर जब 2:15 पर मैंने डॉक्टर के बारे में पूछा तो बोली जा कर खुद ही कहीं ढूंढ लो. मैंने नर्स को रिपोर्ट बताने के लिये कहा और इस बार उसका टका-सा जवाब मिला, ‘इट्स नॉट माय जॉब’…

3 बजे करीब डॉक्टर साहब घूमते-फिरते वार्ड के पास आ ही गए और रिपोर्ट के बारे में पूछने पर, उन्होंने मुंह खोला और बोला की के प्लेट-लेट्स 34,000 है. जब प्लेट-लेट्स 10,000 आयेगा तब खून चढ़ाया जायेगा. तभी दूसरी तरफ जोर से शोरगूल हुआ… कुछ शीशे टूटने की भी आवाज़ आई… देखा तो माज़रा ही कुछ और था! एक सरदार जी का 12-13 साल का बच्चा जिसे बुखार था, डॉक्टर और दवा के आभाव में मर गया!!!

यह पहली घटना नहीं थी, ऐसा ही मैं एक दिन पहले भी देख चुके थी फर्क सिर्फ इतना था की उस दिन एक 11 साल की नेहा नाम के बच्ची बुखार से अपनी जान से हाथ धो बैठी थी. उसके माँ- बाप गरीब थे. माँ रोते-रोते पागल सी हो गयी थी. बाप समझ नहीं पा रहा था कि बेटी की लाश संभालूं या होश खो बैठी पत्नी को संभालू. वैसे भी किसी ने सही कहा है, गरीब का मुंह तो हमेशा से ही बंद रहा है.

यह सारा नज़ारा मेरे आँखों के सामने घुमने लगा. और डॉक्टर की यह बात सुन कर मेरे और मेरे परिवार के सभी लोगो के होश उड़ गए कि जब प्लेट्सलेट 10,000 तक पहुंचेगा तब खून चढ़ायेंगे. मतलब आम शब्दों कहा जाय तो जब खून पानी होने लगेगा तब डॉक्टर कुछ करेंगे.

मैंने डॉक्टर से प्रार्थना की अगर आपके अस्पताल में सुविधा नहीं है तो किसी और हॉस्पिटल में रेफ़र कर दीजिए. डॉक्टर ने साफ-साफ मना कर दिया और बोला इससे अच्छा बच्चों का कोई हॉस्पिटल नहीं है. 36 घंटे बाद टिट्नस से बीमार बच्चों के रूम में हमें इसलिये एक 6 साल के बच्चे वाला बेड मिला था क्योंकि वहां मेरे पिता जी के कोई जानकर मिल गए थे. डॉक्टर ने हमें बेड मिलने का शुक्रिया करने के लिये भी बोला… और बोला अगर आप बच्चे को ले जाना चाहती हो तो अपनी जिम्मेवारी पर ले जाओ. मुझे लगा यहां अब और रखना खतरे से खाली नहीं, बेहतर ही होगा कही और किसी प्राइवेट हॉस्पिटल में ले कर चला जाए. हम बच्चे को ले भी गए.

कल से अब तक में बच्चे में सुधार है क्योंकि रक्त स्राव हो रहा था इसलिए उसे प्लेट-लेट्स चढ़या गया. पहले की अपेक्षा वह अब काफी ठीक है, क्योंकि अब समय-समय पर उसे उचित दवा और डॉक्टर का साथ जो मिल रहा है.

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