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खाप पंचायतें : सांस्कृतिक संगठन… पर कैसे?

Irshad Ali for BeyondHeadlines

अरविंद केजरीवाल द्वारा खाप पंचायतों को सांस्कृतिक संगठन बताने और इन पर कार्रवाई करने से इंकार करने के बाद से खाप पंचायतों की तरफ़दारी करने की नेताओं में होड़ सी लग गई है. हालांकि आज अगर खाप पंचायतें अस्तित्वमान हैं तो सिर्फ नेताओं के समर्थन के कारण ही हैं. नेताओं को खाप पंचायतों से राजनीतिक यानी वोट का लालच रहता है. वरना सुप्रीम कोर्ट के तमाम आदेशों के बावजूद केंद्र व राज्यों के द्वारा इनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

देश के संविधान के समानांतर संविधान चलाने वाली, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से लोगों के संवैधानिक अधिकारों को छीनने वाली खाप पंचायतों को किन आधार पर भारतीय संस्कृति की पुरोधा कहा जा सकता है?

उत्तर-प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में खाप पंचायतों का सबसे ज्यादा दबदबा है. ये आये दिन समाज के लड़के-लड़कियों के व्यवहार के बारे में नये-नये तालिबानी आदेश-निर्देश व फरमान ज़ारी करती रहती हैं. आखिर किस अधिकार के तहत करती हैं ये सब? ऐसा करने की स्वतंत्रता व अधिकार किसने दिये है? देश के अंदर एक विस्तृत संविधान है, क़ानून है, फिर ये पंचायतें लोगों पर अपना क़ानून कैसे थोप सकती हैं?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल किस समझ और तार्किकता से खाप पंचायतों को सांस्कृतिक संगठन कहकर इनका हौसला बढ़ाते हैं? जबकि इस तथ्य का कोई प्रमाण नहीं है कि खाप पांचायतों ने गरीब व विभिन्न जातियों के लिए कोई सामूहिक स्कूल, अस्पताल या पार्क खुलवाया हो. सर्वधर्म संभाव से संबंधित कोई काम भी खाप पंचायतें नहीं करती हैं. साझा संस्कृति को बढ़ावा देने का काम भी ये नहीं करती. खाप पंचायतें तो सिर्फ जातिवाद और आपसी फूट को बढ़ावा देती है तो फिर केजरीवाल और अन्य नेता किन आधारों पर इनका समर्थन करते हैं? और किस आधार पर इन्हें सांस्कृतिक संगठन मानते हैं?

हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो खाप पंचायतों को भारतीय संस्कृति की पुरोधा व समाज के सांस्कृतिक एनजीओ की संज्ञा दे डाली. हुड्डा के अनुसार खाप पंचायतें अच्छा काम करती हैं और इन्होंने मुगल आक्रमणकारियों को रोका था.

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भारत में कोई भी सोसाईटी- ‘सोसाईटी एक्ट 1860’ के तहत, और ट्रस्ट- ‘ट्रस्ट एक्ट 1882’ के तहत रजिस्टर्ड होते हैं और एनजीओ का रुप अख़्तियार कर सरकारी नियम-प्रक्रियाओं के तहत काम करते हैं. जबकि खाप पंचायतें कहीं भी रजिस्टर्ड नहीं होती हैं. ये पंचायतें सरकारी नियम-प्रक्रियाओं के अनुसार काम करने तो दूर देश के संविधान व क़ानून तक को नहीं मानती हैं.

आमिर खान के टॉक शो- ‘सत्यमेव जयते’ में आये कई खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों ने भी देश के क़ानून व संविधान के मुकाबले अपने तौर-तरीकों को वरीयाता देने की बात को सार्वजनिक रुप से स्वीकारा था. तो किन आधारों पर खाप पंचायतों को समाज के सांस्कृतिक एनजीओ कहा जा सकता है?

देश की सांस्कृति के पुरोधा तो राजाराम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद, स्वामी सरस्वती दयानन्द, ईश्वरचंद विद्यासागर थे. जिस समाज को इन महापुरुषों ने एकता के सूत्र में पिरोया था, उसी समाज को खाप पंचायतें समाज की ठेकेदार बनकर तोड़ने का काम कर रही हैं. जहां तक सवाल है मुस्लिम आक्रमणकारियों के विरुद्ध इनकी लड़ाई का तो देश के लिए महत्व सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल आदि के दिये गई बलिदान के सामने इनका बलिदान नगण्य है.

विश्वभर में संस्कृति को संजोने वाले महापुरुष गांधी जी ही थे. जो अहिंसा, शांति व मानवता से प्रेम के लिए प्रसिध्द थे. सिवाय सामाजिक ठकेदारी के, आज कौन-सी खाप पंचायत ऐसा करती है. जिन खाप पंचायतों के आदेशों पर लड़की को चार गांवों में निवस्त्र करके घूमाया गया. क्या यह देश की संस्कृति व मर्यादा के अनुकूल था?

जिस खाप पंचायत के आदेश पर बंगाल में 12 लोगों ने एक 20 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक रुप से दुष्कर्म किया, जिसमें 18 साल से लेकर 50 साल तक की उम्र के लोग शामिल थे. क्या सांस्कृतिक एनजीओ के यही कार्य हैं? जिन खाप पंचायतों के आदेशों पर पति-पत्नी को भाई-बहन बना कर राखी बंधवाई जाती है. क्या भारतीय संस्कृति की यही पहचान है?

खाप पंचायतें कभी भी भारत की संस्कृति की पुरोधा नहीं हो सकती और न ही सांस्कृति एनजीओ. क्योंकि ये देश को पीछे ले जाने का काम करती है. इनके कार्यकलापों से भारतीय संस्कृति की महान छवि धूमिल होती है. इन पर पूर्ण रुप से रोक लगाए जाने की ज़रुरत है.

राजनीतिक दलों को वोट के लालच में देश की वैश्विक प्रतिष्ठा व संस्कृति को साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए. सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर इन पर पूर् प्रतिबंध लगाना चाहिए क्योंकि भारतीय संविधान के अनुसार किसी को भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों व मानवाधिकारों का हनन करने की इज़ाजत नहीं दी जा सकती. साथ ही कोई भी संगठन या संस्था देश के संविधान से ऊपर नहीं हो सकती. फिर भी खाप पंचायतें अस्तित्वमान क्यों हैं?

यदि खाप पंचायतें देश के आर्थिक, सामाजिक विकास व पर्यावरणीय सुधार के लिए सराहनीय कार्य करती हैं तो ही इन्हें मान्यता मिलनी चाहिए, बशर्तें किसी के जीवन के ख़िलाफ इन्हें फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं.

(लेखक इन दिनों प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे हैं. उनसे  [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

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