India

रूढ़ी और आधुनिकता के बीच…

Pravin Kumar Singh for BeyondHeadlines

पिछले दिनों कश्मीर में 15-16 वर्ष की लड़कियों द्वारा बनाये गये रॉक बैंड ‘प्रगाश’ कुछ लोगो को नागवार गुज़रा. उन्होंने उन नाबालिग लड़कियों के फेसबुक पन्नें और मोबाईल पर भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए गैंगरेप और जान से मारने की धमकी दी. वहीं श्रीनगर के ग्रैंड मुफ्ती जनाब बशीरउद्दीन साहब ने संगीत को धर्म से जोड़कर शरीयत और इस्लाम के खिलाफ़ बताया.

कुछ साम्प्रदायिक शक्तियों और मीडिया के एक हिस्से ने इसे मुस्लिम समाज की आम छवि के रूप में पेश करने की कोशिश की. उन्होंने पूरे प्रकरण की गहराई में जाकर यह सवाल नहीं उठाया कि दरअसल रूढि़वादी समाज को खतरा संगीत से नहीं बल्कि औरतों की जागृति और आजादी की उनकी आकांक्षा से है. इसके खिलाफ मुफ्ती बशीरउद्दीन से लेकर आसाराम बापू और मोहन भागवत तक एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है.

Pragas Band

यह शुभ संकेत है कि जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ पार्टी और उसके मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में प्रमुख विपक्षी पार्टी पीडीपी ने लड़कियों का सर्मथन किया है. शायद उनके प्रति आम कश्मीरियों की मूक सहानुभूति के बिना यह संभव न होता.

कश्मीर देश का एक संवेदनशील राज्य है. जहां आमतौर पर आतंकवाद और हिंसा की खबरें सुनने को मिलती रही है. किसी मुफ्ती द्वारा फतवा जारी करने और कुछ सिरफिरों द्वारा इन बहादुर लड़कियों को धमकाने को भी कई लोग इसी सिलसिले की कड़ी मान रहे हैं. पर कश्मीर जैसे राज्य में युवा लड़कियों द्वारा रॉक बैंड बनाना और हजारों के बीच खूलेआम कार्यक्रम पेश करना क्या वहां की बदलती हुई तस्वीर को नही दिखाता है? क्या यह मुस्लिम युवाओं, खासकर लड़कियों के अन्दर पैदा हो रही नई जागृति का द्योतक नहीं है?

बड़ा मजेदार है कि सभी धर्मों के ठेकेदार महिलाओं को पूज्यनीय मानते हैं, लेकिन सिर्फ घर की दहलीज के अन्दर ही. आजकल महिलाओं के अधिकार और आजादी का स्वर तीव्र हो गया है. जो हिन्दुस्तान में ही नहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी चल रहा है. कट्टरपंथिओं के आगे 14 साल की लड़की मलाला नहीं झुकी. उसके समर्थन में लाखों लोग कराची और लाहौर जैसे शहरों की सड़कों पर उतर आये.

हमारे मध्यमवर्गीय ‘सभ्य’ समाज में मुस्लिम समाज को आमतौर पर दकियानूसी और कट्टरपंथी समझा जाता है. जिसकी पहचान दाढ़ी, बुर्का और आतंकवादी है. इस धारणा को ‘प्रगाश’, जिसका शाब्दिक अर्थ है अंधेरे से प्रकाश की ओर जाना, खत्म करता है. पालघर की शाहीन ढाडा भी इस छवि पर प्रश्नचिन्ह लगाती है.

बाकी समाज की तरह मुस्लिम समुदाय के अन्दर भी रूढि़वाद और आधुनिकता के बीच का द्वन्द नया नहीं है. पिछले दिनों जब सानिया मिर्जा भारत की प्रथम महिला टेनिस सितारा के रूप में अन्र्तराष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित हुई, तो एक बड़े इस्लामी शिक्षा संस्थान के हॉस्टल में वहां के छात्रों ने सानिया मिर्जा का फोटो लगाया था. वहां के कुछ शिक्षको ने फोटो हटाने को कहा, लेकिन छात्र तैयार नहीं हुए.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय व जामिया के ड्रामा क्लब में लड़कियां-लड़कों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर थियेटर करती हैं. बात पाकिस्तान की करें तो वहां नारीवादी कवियत्री, लेखक और नाटककारों की संख्या भारत से कम नहीं हैं. पाकिस्तान के मशहूर लाल बैंड में लड़के-लड़कियां साथ साथ गांव-शहरों में भ्रमण करते हुए गाती-बजाती रहती हैं.

इन दिनों ईरान से दिल्ली आयी महिला बैंड ‘ग़ज़ल’ की सदस्यायें इस बात पर अचम्भित हैं कि प्रजातांत्रिक भारत में फतवा जारी करके औरतों को गीत गाने से रोका जा रहा है. बैंड की प्रमुख शहर लोत्फी बताती है कि इस्लामिक ईरान में उनकी जैसी सैकड़ों महिला संगीत ग्रुप खुल कर काम कर रहे हैं.

कश्मीर में ही बेगम जून, बेगम हसीना अख्तर जैसी महिला गायिकाओं की लम्बी फेहरिस्त है. हव्वा खातून, लालदेड़ जैसी कवियत्रियां और संगीत साधक भी कश्मीर की महान मिली-जुली परम्परा का अभिन्न हिस्सा है.

यह र्दुभाग्यपूर्ण है मीडिया का एक हिस्सा और भाजपा जैसी राजनीतिक शक्तियां इस विवाद को परोक्ष रूप से मुस्लिम समाज का आम चरित्र या कश्मीर के तालिबानीकरण के रूप में दिखाने की कोशिश कर रही है. ऐसा करते वक्त वे उनके नेताओं द्वारा महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखा खींचने और महिलाओं पर अत्याचार की वजह ग्रह नक्षत्रों का दोष बताने एवं महिलाओं के माडर्न कपड़ों की होली जलाने की बात को भूल जाते हैं.

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