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बदले-बदले से मेरे सरकार नज़र आते हैं…

Bhaskar Guha Niyogi for BeyondHeadlines

वाराणसी: देश के सबसे हाई प्रोफाइल सीट बनारस में चुनावी प्रचार का शोर थम चुका है.कयासों के दौर और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक तरफा तमाशा शो प्रधानमंत्री मोदी के अनमोल झूठे बोल के बीच शहर बनारस का मिजाज बदला-बदला सा नज़र आ रहा है. अंदर ही अंदर कोई तूफान मतदाताओं को मथ सा रहा है.

कल सुबहे बनारस के साथ ये तूफान किस ओर रूख करेगा और दावों के किस झूठे महल को ढहाते हुए आगे बढ़ेगा, ये तो 16 मई ही तय करेगी. लेकिन एक बात तो तय हो गई कि बदलाव का जुनून राजनीति का कहकरा भी बदल देता है.

इस बार ये बदलाव बनारस की सड़क से लेकर गलियों तक दिखा. कल तक हेलीकॉप्टर और बड़ी-बड़ी गाडि़यों मे चलने वाले ये बड़ी-बड़ी सियासी पार्टियों के नेता भी बनारस की गलियों की खाक छानकर मतदाताओं को लुभाते दिखे.

ये उस राजनीति का कमाल है, जिसने बीते जाड़े में दिल्ली की राजनीति को सर के बल खड़ा कर दिया था. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दावे तो उस वक्त भी लड़खड़ाये थे, और इस गर्मी में इसी आम आदमी की राजनीति ने नेताओं के बने-बनाये पांच साल में एक बार पूछेंगे हाल के फार्मूले को बदल कर रख दिया है.

रात के 12 बज रहे हैं.सड़को पर रोज़ की अपेक्षा सन्नाटा है.अभी-अभी नई सड़क की चाय की एक दुकान पर जिया वारसी मिल गये. उम्र के 72 पड़ाव पर सूफियाना मिजाज लिये कहने लगे… अमा इलेक्शन-विलेक्षन तो होता रहेगा, पर इस शहर के मिजाज से क़दमताल करते चलने वाला कोई मिला तो सही जिसने हिन्दू-मुसलमान, से परे जाकर पहली बार इंसानियत की तो बात की. कहने लगे ‘कुछ लोग सेंकते हैं…

                    सियासत की रोटियां,

                      लकड़ी नहीं जली

                    गरीबों के घर जले है

सुबह होने में थोड़ा ही वक्त रह गया है. चुनाव लड़ने वालो के दफ्तरों में न जानी कौन सा दांव-पेंच खेला जा रहा होगा. जनता को मोहरा समझने वाले लोग न जाने क्या-क्या सोच रहे होगे. पर इन सबसे परे नींद के आगोश में जा चुका शहर शायद बदलाव का कोई बड़ा ख्वाब देख रहा होगा.

अलसुबह की मंदिर की घंटिया और मस्जिद की अजानों के साथ ये शहर एक नये इरादे के साथ जागेगा तो आने वाले दिनों में इस मुल्क की राजनीति की फिजा बदली हुई सी नज़र आयेगी. आम आदमी की ताक़त राजनीति की नई परिभाषा लिखेगी.

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