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शैतान…

Adnan Kafeel for BeyondHeadlines

अब वो काले कपड़े नहीं पहनता
क्यूंकि तांडव का कोई ख़ास रंग नहीं होता
अब वो आँखों में सुरमा भी नहीं लगाता
अब वो हवा में लहराता हुआ भी नहीं आता
ना हीं अब उसकी आँखें सुर्ख और डरावनी दिखतीं हैं
वो अब पहले की तरह चीख़-चीख़कर भी नहीं हँसता
ना हीं उसके लम्बे बिखरे बाल होते हैं अब.

क्यूंकि इस दौर का शैतान
इंसान की खाल में खुलेआम घूमता है
वो रहता है हमारे जैसे घरों में
खाता है हमारे जैसे भोजन
घूमता है टहलता है
ठीक हमारी ही तरह सड़कों पर
और मज़ा तो ये
कि वो अखबारों में भी छपता है
टी.वी. में भी आता है.

लेकिन अब उसे कोई शैतान नहीं कहता
क्यूंकि उसके साथ जुड़ी होती हैं जनभावनाएँ
लोग उसे “सेवियर” समझते हैं
और अब अदालतें भी कहाँ
सच और झूठ पर फैसले देतीं हैं साथी ?
अब तो गवाह और सबूत एक तरफ़
और सामूहिक जनभावनाएँ दूसरी तरफ.

अब इस अल्ट्रा मॉडर्न शैतान की शैतानियाँ
नादानियाँ कही जाती हैं
क्रिया-प्रतिक्रिया कही जातीं हैं.
इस दौर का शैतान बेहद ख़तरनाक है साथी
वो अपने मंसूबे जल्दी ज़ाहिर नहीं करता
वो दिखाता है एक झूठी दुनिया का ख्वाब
रिझाता है अपनी मीठी-चुपड़ी बातों से
लेकिन इसका असली सच
हद्द दर्जे तक घिनौना है
इससे पहले कि ये शैतान
खड़ा कर ले अपना अजेय साम्राज्य
हमें लड़ना होगा इसके खिलाफ़
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए…..

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