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बिहार में छात्र-संघ चुनाव की अनदेखी क्यों?

Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

बिहार की धरती से महान आंदोलन जन्म लेते रहे हैं. दुनिया पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले महात्मा गांधी ने भी सत्याग्रह की शुरुआत बिहार के ही चंपारण की पवित्र धरती से की थी. जहां आजादी के पूर्व के सबसे बड़े आंदोलन की नींव बिहार में पड़ी वहीं आजादी के बाद भी कई आंदोलनों पर बिहार का असर रहा.

बिहार में हुए आंदोलनों में यहां के छात्रों ने सबसे अहम भूमिका निभाई. राज्य की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता भी यहां के छात्र आंदोलनों की ही देन हैं.

बिहार के युवाओं के सीने में आजादी से पहले से ही आंदोलन की आग धधकती रही है. 9 अगस्त 1942 को ‘करो या मरो’ का पहला दिन था लेकिन बिहार कई दिन पहले से ही आंदोलन की अंगड़ाई ले चुका था. 8 अगस्त की रात को पटना में सैंकड़ों गिरफ्तारियों के बाद युवाओं के जोश में कोई कमी नहीं आई और इस जुनून ने 48 घंटे बाद फिरंगी राज के प्रमुख प्रतीक ‘पुराना सचिवालय’ पर तिरंगा लहरा दिया. देश को ब्रिटिश राज की बेड़ियों से मुक्त करने की इस पवित्र कोशिश में सात नौजवान छात्र शहीद हो गए. इन महान शहादतों के बाद पूरे देश में आंदोलन की आग धधक गई.

कितना ज़बरदस्त इतिहास है बिहार का.  आज़ादी के बाद भी बिहार के युवा-छात्रों का योगदान देश की राजनीति कम नहीं रहा है. 1975 में इंदिरा गाँधी की तानाशाही के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन भी बिहार से ही शुरु हुआ. आजाद भारत के भविष्य को बदल देने वाले इस आंदोलन के बाद पुरे देश में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी.  स्वयं इंदिरा गाँधी चुनाव हार गयी थी.

इसी आन्दोलन का ही असर है कि छात्र राजनीति और जय प्रकाश आंदोलन का दंभ भरते हुए जेपी के कुछ शिष्य आपको संसद और विधानसभा में हमेशा दिख जाएंगे. जेपी के इन होनहार शिष्यों में लालू प्रसाद यादव का नाम सबसे ऊपर रखा जाता है. लालू की तरह ही बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार एवं बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भी कई जनसभाओं में ख़ुद को लोकनायक का सच्चा अनुयायी और छात्र राजनीति का तपा हुआ खिलाड़ी बताते रहे हैं.  भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद एवं राजीव प्रताप रूड़ी, जनता दल यूनाइटेड के नेता नरेंद्र सिंह और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान भी मौके दर मौके अपने सफल राजनीतिक करियर का श्रैय छात्र राजनीति को देते रहे हैं.

लेकिन दुख की बात यह है कि कॉलेज में नारे लगाते हुए सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे इन नेताओं ने छात्र-संघ को फिर से जिंदा करने की कभी कोई उल्लेखनीय कोशिश नहीं की.  ग़ौरतलब है कि वर्ष 1974 में जब लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति की मशाल जल रही थी, उस दौरान पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव थे, जबकि सुशील कुमार मोदी एवं रविशंकर प्रसाद क्रमश: महासचिव और संयुक्त महासचिव थे. इसके अलावा मंगनी लाल मंडल, नरेंद्र सिंह, शिवानंद तिवारी, रघुनाथ गुप्ता, वृषिण पटेल, विजय कृष्ण, वशिष्ठ नारायण सिंह, नीतीश कुमार एवं राम जीवन सिंह ने भी छात्र राजनीति की धारा से ही निकल कर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में एक अहम मुक़ाम हासिल किया. यह अ़फसोसजनक है कि छात्रसंघ से सत्ताशीर्ष तक पहुंचने वाले नीतिश, लालू व मोदी सरीखे नेताओं को मौजूदा समय में छात्र-संघ ही अप्रासंगिक लगने लगे हैं.

यही वजह है कि इनकी आंखों के सामने लोकतंत्र की नर्सरी कहा जाने वाला छात्र-संघ अर्द्ध मूर्च्छा की स्थिति में आ गया है. पहले देश, काल और परिस्थितियों के मुद्दों के प्रति हमेशा जागरूक रहने वाले बिहार के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के परिसरों में आज वीरानी छाई हुई है.  बिहार में पिछले 29 वर्षों (1983 से लेकर अब तक) से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं.  छात्रसंघ चुनाव पर इस तरह की पाबंदी समझ से परे है.  इन नेताओं ने कभी मुड़कर नहीं देखा कि जिस छात्र राजनीति ने इन्हें पहचान दिलाई, बदले में इन्होंने उसके लिए क्या किया. दरअसल लालू, नीतिश, मोदी और रविशंकर प्रसाद जैसे समाजवादियों ने कभी चाहा ही नहीं कि इनके सामने बिहार में दोबारा कभी छात्र राजनीति का ज्वार पैदा हो.

प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया का कहना था कि छात्र-संघ लोकतंत्र की नर्सरी है और विश्वविद्यालय परिसर एक प्रयोगशाला, जहां से भविष्य के नेता, डॉक्टर, इंजीनियर और आई.ए.एस. पैदा होते हैं.

शिक्षा का सही मतलब है कि छात्र जीवन से ही विद्यार्थियों के अंदर समाज और देश को समझने की दृष्टि होनी चाहिए. अगर लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो छात्र-संघ को हर हाल में जीवित रखना होगा, क्योंकि यह प्रजातंत्र की सबसे निचली इकाई है.

देश के प्रत्येक भाग से बड़ी संख्या में युवा छात्र क्रान्तिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में अपनी प्रबल भागीदारी से फिरंगियों के दॉत खट्टे कर दिये थे. देश आजाद हो गया… और इसी के साथ आजादी से पहले छात्र राजनीति जिस लक्ष्य से प्रेरित थी वह बदल गया. अब छात्र राजनीति के सामने देश तथा समाज का नव निर्माण एक महत्वपूर्ण था. उसमें भी छात्र राजनीति ने अपनी अहम भूमिका निभाई है, फिर अब इसकी अनदेखी क्यों?

दरअसल, इसके पीछे स़िर्फ यही मंशा है कि बिहार में पुन: कोई छात्र नेतृत्व न उभरे, युवा नेताओं से मूल्यों को भूलकर सत्तासुख भोग रहे इन नेताओं को असुरक्षा महसूस होती है. फिलहाल बिहार में छात्रों के बीच राजनीतिक शून्यता का माहौल है. छात्र-संघ के अभाव में विश्वविद्यालय की सीनेट और सिंडिकेट में छात्रों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. कॉलेजों में नियमित रूप से पढ़ाई नहीं हो रही है.

बिहार की राजनीति में आज जो लोग मुख्य भूमिका में हैं, वे सभी छात्र राजनीति की उपज हैं. वे जानते हैं कि अगर छात्र-संघ को बढ़ावा दिया गया तो उन्हें चुनौती देने के लिए कई युवा चेहरे सामने आ जाएंगे. सभी नेता छात्रों का इस्तेमाल तो करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें उभरने नहीं देना चाहते.

छात्र-संघों को शैक्षणिक पतन का कारण बताने का तर्क पूरी तरह बेबुनियाद है. बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय में पिछले कई वर्षों से छात्र-संघ चुनाव नहीं हुए, लेकिन क्या वे शैक्षणिक नव जागरण के केंद्र बन सके?

आज देश की संसदीय राजनीति में जिस तरह धनबल और बाहुबल का प्रयोग बढ़ रहा है, ऐसे में छात्र राजनीति और छात्र-संघों का होना न स़िर्फ ज़रूरी है, बल्कि इसे संसद से क़ानून पारित करके अनिवार्य किया जाना चाहिए. जब देश में पंचायतों, स्थानीय निकायों, ट्रेड यूनियनों एवं शिक्षक संघों के चुनाव समय-समय पर हो सकते हैं तो आख़िर छात्र-संघ पर पाबंदी क्यों? क्या लोकसभा, विधानसभाओं, निकायों एवं पंचायतों के चुनाव में हिंसा नहीं होती? आख़िर कब तक सरकारें विश्वविद्यालय प्रशासनों पर और विश्वविद्यालय प्रशासन सरकारों पर ठीकरा फोड़ती रहेंगी ?

बीते नौ जनवरी, 2012 को जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार  ने पटना कॉलेज की 150वीं वर्षगांठ समारोह में छात्र-संघ राजनीति के पक्ष में जो बातें कहीं, उसमें भी वो छात्रों को बेवकूफ बनाते नज़र आएं. अब उनके वायदे के 6 महीने गुज़र चुके हैं, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात…. यही नहीं, नीतिश कुमार ने अपना असली चेहरा उसी महीने 20 जनवरी, 2012 को ही दिखा दिया.  20 जनवरी को नीतीश कुमार एक बार फिर पटना विश्वविद्यालय परिसर में थे, और छात्रों ने छात्र-संघों के चुनावों के लिए विश्वविद्यालयों को अधिसूचना जारी करने की मांग की तो नतीजे में छात्रों पर लाठियां बरसाईं गईं और कइयों को गिरफ्तार कर लिया गया. अब ऐसे में बिहार के छात्र करें तो क्या करें? वह भी ऐसे समय में जब पड़ोस के राज्य में छात्र-संघ चुनाव की घोषणा वहां के नए मुख्यमंत्री ने कर दी हो… ऐसे में ज़रूरत है एक शांतिपूर्ण आंदोलन की, जिसे पूरे देश में फॉरम फॉर स्टूडेन्ट डेमोक्रेसी चला रहा है. इस शातिं पूर्ण आन्दोलन का हथियार है –‘सूचना का अधिकार अधिनियम-2005’

अब बदलाव की अंगड़ाई ले रहे इस देश में एक और शांतीपूर्ण आंदोलन की जरूरत है. ऐसा छात्र आंदोलन जो देश को बदलने और बेहतर बदलाव लाने का सपना देख रहे तमाम छात्रों को एकजुट कर दे ताकि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्र संघ फिर से बहाल हो सके और नजदीकी भविष्य में देश को पढ़े-लिखे होनहार नेता मिल सके.

(लेखक फॉरम फॉर स्टूडेन्ट डेमोक्रेसी के कन्वेनर हैं)

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