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एड्स के नाम पर ‘कंडोम घोटाला’ कब तक जारी रहेगा?

Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

विश्व एड्स दिवस यानी आज (दिसम्बर 01) देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों व गांव में एड्स के खिलाफ़ कार्यक्रमों का तांता लगा रहा. हज़ारों-हज़ार छात्र-छात्राएं, एन.एस.एस., एन.सी.सी. कैडेट्स, स्वास्थयकर्मी, समाजसेवी और राजनीति के पुरोधा इन कार्यक्रमों में शामिल हुए. सभी के ज़ुबान पर एक ही नारा गूंज रहा था- ‘हमने यह ठाना है, एड्स को भगाना है.’ बीच-बीच में एड्स के खिलाफ जागरूकता हेतु भाषणबाज़ी, नुक्कड़-नाटक एवं काव्य पाठ की फुलझरियां भी छुटती रही. न जाने इन आयोजनों पर सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा कितने करोड़ों रूपयों का वारा न्यारा हुआ होगा? ऐसा नहीं है कि इस वर्ष ही एड्स के खिलाफ ऐसे कार्यक्रमों के साथ-साथ एक मेले का तुफान आया हो, बल्कि ऐसा कार्यक्रम एवं मेला-ठेला इस दिन वर्षों से जारी है.

इन कार्यक्रमों के आयोजकों के उत्साह, समर्पण तथा परिश्रम को देखा जाए तो ऐसा लग रहा था कि एड्स इनसे भयभीत होकर अपना पछुआ खोल आज ही भाग खड़ा होगा. BeyondHeadlines को आरटीआई से उपलब्ध दस्तावेज़ बताते हैं कि विगत 7 वर्षों में 6551 करोड़ रूपये एड्स नियंत्रण कार्यक्रम पर भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा खर्च किया जा चुका है. परन्तु सच्चाई तो यह है कि देश में एड्स या एचआईवी पोजीटिव मरीज़ों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली में 2005 में जहां एचआईवी पोजीटिव मरीज़ों की संख्या जहां 13,494 थी वहीं 2011 में यह संख्या बढ़कर 35,036 हो गई है. ऐसे में लगता है कि रामायण कालीन सुरसा की तरह एड्स हमारे देश की गरीब जनता को निगलता ही रहेगा.

आरटीआई से उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि  सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली में 2005 से लेकर 2011 तक  1,20,479 एचआईबी रोगी चिन्हित किए गए हैं. (यहां यह स्पष्ट कर दूं कि ये आंकड़ें सिर्फ उन लोगों से तैयार किया गया है जो किसी न किसी तरह अस्पताल या जांच कैम्प तक गए)

जानकारों के मुताबिक़ अगर यह जांच बड़े पैमाने पर गांव तक चलाई जाए तो यह आंकड़े और भी अधिक बल्कि देश को काफी चौंकाने वाले हो सकते हैं.  क्योंकि बड़ी संख्या में ऐसे लोग रजिस्ट्रेशन नहीं कराते. और एड्स नियंत्रण में लगी ज़्यादातर संस्थाओं का कार्यक्रम भी कागज़ातों, कम्प्यूटरों एवं बैनरों पर ही चलता है. चाहे वो सरकारी संस्थाएं हों या गैर सरकारी… फिर भी इसमें लगे संगठनों के द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े ही स्वयं गवाह हैं कि एचआईवी पोजीटिव यानी एड्स मरीज़ों की संख्या विगत वर्षों में निरंतर बढ़ती ही जा रही है. हालांकि दूसरी तरफ नाको की रिपोर्ट बाताती है कि एचआईवी-एड्स के खिलाफ जंग अब रंग ला रही है. देश में एचआईवी संक्रमण के मामलों में 57 फीसदी की कमी आई है. ऐसे में चिन्ता का विषय यह है कि नाको अपनी रिपोर्ट में यह बात किस आधार पर कह रही है? क्योंकि आरटीआई के दस्तावेज़ तो बता रहे हैं कि देश की राजधानी दिल्ली में तो एड्स या एचआईवी पोजीटिव मरीज़ों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. और जब देश की राजधानी का यह हाल है तो बाकी का अंदाज़ा आप खुद लगा सकते हैं.

अब प्रश्न उठता है कि इतनी सारी संगठनों के एड्स के विरूद्ध युद्ध में लगे रहने तथा हज़ारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद आखिर इस सुरसा जैसी आतंकवादी बीमारी पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? ऐसे में वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना कि एड्स युद्ध में लगे सभी सरकारी-गैर सरकारी संगठनों ने मेला-ठेला आयोजनों के सिवा कुछ किया ही नहीं है और एड्स नियंत्रण के नाम पर उपलब्ध करोड़ों रुपये बिना ढ़कारे ही डकार गए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.

एड्स की रोक-थाम के लिए सरकार सालाना करोड़ों रूपये के कंडोम भी बांटती है. उद्धाहरण के तौर नाको ने  2007-08 में 26.20 करोड़ और 2008-09 में 19.84 करोड़ रूपये कंडोम पर खर्च किए.लेकिन क्या सिर्फ कंडोम भर बांट देने से एड्स इस देश से खत्म हो जाएगा? आख़िर  सरकार को यह बात कब समझ आएगी कि सिर्फ कंडोम भर बांट देने से एड्स जैसी बीमारी अंकुश नहीं लगाया जा सकता. या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है कि एड्स के नाम पर देश में कंडोम घोटाला किया जा रहा है?

एड्स के नाम पर खर्च हुए 6551 करोड़

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