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न्यायपालिका की सांप्रदायिकता लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ : अधिवक्ता शाहिद आज़मी की की शहादत की तीसरी बरसी पर रिहाई मंच द्वारा आयोजित सम्मेलन न्यायपालिका की सांप्रदायिकता और लोकतंत्र में आतंकवाद के मामलों में आरोपित मुस्लिम युवकों के प्रति न्यायपालिका द्वारा सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव किए जाने की अलोचना करते वक्ताओं इससे देश के सामने एक न्यायिक फासीवाद का खतरा उत्पन्न हो गया है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

सम्मेलन की शुरुआत में इस सम्मेलन के प्रमुख वक्ता पत्रकार इफ्तिखार गिलानी जिन्हें आज सुबह सम्मेलन में आते वक्त बीच रास्ते से जबरन दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल द्वारा रोक दिया गया की निंदा करते हुए इसे कांग्रेस सरकार की शर्मनाक करतूत बताया गया.

सम्मेलन को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकता हिमांशु कुमार ने कहा कि विधायिका और कार्यपालिका की तरह ही न्यायपालिका भी अब मज़बूत तबकों के पक्ष में गरीबों के खिलाफ खुल कर खड़ी हो गई है. इसलिए ज़रुरी है कि न्यायपालिका की भूमिका पर समाज मुखर होकर आंदोलित हो.

Himanshu Kumar

वरिष्ठ पत्रकार प्रशान्त टंडन ने सांप्रदायिक मीडिया द्वारा मुस्लिम युवकों के खिलाफ किए जा रहे मीडिया ट्रायल का न्यायपालिका पर पड़ने वाले ख़तरनाक प्रभाव पर बात करते हुए कहा कि न्यायिक फासीवाद के खतरे को राज्य मीडिया के साथ मिलकर बढ़ा रहा है. इस तरह जनता के एक ऐसे सामूहिक चेतना का विकास हो रहा है जो अपने ही देश के नागरिकों के फर्जी एनकाउंटरों और बिना निष्पक्ष जांच के ही फांसी पर लटका देने से संतुष्ट होने लगा है, अफ़ज़ल गुरु की फांसी जिसकी नजीर है. यह भारत के एक फासिस्ट राज्य में तब्दील होने का उदाहरण है.

शाहिद आज़मी के भाई खालिद आज़मी ने कहा कि उनके भाई की कुर्बानी जाया नहीं जाएगी, क्योंकि उनकी लड़ाइ्र न्याय की लड़ाई थी जिसके लिए आज पूरे देश में लड़ने के लिए खड़े हो रहे हैं.

गुलबर्गा कर्नाटक से आए अयाज़ अल शेख ने कहा कि अगर यह व्यवस्था अपने नागरिकों से जीने का अधिकार छीनती है तो उसे वजूद में रहने का कोई अधिकार नहीं है. उन्होंने आतंकवाद के आरोप में कैद निर्दोषों की रिहाई के लिए एक मज़बूत राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ न्यायपालिका को धर्मनिरपेक्ष बनाने के लिए आंदोलन की मांग की, जिससे सच्चे लोकतंत्र की स्थापना हो सके.

एपीसीआर के नेता अख़लाक अहमद ने न्याय पालिका की सांप्रदायिकता के लिए इस समाज मे व्याप्त अल्पसंख्यक विरोधी मानसिकता को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि इसके पीछे संघ परिवार द्वारा फैलाए गई सांप्रदायिक मानसिकता हैं. न्यायपालिका में ऐसे जजों की भरमार काफी है जो अंबेडकर के संविधान के बजाय मनु के मानवता विरोधी संविधान के प्रति जवाबदेह हैं.

सूरत, गुजरात से आए अधिवक्ता और मानवाधिकार नेता बिलाल कागजी जिन्हें आतंकवाद के फर्जी आरोप में महीनों जेल में रखा गया ने कहा कि आतंकवाद के मामलों में अधिकतर देखा जाता है कि अभियोजन पक्ष के बजाय जज ही आरापियों से जिरह करने लगता है, यह अलोतांत्रिक प्रवृत्ति तो है ही न्याय के सिद्धान्तों की भी हत्या है.

सम्मेलन के पहले सत्र की अध्यक्षता इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मो. सुलेमान, दूसरे सत्र का पूर्व पुलिस महानिरिक्षक एसआर दारापुरी और तीसरे सत्र की अध्यक्षता रुपरेखा वर्मा और अधिवक्ता मुहम्मद शुएब ने की.

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्नानित सामाजिक कार्यकता संदीप पांडे ने आतंकवाद के आरोप में फर्जी तरीके से फंसाए गए शाहबाज़ की पत्नी सदफ को लखनऊ लोकसभा सीट से प्रत्यासी बनाने का प्रस्ताव रखा.

सम्मेलन को असद हयात, सदफ, रणधीर सिंह सुमन, मसीहुदृदीन संजरी, आफाक, खालिद शाबिर, इलियास आज़मी, प्रो. अनिल सिंह, जैद फारुकी, केके वत्स ने संबोधित किया.

सम्मेलन में अनिल आज़मी, आरिफ, अंकित चैधरी, अभिनव, सुब्रत, मो समी, सि़द्धार्थ कलहंस इत्यिादि उपस्थित थे.

सम्मेलन में 10 सूत्री प्रस्ताव पारित किया गया.

1- अफ़ज़ल गुरु के मामले में निष्पक्ष विवेचना और सेशन ट्रायल न होने के बावजूद फांसी दे देना एक अलोकतांत्रिक घटना है, जिसे राजनीतिक फायदे के लिए गया जो लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है.

2- श्री इफ्तखार गिलानी आज हमारी इस मीटिंग में आना चाहते थे लेकिन उन्हें पुलिस ने रास्ते में रोक लिया और उन्हें रास्ते में से पकड़ कर वापिस ले गई. एस. ए. आर. गिलानी साहब को भी कश्मीर में उनके घर में नज़रबंद किया गया था जिसका हम विरोध करते हैं.

3- आतंकवाद से संबधित मुक़दमों के सत्य परिक्षण और अपीलों की सुनवाई के दौरान न्यायपालिका की सांप्रदायिक प्रवृत्ति पर यह सम्मेलन चिंता प्रकट करता है और माननीय न्यायधीशों को उनकी संवैधानिक मर्यादा स्मृति कराते हुए यह आशा करता है कि वे पीडि़त पक्षों को निष्पक्ष भाव से न्याय प्रदान करेंगे.

4- यह सम्मेलन मांग करता है कि न्यायपालिका आतंकवाद से जुड़े उन मामलों में अपने आदेशों पर पुर्नविचार और उनका रिट्रायल करे जिनमें पक्षकारों द्वारा निष्पक्ष विवेचना न होने और निष्पक्ष सत्य परिक्षण न होने के तथ्य प्रस्तुत किए जाएं.

5- आतंकवाद से जुड़े मुक़दमों की सुनवाई फास्ट ट्रैक न्यायालयों में हो जिसके लिए विशेष न्यायालय गठित किए जाएं.

6- निमेष आयोग की रिपोर्ट तुरंत सार्वजनिक की जाय व दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ मुक़दमा चलाया जाए.

7- आतंकवाद से जुड़े मामलों में कन्फेशन से संबंधित प्रावधानों को जिनमें पुलिस अधिकारी के समक्ष किए गए कन्फेशन को मान्यता दी गई है उसे रद्द किया जाए.

8- बिना राष्ट्रपति या राज्यपाल की मंजूरी के जिन अभियुक्तों पर मुक़दमा चलाया गया है उन्हें तत्काल वापस लिया जाय और मुक़दमा चलाने वालों के खिलाफ विधिक कार्यवाई की जाए.

9- इंडियन मुजाहीदीन पर सरकार श्वेत पत्र लाए.

10- लंबे समय से बंद दोषमुक्त कैदियों के आचरण संबंधित रिपोर्ट सिविल पुलिस से न लेकर कारागार पुलिस से ली जाए.

उत्तर प्रदेश की न्यायपालिका की सांप्रदायिकता पर रिहाई मंच द्वारा जारी श्वेत पत्र में लखनऊ, फैजाबाद, बाराबंकी, रामपुर न्यायालय की भूमिका, जेल की बंद कोठरियों में अदालत, वीडियो कान्फ्रेसिंग के जरिए जेल से मुक़दमें की सुनवाई, न्यायपालिका द्वारा पुलिस के मनोबल गिरने जैसे तर्क, निचली अदालतों में मुक़दमों को लंबे समय तक लटकाना, उर्दू मीडिया के प्रति न्यायालयों की उदासीनता, न्याय में देरी के लिए न्यायालय जिम्मेवार, आतंकवाद के मुक़दमों को कचहरी परिसरों में न चलाकर जेल की बंद कोठरियों में चलाने जैसे आरोप लगाए गए हैं.

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