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देश में मोदी, बनारस में भाजपा!

Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

बीजेपी देश भर में भले ही ‘मोदी लहर’ का दावा करती आ रही हो, मगर बनारस में उल्टी गंगा बहती नज़र आ रही है. बनारस में जगह-जगह पोस्टर चिपके हैं कि ‘अबकी बार भाजपा सरकार’

ये बेहद ही हैरान करने वाला क़दम है, क्योंकि बीजेपी दावा करती रही है कि वो 2014 में लोकसभा का चुनाव ‘मोदी लहर’ के नाम पर लड़ रही है. ऐसे में मोदी के गढ़ में ही इस तरह के पोस्टर लगना इस बात का संकेत देता है कि बीजेपी के अंदर काफी हद तक भ्रम की स्थिति है.

बात सिर्फ पोस्टर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि काशी में बीजेपी की ओर से एक सिरे से  ‘अबकी बार भाजपा सरकार’ की लहर चल रही है. अखबारों में विज्ञापन देकर भी इसी नारे को दोहराया जा रहा है.

शहर के पोस्टर और होर्डिंग ही नहीं, बीजेपी का दफ्तर भी बदलाव की हवा के रंग में रंगा हुआ है. बीजेपी के दफ्तर में जहां पहले मोदी और केवल मोदी की तस्वीरें छाई हुई थी, अब वहां बीजेपी के प्रतीक पुरूष रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीन दयाल उपाध्याय की तस्वीरें नज़र आ रही हैं. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपई का चेहरा भी जगह-जगह तस्वीरों में नज़र आ रहा है.

रथ-यात्रा स्थित बीजेपी के चुनावी कार्यालय के प्रचार सामाग्रियों में भी मोदी की जगह भाजपा ने ले ली है. खुद बीजेपी कार्यकर्ता भी इस बदलाव से हैरान दिखाई पड़ रहे हैं. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि पार्टी को यह अचानक हुआ क्या है? संकेत साफ बताते हैं कि पार्टी मोदी की जीत के कम्बीनेशन को लेकर घबराई हुई है. खेल बिगड़ न जाए, इसके डर से पार्टी हर दांव आज़मा रही है. भले ही काशी से मोदी को इस तरह से गायब ही क्यों न करना पड़े.

यह घटना कई तरह के सवालों को  जन्म देती है. पहला सवाल यह है कि आखिर काशी में इस तरह के पोस्टर लगाने की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या मोदी को अपने दम पर बनारस में जीत पर भरोसा नहीं है? या मोदी को ऐसा लगता है कि उनकी कट्टर छवि चुनाव जीतने में आड़े आ सकती है? खासतौर पर उस माहौल में जब बनारस में जीत की चाबी बड़ी तादाद में मुस्लिम वोटों के हाथ में हैं, और जिस बनारस की पहचान एक पवित्र ऐतिहासिक शहर के रूप में है, जहां बहुलतावादी और समावेशी संस्कृति का प्रतीक है.

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