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कुर्सी दिल्ली में है पर शक्ति देश के लोगों में है…

BeyondHeadlines News Desk

विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र की चौखट पर भारत के लोगों के सामने आज उनकी राष्ट्रीय पहचान को गहराई से समझना एक चुनौती है. विविधता से भरे इस देश में भारत के नागरिकों के तमाम भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और वैचारिक भिन्नता के बावजूद उनके मन में हमेशा ही एकता की भावना रही है. इस सन्दर्भ में ‘मजदूर किसान शक्ति संगठन’ की संस्थापक अरुणा रॉय ने भारतीय सामाजिक संस्था, नई दिल्ली में ‘फादर पॉल डे ला गुरेवियेरे स्मृति व्याख्यान’ में अपने विचार रखते हुए कहा कि वृद्धावस्था पेंशन जो आज सिर्फ 200 रुपये प्रति माह है, को बढ़ाकर न्यूनतम 2000 रुपये प्रतिमाह किया जाना चाहिए.

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि यह हैरानी की बात है कि देश में विकास के नाम पर साधारण आदिवासी व दलितों की ज़मीन पर सरकार कब्ज़ा कर लेती है, और जब वे इसका विरोध करते हैं तो उन्हें सरकार देश-विरोधी और नक्सलवादी क़रार देती है. यह आश्चर्यजनक और शर्मनाक है कि संसद ने आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट जैसे जनविरोधी कानून को उस वक्त पास किया जब मैं और बहुत से मानव अधिकार कार्यकर्ता गुजरात में दंगों से पीड़ीत लोगो की सहायता के लिए वहां जमा थे. और संसद में जिन सांसदों की सहमति से पास हुआ, उन्हें तो इस एक्ट की भायवहता की कोई जानकारी नहीं थी.

लेकिन इन सालों में संसद से पारित राईट तो फ़ूड एक्ट, मनरेगा जैसे क्रांतिकारी और जन उपयोगी क़ानून भी पास हुए हैं, पर दिल्ली के लोग जानकारी के आभाव में इनमें खामिया गिनाते हुए इनका विरोध करते हैं.

‘कुर्सी दिल्ली में है पर शक्ति देश के लोगों में हैं’ बात आगे बढाते हुए कहा कि यह अजीब बात है कि जिनके लिए कल्याणकारी कार्यक्रम होना चाहिए उन्हें विषय के तौर पर समझा जाता है.

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता ने जोर देते हुए कहा कि देश के क़ानून में बदलाव लाने के लिए सीधे चुनाव लड़ना या राजनीतिक पार्टी में शामिल होना ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक एक्टिविस्ट के रूप में भी संसद को जनकल्याणकारी कानून बनाने के लिए बाध्य किया जा सकता है. राईट टू इन्फोर्मेशन जैसे क़ानून ऐसे एक्टीविज्म का ही परिणाम है.

कार्यक्रम के आरम्भ में विख्यात बुद्धिजीवी और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) के सदस्य डॉ. वर्जिनियस खाखा ने डॉ मरियानुस कुजूर और डॉ एम.के. जार्ज द्वारा संपादित किताब ‘टुवर्ड्स पॉलिटिक्स ऑफ़ चेंज : एसेस इन मेमोरी ऑफ़ पॉल जी” की किताब का विमोचन किया. यह किताब देश के तमाम हाशिये के लोगो से जुड़े आज के मुद्दों और चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए फादर पॉल जी के प्रति श्रद्धांजलि है. यह एक ऐसा संग्रहणीय दस्तावेज़ है जिसमें लोकतंत्र, पहचान और समावेश की राजनीति में हारने वाले नागरिकों की आकांक्षा और जीवन की अभिव्यक्ति है.

आज जहाँ वैश्विकरण और कार्पोरेटाईजेशन की तेज़ दौड़ में लोकतंत्र का स्थान सिकुड़ता जा रहा है, वहां देश में राजनीतिक परिवर्तन की आस सिर्फ जनांदोलन में ही दिखाई पड़ती है. यह किताब प्रख्यात चिंतको अम्ब्रोस पिंटो, वाल्टर फर्नान्डीस, रूडी हेरेडिया, प्रबीर पुरकायस्था, जॉन दयाल और के.बी. सक्सेना ने लिखा हैं.

गौरतलब है कि आई.एस.आई. में वर्ष 2012 से फादर पॉल डी स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया जा रहा है. फादर पॉल डे ला गुयेरेवियेरे (1920-2011) फ्रांसीसी मूल के जेस्विट थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन देश के तमाम युवाओं और प्रबुद्ध जनों को समाज की कड़वी सच्चाई से अवगत कराते हुए जागरूक करने में लगाया. अपने जीवन का आरम्भ उन्होंने मिल मजदूरी करते हुए तथा दूसरे विश्व युद्ध के दौरान फ़्रांसिसी सैनिक के रूप में किया. वर्ष 1947 में वे अपने देश को छोड़कर भारत आये और यहाँ आकर उन्होंने समाज के वंचित तबको से जुड़े मुद्दों को खासकर इन्डियन सोशल इंस्टिट्यूट बैंगलोर और नई दिल्ली के डोक्युमेंटेशन केंद्र में अपनी सेवा के दौरान अकादमिक विमर्शो में शामिल कराने का सफल प्रयास किया.

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