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लव जिहाद : JNU वालों की नज़र में

Fahmina Hussain for BeyondHeadlines

कहते हैं मोहब्बत सोच के नहीं होती… बस हो जाती है… प्यार और शादी यूं तो निहायत ही निजी मामला है. कौन किससे प्यार या शादी करना चाहता है, यह हम या आप नहीं जानते… इसकी ख़बर तो सिर्फ उन दो दीवानों को होती है, जो एक-दूसरे के इश्क व मुहब्बत में डूबे हुए होते हैं… हालांकि वैज्ञानिक इसे केमिकल लोचा भी बताते हैं…

लेकिन जब इस मामले में भी राजनीति आ जाती है, तो इस प्यार को लोग नाम देना शुरू कर देते हैं और मामला “लव जिहाद” जैसे शब्द का बन जाता है.

पिछले कई दिनों से ऐसी ख़बरें लगातार आ रही हैं कि ‘लव जिहाद’ जैसा कोई षड्यंत्र इस देश में चल रहा है. इसमें मुसलमान लड़के साजिश के तहत हिंदू लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फंसाते हैं. इनसे शादी करते हैं और जब शादी हो जाती है, तो जबरन इन्हें मुसलमान बना डालते हैं. इस बात में कितनी सच्चाई है, ये तो वो राजनीतिक दल ही बता सकती है, जिसने इस देश में इस मुद्दे को हवा दी. अपने राजनीतिक बहसों में शामिल किया.

जेएनयू कैम्पस में भी ‘लव जिहाद’बहस में रहा. नुक्कड़ नाटक के माध्यम से इसकी चर्चा भी हुई. इस सिलसिले में हमने स्टूडेंट यूनियन व कई पार्टियों के छात्र विंग के सदस्यों से बातचीत की.

सभी छात्र नेताओं ने ‘लव जिहाद’ जैसे शब्द को अपने-अपने तरीके से बयां किया. AISF के एक छात्र नेता नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि जनता को असल मुद्दे से भटकाने के लिए ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दे को सामने लाकर किसी खास धर्म को निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि किसी खास धर्म के लिए जिहाद जैसा नारा तब लगाया जाता है जब समाज में उस धर्म के लिए असंतोष को बढ़ावा देना हो.

वहीं AISA के एक सदस्य नाम न प्रकाशित करने के शर्त पर बताते हैं कि बीजेपी ऐसे मुद्दों को उठाती है, जो सांप्रदायिकता के आधार पर समाज को बांटने का काम करती है. वो यह भी बताते हैं कि उन्हें आरएसएस के नवीनतम अभियान में राजनैतिक चाल नज़र आ रही है, जो अपना एजेण्डा आगे बढ़ाने के लिए हिन्दू जनता को मूर्ख बनाने के लिए है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि लव और जिहाद कभी एक साथ नहीं हो सकते. किसी भी धर्म को दिल से व आपसी रजामंदी से अपनाया जाता है न कि जर्बदस्ती…

इतना ही नहीं, ABVP के भी एक सदस्य अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि ‘लव जिहाद’का सीधा अर्थ दुर्भावनावश किया गया प्रेम और विवाह है. हक़ीक़त में हम इसे प्रेम भी नहीं कह सकते हैं. ‘लव जिहाद’ का कंसेप्ट ही किसी की इच्छा के विरूद्ध प्यार व शादी के नाम पर उसका गैर इस्लाम से इस्लाम में धर्मांतरण कराना है.

फिर वो आगे बताते हैं कि प्यार में विवाह के नाम पर किसी के साथ धोखाधड़ी कर उसके जीवन को बर्बाद करने की इज़ाज़त हमारे यहां न तो कोई धर्म देता है और न ही कोई कानून…फिर चाहे वह इस्लाम धर्म हो या हिंदू धर्म या कोई अन्य धर्म…

आगे की बातों में उन्होंने केरल में हो रहे ‘लव जिहाद’ की घटनाओं का ज़िक्र किया. साथ ही उन्होंने कहा कि वो किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस अत्याचार और शोषण के विरुद्ध हैं, जो धर्म के आड़ में कुछ लोगों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है.

मोहब्बत और इस जिहाद नामी जंग के बारे में SFI के एक सदस्य नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि चाहे ‘लव जिहाद’ का मामला हो या यूनिफार्म सिविल कोर्ट का या  आर्टिकल-370का या फिर राम मंदिर फिर से बनाने की बात हो… इन सब मुद्दों पर बीजेपी की आइडोलॉजी हमेशा से बहुत खतरनाक रही है.

वो आगे बताते हैं कि आज़ादी से लेकर अब तक हमारे देश में सभी धर्म के लोग एक साथ पूरे भाईचारा के साथ रहते आये हैं. यह बहुत शर्मनाक है कि बीजेपी ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दे उठाकर लोगों को क्रिटिकली पोलोराइज करना चाहती है, क्योंकि ये एक ऐसा मुद्दा है जहां आम आदमी दिमाग से ज्यादा दिल से सोचता है.

कन्सर्न स्टूडेन्ट्स से जुड़े अभय कुमार जो कि जेएनयू में शोध छात्र हैं और 2012 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में छात्र संघ का चुनाव लड़े थे, का कहना है किमोदी की सरकार ने सत्ता में आने से पहले जो बड़े-बड़े वादे किये थे.देश में भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे. महंगाई जड़ से ख़त्म कर ‘अच्छे दिन’ ला देंगे. लेकिन ऐसा कुछ भी होता नहीं दिख रहा है. बल्कि उनके सारे वायदे रेत की तरह ढ़हते नज़र आ रहे हैं.

वो बीजेपी के तारीख से लेकर अब तक के राजनीती काल को दर्शाते हुए बताते कि इन्हें हमेशा से चंद ऐसे मुद्दे चाहिए ही होते हैं, जो लोगों के रोटी, कपड़ा, मकान, रोज़गार जैसे मुद्दों से हटा कर साम्प्रदायिकता के मुद्दे से जोड़ के रखे और लोगों में नफ़रत की आग धधकती रहे.

वो ‘लव जिहाद’ जैसे मामले को खारिज करते हुए बताते हैं कि सिर्फ मुसलमान लड़के ही हिन्दू लड़कियों से शादी नहीं करते, बल्कि हिन्दू लड़के भी मुसलमान लड़कियों से शादी करते हैं. शुरू से ही समाज में ऐसी शादियां होती आ रही हैं, जिसमें हिन्दू मुसलमान के साथ, मुसलमान हिन्दू के साथ,दलित अपर कास्ट के साथ, अपर कास्ट ने दलित के साथ शादी की है. और जहां प्यार होता है, वहां जिहाद नहीं होता. ये सरासर केन्द्र सरकार की सोची समझी चाल है.

जेएनयू कैम्पस हमेशा से हर मुद्दे पर मुखर रही है. लेकिन शायद यह पहली बार हो रहा था कि इस ‘लव जिहाद’ के मुद्दे पर मीडिया से बातचीत करने के लिए दूर भागते नज़र आएं. ज़्यादातर छात्रों ने इस मुद्दे पर बात करने से ही इन्कार कर दिया और जिसने भी बात की उन्होंने अपना नाम न प्रकाशित करने की शर्त रख दी. लेकिन एक सच यह भी है कि मीडिया के नज़रों से दूर इस मुद्दे पर जमकर बहस इस कैम्पस में जारी है….

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