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जेटली साहब! कला और कलाकारी आपको ही मुबारक…

Dr. Rajesh Garg

बीजेपी के सर्वमान्य, लोकप्रिय, ओजस्वी वक्ता, अत्यंत अनुभवी, परम ज्ञानी, प्रकांड विद्वान् और कद्दावर नेता श्री श्री अरुण जेटली जी ने हाल-फिलहाल में कहा है कि “आम आदमी पार्टी” को शासन करने की कला नहीं आती… statecraft नहीं आता… “आप” को अविवादित तरीके से सरकार चलाना नहीं आता…

ठीक कहा आपने जेटली साहब… बिलकुल ठीक कहा आपने…

-अगर कैमरे पर पैसे लेकर एक पूर्व बीजेपी अध्यक्ष द्वारा पार्टी और सरकार चलाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर नोटों को देखकर आपकी पार्टी के श्री जूदेव द्वारा ये कहना कि “रुपया खुदा तो नहीं मगर खुदा से कम भी नहीं है” ही शासन कला है, तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर आपके एक और पूर्व पार्टी अध्यक्ष द्वारा फर्जी तरीके से बेनामी कंपनियां बनाकर महज कुछ ही सालों में करोड़ों के वारे-न्यारे करना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर गुजरात में लुंज–पुंज लोकायुक्त बनाकर शिकायतकर्ता को ही तंग करना और उसका हौसला तोड़ना ही मक़सद हो और अगर यही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर RTI कार्यकर्ताओं को तंग करना और उनकी जान तक का दुश्मन बन जाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर ग्यारह रूपए हर रोज़ कमाने वाले को गुजरात में रईस की श्रेणी में रखना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर बीजेपी की सरकार के दस साल के शासन के बाद भी मध्य प्रदेश में इस मुल्क के सर्वाधिक कुपोषित बच्चे हों और अगर यही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर मध्य प्रदेश के छोटे-छोटे सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के यहां करोड़ों-अरबों का धन छापों में मिल रहा है तो इसका मतलब है कि वहां की सरकार पारदर्शी काम-काज देने में नाकाम है और अगर यही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर गुजरात में करोड़ों की ज़मीन को बड़ी-बड़ी कंपनियों को कौड़ियों के भाव बांट देना ही शासन कला है, तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर मुलायम सिंह की बहू डिंपल यादव के खिलाफ लोकसभा में बीजेपी द्वारा अपना उम्मीदवार ही ना उतारना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर येद्दुरप्पा को फिर से गले लगाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर अवैध खनन के बादशाह कर्णाटक के रेड्डी बंधुओं के सिर पर बीजेपी के शीर्ष नेत्री का वरदहस्त होना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर समलैंगिक संबंधों का विरोध करने वाली पार्टी का समलैंगिक मामलों के आरोपी मध्यप्रदेश के पूर्व वित्त मंत्री राघव जी का बीजेपी के मंच पर उपस्थित होना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर शहीदों के ताबूत तक में दलाली खाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर कोयले की खदानों को छत्तीसगढ़ में अपने कुछ चहेतों को बांटना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर झारखण्ड में ले-दे कर और जोड़-तोड़ कर सरकार बनवाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर वंशवाद के जहरीले पेड़ को पोषित करते हुए (राजनाथ जी, मेनका गाँधी जी, कल्याण सिंह जी आदि, पंजाब में बादल, हरियाणा में चौटाला) “राजकुमारों और राजकुमारियो” को पद और टिकट देना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर धर्म और संप्रदाय के नाम पर समाज को डराना और बांटना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाक़ई नहीं आती…

-अगर कांग्रेस के बन्दुक लहराने वाले सांसद रादरिया को मोदी जी द्वारा गले लगाना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर लाल बत्तिओं की गाड़ियों और बन्दुकों के साये में नेताओं का हवा-हवाई रहना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर उत्तर प्रदेश के दंगों के दर्द के बीच “study tour” के लिए विदेश गए दल में बीजेपी की एक नेता का जाना भी अगर शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर मोदी, अरुण जेटली, विजय मल्होत्रा, अनुराग ठाकुर द्वारा क्रिकेट व् अन्य खेल एसोसिएशन के पद पर कब्ज़ा जमा कर राजनैतिक रसूख बनाये रखना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

-अगर पंजाब में भ्रष्टाचार और ड्रग्स माफिया में अकाली दल के बड़े-बड़े नेताओं और उनके रिश्तेदारों के नाम आने के बाद भी उनके खिलाफ मुंह तक ना खोलना ही शासन कला है तो वो “आप” को वाकई नहीं आती…

जेटली साहब, अगर यही शासन कला की बात आप कर रहे हैं तो वाकई “आप” को ये कला नहीं आती और ना ही “आप “ इस कला को सीखना चाहती है… ये कलाकारी आपकी पार्टी, कांग्रेस/सपा/बसपा और अन्य दल ही कर बड़े अच्छे से कर रहे हैं और आप लोग ही बड़े अच्छे से आगे भी कर सकते है…

ये कला और कलाकारी आपको ही मुबारक जनाब… “आम आदमी पार्टी” का तो शुरू से ही इस सिद्दांत पर विश्वास रहा है जिसमें “जन” को ही सबसे बड़ा मानकर “जनसेवा” को राजनीती का मूलमंत्र माना गया है और जिसे किसी अनजान शायर ने कुछ इस तरह से अपनी जुबान दी है—

हम तो सरे-राह लिए बैठे हैं एक चिंगारी, कोई भी आये और चिरागों को जला कर ले जाये, हम तो किसी को कहाँ कुछ देने के काबिल ऐ खुदा, हाँ जो चाहे हमसे जीने की अदा ले जाये”…

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