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विज्ञापन का भ्रम और हमारा स्वास्थ्य

Anita Gautam for BeyondHeadlines
प्रारंभिक दौर से ही दवा कंपनिया दवाईयों का खुले रूप से प्रचार कर रही है साथ ही साथ यही मल्टीनेशनल कंपनिया अपने ब्रांड को बाजार में उतारने के लिए अनेक प्रलोभन भी देती है. इन लोगों ने तो हमारे स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने का पूरा मन बना लिया है. हर प्रचार को ऐसे तार्किक और वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत करते हैं कि अच्छे से अच्छा व्यक्ति धोखा खा जाए.

प्रचार माध्यम से आम इंसान को डाक्टर बना देते हैं. बच्चे का कद बढ़ाना है तो बॉर्नविटा दीजिए या आज कल परीक्षा के समय बच्चों का पसंदीदा प्रचार जालिम मैथ्स के फार्मूले घर में याद रहे एक्ज़ाम में भूले- कॉम्पलैन, बूस्ट, हॉर्लिक्स जैसे बच्चों के लिए फूट सप्लिमेंट्स जो दिमाग के साथ-साथ कद बढ़ा करने का दावा करते हैं.

सिर दर्द हो तो सैरिडॉन खाओ, बंद नाक और बदन दर्द से राहत दे- डी-कोल्ड टोटल, वहीं एनर्जी चाहिए तो रिवाइटल खाइए- जियो जी भर के, हृद्य रोगियों के लिए- अपनाइए सफोला गोल्ड, दिल को रखिए जवां…

बात स्पष्ट है कि वनस्पिति तेल में वसा तो होता ही नहीं है. संभवतः हमारे विचार में वसा का संबंध मोटापे व जीवन में खतरा पैदा करने वाली बीमारियों जैसे दिल का दौरा से होता है किन्तु यह धारणा नकारात्मक है. भोजन में अधिक मात्रा में पाए जाने वाले पोषक तत्वों के रूप में वसा भी शरीर के लिए महत्वपूर्ण कार्य करता है. समस्या तब होती है जब हम आवश्यकता से अधिक मात्रा में ग्रहण करें.

सरसों का तेल, सोयाबीन का तेल और तिल के तेल में कैलेस्ट्रोल नहीं पाया जाता क्योंकि यह वनस्पितिजन्य खाद्य पदार्थ से निकला तेल है. सफोला, न्यट्रिला आयल या आम बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए आम जनता के सामने तेल कैलेस्ट्रोल रहित होने का दावा करती हैं किन्तु तेल में तो दूर-दूर तक कैलेस्ट्रोल होता ही नहीं. ये कंपनियां तो न्यूट्रिला आयल में विटामिन ए, डी और ई तक होने का दावा करते हुए इसे वसा मुक्त बताती हैं. ऐसे अनेक विज्ञापन है जिनके प्रचार माध्यम से यह कंपनियां हमें भ्रमित करती हैं.

सरकार के वरिष्ट सांसद शांताराम नायक ने प्रसारण मंत्री से यह प्रश्न किया किः
(क) क्या सरकार ने कतिपय कंपनियों द्वारा टेलीविजन और मुद्रित विज्ञापनों के माध्यम से खाद्य और अन्य मदों के बारे में किए जा रहे झूठे अथवा भ्रामक दावों के संबंध में कोई अध्ययन किया है;
(ख) यदि हां, तो सरकार ने अब तक कौन-कौन सी कंपनियों और उत्पादों की पहचान की है;
(ग) अब तक कितने नोटिस भेजे गए हैं और कितने मामलों में अभियोजन की कार्यवाही प्रारंभ की गई है; और
(घ) इसके क्या परिणाम निकले हैं? (यह प्रश्न राज्यसभा,तारांकिन प्रश्न सं 49, 26/11/2012) से लिये गए हैं।)
इसी के फलस्वरूप सूचना प्रसारण मंत्रालय ने 38 मामले दर्ज भी किए और 19 पर कार्यवाही करते हुए 19 कंपनियों को 10 लाख रूपये का जुर्माना भरने के लिए कहा. किन्तु यह सब वह मल्टिनेशनल कंपनियां हैं जिनका 500 करोड़ टर्नओवर (प्रतिवर्ष) होता है उनके लिए 10लाख रू का जुर्माना तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है. अगर इन विज्ञापनों की तुलना विदेशों से की जाए तो वहां ऐसे विज्ञापन प्रतिबंधित हैं और खास तौर से वह विज्ञापन जिनमें बच्चों को मुद्दा बनाया जाए. फिर आप ही सोंचिए कि जिस देश की यह बहुराष्ट्रीय कंपनी है अपना देश छोड़ हमारे देश का हित क्यों सोंच रही है? और अपना कब्जा भारत में क्यों जमा रही है. अधिकांश प्रचार बच्चों से संबंधित ही क्यों होते हैं? अरे अगर बॉर्नविटा पी कर आपके बच्चे का दिमाग तेज हो जाता है तो आज 80प्रतिशत मध्यम अथवा उच्चवर्गीय परिवार का बच्चा आईएस.पीसीएस बन गया होता। यहां कमी मात्र इन कंपनियों की नहीं है, इन्हें बढ़ावा देने का श्रेय अन्य टीवी चैनल्स अथवा सूचना प्रसारण मंत्रालय को भी जाता है जो सच जानते हुए भी आम इंसान को भ्रमित करते हैं.

जब हमारे देश की नींव ही इतनी कमजोर होगी तो क्या हम इसी प्रकार स्वस्थ और विकसित भारत का निर्माण कर पायेंगे? शायद नहीं, जरूरत है हमें अपने दैनिक जीवन में सचेत और जागरूक होने की. हमें अधिक से अधिक स्वदेशी वस्तुएं अपनाने की. अपने बच्चे को फूड सप्लिमेंट न दे कर घर के बने पोषक तत्वों से युक्त भोजन कराने की. सफोला, न्यूट्रिला लाइट जैसे तमाम वसा मुक्त होने का दावा करने वाले तेलों का सेवन करने के बजाय प्रतिदिन व्यायाम करने की और अंत में क्षमा चाहूंगी, माताओं और बहनों को अपना वजन कम करने के लिए भोजन छोड़ने या डायटिंग करने के बजाय घरेलू शारीरिक कार्य करने की. तभी हमारा भारत स्वस्थ और विकसित होगा.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं व स्वस्थ भारत विकसित भारतअभियान चला रही प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान से जुड़ी हैं)

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