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चुनने का नहीं फासिज्म के हमले को रोकने का चुनाव- आनंद पटर्वधन

Bhaskar Guha Niyogi for BeyondHeadlines

आनंद पटवर्धन फिल्म मेकर हैं. आनन्द के लिए फिल्मों का मतलब शोषण, दमन, अधिकारों से वंचित कर दिए गए आम आदमी का संघर्ष है. जनविरोधी राजनीति के चेहरे को पढ़ते हुए उनका कैमरा कहीं आम आदमी के चेहरे पर जाकर टीक जाता है, और फिर चेहरा दर चेहरा दमन, शोषण, भय, पीड़ा, हक़ की लूट की पूरी कहानी आम आदमी की जुबानी सुना जाता है.

उनकी फिल्मों में खनकती आवाज़, मदहोश करने वाली संगीत न तो स्वप्नलोक रचती है, न ही यर्थाथ की ज़मीन को पलभर के लिए छोड़ती है. संक्षेप में कहे तो उनकी फिल्में हमे मनुष्य विरोधी फासीवादी खतरे से चौकन्ना करते हुए हस्तक्षेप की अपील करती है.

राम के नाम, जंग और अमन, जय भीम कामरेड, पिता, पु़त्र और धर्मयुद्ध, ज़मीर के बंदी, हमारा शहर उनकी कुछ ऐसी ही फिल्में है, जो सोचने पर मजबूर करती है कि हमारा लोकतंत्र किधर  जा रहा है.

फिल्मों के लिए मैं सब्जेक्ट नहीं खोजता.सब्जेक्ट मुझे खोज लेते हैं. जब कोई विषय मुझे बेहद तंग करने लगता है तो मैं फिल्में बनाता हूं. कहने वाले आनन्द सामाजिक सरोकारों से खुद को जोड़े रखते हैं.उनके नजर में आज के हालात में फासीवाद का खतरा पहले से कही ज्यादा भयावह और बड़ा है.

लोकसभा चुनाव में बनारस आए आन्नद पटवर्धन ने बाचतीत के दौरान कहा कि राजनीति का ये कारपोरेट कल्चर कहीं न कहीं साधरण आदमी को खतरे में डाल रहा है.

विकास का मोदी मॉडल गुजरात भी इसी कारापोरेट कल्चर का हिस्सा है.प्रकृति प्रदत नैसर्गिक सारे चीजों की सौदेबाजी कर इसे बड़े से बड़े औद्योगिक घरानों के हवाले करना ही इस राजनीति की पहली और अंतिम प्राथमिकता है.

दुःख इस बात का है कि साधरण आदमी इस चेहरे को समझ नहीं पा रहा है. कारपोरेट मीडिया मोदी के जिस विकास के चेहरे को बेहतर साबित करने पर तुला है, वो चेहरा ग्रांउड लेबल पर साम्प्रदायिकता को और मज़बूत कर रहा है.

मोदी को निशाने पर लेते हुए आंनद कहते है कि मैने इंदिरा गांधी के देश पर थोपे गए आपातकाल के विरोध में क्रांति की तरंगे जैसी फिल्म बनायी थी. लेकिन आज के हालात में खतरा उससे कहीं ज्यादा है.

पहली बार आर.एस.एस और नफ़रत की राजनीति का चेहरा सत्ता के इतने करीब और सामने है. मैं इसी चेहरे से लड़ने बनारस आया हूं. क्योंकि मेरा ये मानना है कि जो लोग कहते है कि फासीवाद को बाद में देख लेंगे वो फासीवाद को कहीं न कहीं से मज़बूत करते है, क्योंकि बाद में तो कुछ नहीं होता. ये चुनाव तो इस देश में बड़े पैमाने पर होने जा रहे फासिज्म के हमले को रोकने का चुनाव है.

गुजरात के दंगो में मोदी को क्लीन चीट मिलने पर भी सवाल उठाते हुए आंनद कहते हैकि हिटलर के जिंदा रहते क्या उसके खिलाफ कोई सबूत मिला था? गुजरात की ज़मीनी हालत ये हैकि वहां विरोधी बोल नहीं सकते.

चुनाव में फिल्म इण्ड्रस्टी का एक खेमा मोदी की मदद सीधे तौर पर कर रहा है.इस पर आंनद का सीधा जवाब है, अपना स्वार्थ और लालच इसकी वजह है. बाजार सिर्फ पैसा बनाता है, सरोकार वहां पीछे हो जाता है.

आंनद कहते है, आज तो संघ से जुड़ स्वदेशी विचार मंच जैसी संस्थाए भी हाशिए पर चली गई है. मोदी जिस विकास की बात कर रहे हैं, उसमें एक छोटा सा वर्ग धनी बनेगा, बाकी हालत जस के तस रहेंगे.

लोकतंत्र और संविधान में विश्वास रखने वाले आंनद का कहना है.बेहतर होगा कि हम चुनाव में ऐसी ताक़तों को सर्पोट करे उन्हें अपना मत दे जो देश के गरीब, पीडि़त, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और अपने अधिकारों से लगातार दूर ढ़केले जा रहे लोगो की लड़ाई को मज़बूती से लड़ने के साथ ही फासीवादी ताक़तों के खिलाफ भी र्मोचा खोले.

चुनाव के दौरान बनारस पहुंचे आंनद पटवर्धन ने कुछ इसी अंदाज में बनारस आने के मकसद को बयां किया.

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