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आखिर गाँधीवादी विचारधारा है कहां?

Isha Fatima for BeyondHeadlines

गाँधी जी का जीवन दर्शन इच्छाओं की प्राप्ति से कोसों दूर था. सत्य, अहिंसा उनके ऐसे औज़ार थे, जिससे वह देश ही नहीं, पूरी दुनिया के लोगों को इस पर चलकर जीवन व्यतित करने की शिक्षाएं दिया करते थे. इतिहास के तीन-चार दशकों से ही गाँधी जी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन तत्वों को ग्रहण कर उन पर हज़ारों लाखों लोग चलते आ रहे हैं, जिसे हम सब गाँधी युग के नाम से जानते हैं.

पर क्या कभी सोचा है कि गाँधीवादी व्यक्ति कितना गाँधी जी का अनुयायी है. कितना वह अपने जीवन में गाँधी के विचारों को उतार पाता है. जहां तर समाज का सवाल है तो यहां तो गुरु ही शिक्षा देते देते मालामाल हो जाता है.

सवाल यह उठता है कि आखिर गाँधीवादी विचारधारा है तो कहां है? और किन लोगों के पास है? गाँधी जी के पद-चिन्हों पर चलने वाले वह कौन लोग हैं? क्योंकि देश की स्थिति तो उनकी विचार-धारा से कोसों दूर नज़र आ रही है. गाँधी जी तो सदैव सुख, शांति, सत्य और अहिंसा पर चलकर आगे बढ़ने की शिक्षा दिया करते थे. प्रत्येक धर्म में भी शांति के आधार पर चलकर जीवन यापन करने की शिक्षाएं दी जाती हैं. किसी का भी धर्म युद्ध और विरोधी होने की बात नहीं करता. मगर आज दुनिया का ऐसा कोई देश और समाज नहीं जो बातों को फॉलो करते हों. महात्मा गाँधी ने सदैव अपने दाश से प्रेम किया. उन्होंने कभी नहीं चाहा कि देश की उन्नति और विकास हिंसा और भ्रष्टाचार के आधार पर हो.

जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे उनकी देश के प्रति भक्ति और बढ़ने लगी. वह एक ऐसे व्यक्तित्व वाले इंसान थे, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की विशेषता थी. इस बात से तो कोई वंचित नहीं कि उन्होंने देश की स्वतंत्रता-प्राप्ति में अहम भूमिका निभाई.

गाँधी जी एक ऐसा लोकतांत्रिक देश चाहते थे, जिसमें केवल 20 व्यक्तियों द्वारा गठित केन्द्र से ही लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो, बल्कि जिसमें देश का प्रत्येक गांव भागीदारी हो. उनके अनुसार भारत जैसा देश जिसकी आधे से ज्यादा जनसंख्या गरीब श्रेणी में आती हैं, ऐसे में सभी को समान रूप से अधिकार प्राप्त होने चाहिए.

एक ऐसे लोकतंत्र की स्थापना होनी चाहिए, जिसमें भेदभाव किए बिना सभी को उनके अधिकार दिए जाए. गाँधी जी के राजनितिक विचार लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा सभी जगह विधमान थी. वह हमेशा लोकतंत्र के उत्थान के पक्ष को महत्व देते थे. आज हमारा देश जिस स्थिति में है, यदि इस दशा को गाँधी जी ने कभी सपना में भी देखा होगा तो, शायद वह रो दिए होंगे.

आज हमारा देश लोकतांत्रिक होने के बाद भी खोखला और बेजान है. जिसकी जड़े एकदम से सड़-गल चुकी हैं. देश की हालत इतनी जर्जर है कि प्रत्येक व्यक्ति मौत की अवस्था में पहुंच गया है. यह वही देश है जिसे भविष्य में एक उज्जवल लोकतांत्रिक देश होने का सपना गाँधी जी ने अपनी आंखों में सजाया था. आज उसी देश में कोहराम मचा है.

इन पांच सालो में देश की सरकार द्वारा इतने बड़े-बड़े घोटाले देखने को मिले हैं कि जिसने पूरे देश पर कालिख पोत दी है. गाँधी जी ने एक आदर्श समाज की कल्पना को क्रियान्वित करने के लिए एक आदर्श राज्य का स्वरूप बनाया था, मगर आज जिस प्रकार की स्थिति है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि आदर्श समाज का सपना, सपना ही बन गया है.

आज देश में खुलेआम लूटपाट जारी है. जिसने एक गरीब इंसान की कमर को तोड़ कर रख दिया है. घोटालो की कतार ने देश को कंगाल कर सड़क पर ला खड़ा कर दिया है. जिसका खामियाज़ा देश की जनता को अपनी जेबे काटकर चुकाना पड़ रहा है. क्या यही सपना था गाँधी जी का? क्या इसी देश की कल्पना की थी उन्होंने? क्या इसी लिए उन्होंने इतने बलिदान देकर देश को अंग्रेज़ों के चंगुल से आज़ाद कराया था?

देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर तो है ही, साथ ही सामाजिक हालात ने भी शर्म के सारे पर्दे उठा दिए हैं. आज हमारे देश में पाश्चात्य सभ्यता इतनी हावी हो गई है कि इसने नारी देह को बाज़ार की एक बिकाउ सामान बना कर छोड़ दिया है.

गाँधी जी ने हमेशा स्त्री और उसके उत्थान के लिए समय-समय पर आंदोलन चलाएं. उनकी दयनीय स्थिति को सुधारने में आपना पूरा योगदान दिया. जिससे कि वह पुरूषों के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल सके और स्त्री आपने देह को खिलोना न बनने दें. मगर आज वह समाज कहीं नज़र नहीं आता, जिसकी कल्पना गाँधी जी ने की थी.

आजकी स्त्री अंग-प्रदर्शन करने को अपनी उपलब्धि समझती हैं. दरअसल, इस तरह का समाज विकास की ओर नहीं, बर्बादी की ओर बढ़ रहा है. हमारी संस्कति खत्म होने के कगार पर है.

गाँधी जी ने सदैव स्त्री को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, मगर उन्होंने अपनी संस्कृति को प्राथमिकता दी  है, जिससे देश की पहचान न खोने पाए.

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