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मोदी लहर है कहां?

Afaque Haider for BeyondHeadlines

भाजपा में घमासान जारी है. भाजपा के सारे वरिष्ठ नेताओं के दरम्यान सीटों को लेकर सर फुटव्वल हो रहा है. हर कोर्इ सुरक्षित सीट की तलाश में है. राजनाथ लखनऊ से चुनाव लड़ना चाहतें हैं. लालजी टंडन लखनऊ की सीट छोड़ना नहीं चाहते. मोदी वाराणसी से ताल ठोकना चाहतें हैं क्योंकि वाराणसी सुरक्षित सीट मानी जा रही है. मुरली मनोहर जोशी वाराणसी की सीट छोड़ना नहीं चाहतें हैं उनका डर भी स्वाभाविक है. कलराज मिश्र कानपुर की सीट जोशी को देना नहीं चाहतें.

पूरे मामले का लब्बो लुआब यही है कि भाजपा के बड़े से बड़ा नेता अपनी हार को लेकर डरा हुआ है और मोदी की लहर में उड़ने की नादानी करने से बच रहा हैं. इसलिए हर कोर्इ ऐसी सीट की तलाश में है जो सुरिक्षत सीट हो जहां भाजपा के नाम पर पत्थर भी चुनाव लड़े तो जीत जाये. इनमें प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी अपवाद नहीं हैं.

यही हाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का भी है, उन्हें गाजियाबाद की सीट से हार का डर सता रहा है. इसलिए वह लखनऊ से किसमत आज़माना चाहते हैं. ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक हो जाता है कि आखिर ये मोदी लहर है कहां?

अगर हकीकत में मोदी लहर है जिसका सारे भाजपार्इयों ने हाय तौबा मचा रखा है. जिस लहर पर सवार होकर मोदी लाल किले पर चढ़ने के सपने सजाये बैठे हैं, जिस लहर पर सवार होकर भाजपा सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना चाहती है. अगर ऐसी लहर पूरे भारत में चल रही है तो फिर भाजपा के बड़े से बड़ा नेता अपनी हार को लेकर इतना डरा हुआ क्यों है. हर किसी को सुरक्षित सीट की ही दरकार है. यहां तक के प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार मोदी को गुजरात के बाहर चुनाव लड़ने के लिए कोर्इ सीट नहीं मिल रही है. इसके लिए भी वायोवृद्ध नेता मुरली मनोहर जोशी के साथ दो-दो हाथ करना पड़ रहा है.

पिछली बार मोदी लहर के बिना राजनाथ सिंह गाजि़याबाद से चुनाव जीत गयें थे. इस बार मोदी लहर के बाद भी राजनाथ किसी भी कीमत पर गाजि़याबाद से चुनाव लड़ना नहीं चाहते. वह लखनऊ की सुरक्षित सीट तलाश रहें हैं, जहां से कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव लड़ा करते थे. लालजी टंडन किसी भी कीमत पर वह सीट खाली नहीं करना चाहतें, क्योंकि वह भी जानते हैं कि मोदी की हवा हकीक़त में हवार्इ है.

अगर लखनऊ के सिवा कहीं और से चुनाव लड़ा तो हार पक्का है. कलराज मिश्र कानपुर से चुनाव लड़ना चाहते हैं. मोदी के वाराणसी से सुरक्षित उम्मीदवार तय होने के बाद इस सीट से जोशी जी के लड़ने की संभावना है, मगर कलराज मिश्र को लगता है यदि वह कानपुर छोड़ कर गये तो उनकी हार पक्की है. इसलिए भलार्इ इसी में है कि ज़मीन पर रहा जाये मोदी की हवा में उड़ने की कोर्इ ज़रूरत नहीं है.

इस देश में 28 राज्य और 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं, जिनमें 543 लोकसभा की सीटे हैं. पूरे देश में 19 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश ऐसे हैं जहां भाजपा का चुनाव लड़ना या ना लड़ना बराबर ही है. इन 19 राज्यों में कोर्इ इंसान पैसे लेकर भी भाजपा का उम्मीदवार नहीं बनना चाहता और इन 19 राज्यो में भाजपा का खाता भी खुल पाना मुशिकल है और वे राज्य है- (1) आंध्रप्रदेश (2) पश्चिम बंगाल (3) तमिलनाडु (4) उड़ीसा (5) केरल (6) आसाम (7) जम्मू और कश्मीर (8) अरुणाचल प्रदेश (9) मणिपुर (10) मेघालय (11) मिजोरम (12) नागालेंड (13) सिक्किम (14) त्रिपुरा (15) अंडमान निकोबार (16) दादर एंड नागर हवेली (17) दमन और दीव (18) लक्ष्य-दीप (19) पोंडीचेरी…

इन राज्यों में भाजपा का एक भी सीट जीत पाना भाजपा के लिए उपलबिध है और इन राज्यों में कुल 207 लोकसभा सीटें हैं. तो फिर कैसे कहा जा सकता है कि पुरे देश में मोदी और भाजपा ही की लहर चल रही है. भाजपा सिर्फ 336 सीटों पर लड़ रही है जिसमे पंजाब, दिल्ली, हरियाणा में भाजपा की हालत खस्ता है. बिहार में भाजपा और मोदी को उस पासवान के बैसाखियों की ज़रूरत पड़ी जो अपनी सीट भी न बचा पाया. उसे भी भाजपा ने 7 सीटें दे दी, चुंकि भाजपा पहले से ही जानती थी कि इन सात सीटों में तो जीतने से रही.

उसके बाद भी भाजपा ने 3 सीटे उपेंद्र कुशवाहा को दे दिया जिसकी खुद बिहार में कोर्इ राजनीतिक हैसियत भी नहीं है. बाकी बची 30 सीटों के लिए भी भाजपा के पास उम्मीदवार नहीं मिल रहें हैं उसके लिए भी जदयू और राजद के बागियों और दागियों का स्वागत किया जा रहा है.

रहा सवाल यूपी का जिसके दम पर मोदी मुंगेरी लाल के सपने देख रहें हैं, तो यहां भी भाजपा की हालत मुज़फ्फरनगर के दंगों के बाद भी खस्ते हाल है. दंगों से कुछ उम्मीदें तो ज़रुर बंधी होंगी. इसलिए भाजपा ने दंगों के दोषी संगीत सोम, सुरेश राना और हुक्म सिंह तीनों को पुरुस्कृत ही नहीं किया बल्कि लोकसभा के सम्भावित उम्मीवारों की सूची में भी डाल दिया.

यहां भाजपा की हालत ये है कि बड़े से बड़ा नेता भी अपनी हार से डरा हुआ है और हर कोर्इ सुरक्षित सीट तलाश रहा है. यूपी में पिछले चुनाव में भाजपा को केवल 10 सीटें मिली थी. अत: यह भी मोदी के लहर की तरह हवार्इ है कि भाजपा को 40 से 50 सीटें मिल जाएंगी. सारे राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर वोटों का स्विंग न मुमकिन है कि भाजपा सीधे 10 सीटों से 55 सीटों पर आ जाये बहुत होगा तो भाजपा को 20 सीटें तक मिल जाएंगी.

सीटे दोगुनी हो सकती है तीन गुनी और पांच गुनी ना मुमिकन है जबकि भाजपा का अपना उत्तर प्रदेश में कोर्इ वोट बैंक भी नहीं बचा है. वह कलयाण सिंह और सोने लाल पटेल की पार्टी अपना दल के साथ जोड़ तोड़ करने के लिए मजबूर है.

रहा सवाल महाराष्ट्र का तो भाजपा की बेबसी देखी जा सकती है. गडकरी डछै के प्रमुख और गुंडागर्दी के लिए विख्यात राज ठाकरे के सामने नत्मस्तक हो गये हैं. कर्नाटक में वह सत्ता खो चुकी अब वह जिस द्वार से दक्षिण भारत में प्रवेश की थी, शायद उसी से बाहर निकल जाये. इसलिए यहां भी उसकी दावेदारी बेमानी है.

छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की हालत बहुत अच्छी नहीं है. विधानसभा का चुनाव जीतने में उसके पसीने छूट गये थें और ले देकर बचा गुजरात, मध्य-प्रदेश और राजस्थान यहां पर भी भाजपा 100 प्रतिशत तो जीत नहीं सकती. गुजरात में 2002 के बदतरीन दंगों के बाद भी 2004 के चुनाव में भाजपा गुजरात से केवल आधी ही सीट जीत सकी और यही हाल 2009 के चुनाव का भी रहा, लेकिन हर बार मोदी का दावा 26 में से 26 सीटें जीतने का था. जो उसकी लहर की तरह हवा साबित हुआ. कुल मिलाकर भाजपा 130 सीटे भी मुश्किल से जीत पाएगी.

हार को लेकर भाजपा की हताशा साफ दिखार्इ दे रही है. इसलिए अलग चाल चरित्र चेहरे वाली पार्टी जीत के लिए कोर्इ भी हथगंडा अपनाने को तैयार हैं. चाहे उसके लिए पार्टी के अंदर ही फूट क्यों न पड़ जाये. भाजपा दागी, भ्रष्टचारी सबका स्वागत करने के लिए आतुर नज़र आ रही है. भाजपा ने पार्टी से हटाये गये भ्रष्टाचारी नेता येदयुरप्पा को फिर से पार्टी में शामिल कर लिया है. पार्टी ने भ्रष्टाचार का आरोप झेल रहे बी श्रीरामुलु और उसकी पार्टी बीएसआर कांग्रेस का पार्टी में विलय कर दिया जो बिल्लारी भार्इयों का खास आदमी था जिसका विरोध खुद सुषमा स्वराज ने भी किया था.

इसी तरह भाजपा दूसरे दल के बागियों और दागी नेताओं का अपने पार्टी में स्वागत कर रही है. इसके बाद भी हार के डर से घबराये मोदी चुनाव प्रचार के लिए हर तरह के ओछे हथकंडे का इस्तेमाल कर रहे उनके लिए राखी सावंत से लेकर मॉडल मेघना पटेल तक नग्न हो रही हैं. क्योंकि मोदी को भी लगने लगा है कि उनकी लहर हवा हवार्इ है.

दरहकीक़त मोदी नाम की लहर कोर्इ हिन्दुस्तान में चल ही नहीं रही है. ये लहर केवल मीडिया और भाजपा के नेता चला रहे हैं. जो मोदी के पक्ष में हवा बनाने में जुटे हैं, यदि मोदी की लहर है तो मोदी देश के किसी भी हिस्से से क्यों नहीं चुनाव लड़ना चाहते हैं. उन्हें वही सीट किसी भी कीमत पर क्यों चाहिए जिस सीट के लिए भाजपा में जंग छिड़ी है. मोदी लहर भाजपा के पीआर कैंपेन का एक हिस्सा है, जिससे मोदी के स्याह कारनामों पर पर्दा पड़ जाये. जिससे मोदी की लोकप्रियता उसके करतूतों पर हावी ना हो जाये. करोड़ों रुपये इस उद्देश्य से मीडिया पर खर्च किये जा रहे हैं. जो मोदी को 272 प्लस का ख्वाब दिखा रहे हैं जो असंभव है. ये जगज़ाहिर है कि मोदी के सर पर अंबानी का हाथ है, जिसका कर्इ मीडिया हाऊस पर नियंत्रण है. यही वजह है जो मोदी लहर मीडिया में चल रही है वह यथार्थ के धरातल पर नदारद है.

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