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इस आज़ादी का मतलब क्या?

Afaque Haider for BeyondHeadlines

देश को आज़ाद हुए पूरे 68 साल हो गयें. मुल्क अपनी आज़ादी का 69वां जश्न मनाने जा रहा है. ये मौक़ा जश्न मनाने का तो है, लेकिन साथ ही आत्ममंथन का भी है.

कई सवाल आज भी मुल्क की बहुत बड़ी आबादी के मन में है कि आखिर इस 68 साल की आजादी से हमने क्या पाया, हमारे लिए इस आजादी का क्या मतलब हैं? हमें कौन सी आजादी नसीब हुई? जिन सिद्धांतों और लक्ष्यों के लिए भारत को आजाद किया गया था, क्या वह सारे लक्ष्य प्राप्त किये गयें? या फिर ये आजादी का जश्न महज़ रस्म अदायगी है.

मुल्क अंग्रज़ों की गुलामी से तो आज़ाद हो गया, लेकिन मुल्क आज भी गरीबी की गुलामी में जकड़ा हुआ है. आज भी हिन्दुस्तान की बड़ी आबादी पूंजीपतियों, सरमायादारों, नेताओं की गुलाम बन कर रह गयी हैं. इन्होंने इन 68 सालों में इनके पैरों में गरीबी, भूखमरी, बेरोज़गारी की जंजीरे डाल दी हैं. ये आबादी इसी गुलामी में जकड़ कर रही गयी है.

आज भी इस मुल्क में 70 प्रतिशत आबादी एक डॉलर से भी कम पर गुज़ारा करती है. आज भी हर तीसरा आदमी इस मुल्क का गरीबी रेखा से नीचे है. हर तीसरा आदमी भूखा है. तो ऐसे में उनके लिए इस आज़ादी के क्या मायने हैं. ये आज भी मुल्क के बहुत बडे तबके के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है, जिसका जवाब उन्हें आज तक नहीं मिला है.

आज भी हिन्दुस्तान में एक आंकडों के मुताबिक 60 लाख लोग फुटपाथ पर सोतें हैं. इन 67 वर्षों की आजादी ने उन्हें एक छत तक नहीं दिया और हर साल हजारों लोग जाडे में ठंड से और गर्मी में लू से मर जाते हैं.

आधी रात को अंग्रज़ों की गुलामी से जो आजादी मिली उसकी सुबह अभी होनी बाकी है. उस वक्त के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले से एतिहासिक भाषण दिया था “Tryst with destiny” जिसमें एक सुनहरे भविष्य का सपना भारतवासियों को दिखाया गया था, एक सम्पन्न, समृद्ध, विकसित राष्ट्र का सपना… लेकिन ये सपना केवल सपना बन कर ही रह गया.

गरीबी, भूखमरी, बेरोज़गारी, अन्याय, शोषण, अत्याचार, देशवासियों के जीवन की हकीकत बन गयी. गरीबी और भूखमरी की अंधेरी रात जो 68 वर्ष पूर्व हिन्दुस्तान को अपने चपेट में लिए हुई थी, इन 68 सालों बाद भी इस रात से मुल्क को निजात नहीं मिला. बल्कि गरीबी की काली रात दिन बा दिन बढ़ती ही चली गई. फैज़ की उम्मीदों की सुबह जो कभी तो आएगी इन 68 सालों में कभी नहीं आई.

इस देश का किसान, मज़दूर मेहनतकश तबका इन 68 सालों में सबसे अधिक शोषित हुआ. लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था ‘जय-जवान जय-किसान’ मगर उनका ये नारा सिर्फ नारा ही रह गया. पिछले दो दशकों में लाखों किसानों ने इस मुल्क में खुदकुशी कर ली, जो संसार का पेट पालने वाले थें. इस मुल्क में उनके लिए हालात इतने तंग हो गए कि उन्हें आखिरी राहे निजात खुदकुशी ही दिखाई देने लगी.

अकेले विदर्भ में हज़ारों किसानों ने आत्महत्या कर ली. बड़ी अजीब बात है कि कृषी प्रधान देश में सबसे अधिक इस आज़ादी की मार किसानों को ही पड़ी. देश को रोटी खिलाने वाले आज खुद दो जून की रोटी के लिए मोहताज हो गये. लाखों की तादाद में किसान अपनी ज़मीन छोड़ने के लिए इन बीते दो दशक में मजबूर हो गयें. विकास के नाम पर उनकी ज़मीने उद्योगपतियों को दे दी गयी. लाखों की तादाद में किसान गांव से शहरों की तरफ़ रोज़गार के लिए पलायन कर गए. गांव का भोलाभाला किसान शहरों  में  आकर मज़दूरी करने के लिए मजबूर हो  गया.

बापू ने ग्राम स्वराज का नारा दिया. उनका सपना था कि विकास गांव से शहरों की तरफ़ जाएगा. लेकिन इन 68 वर्षों की आज़ादी में विकास केवल महानगरों तक ही सीमित रहा गांव तक पहुंचा ही नहीं. आज भी देश में 5 लाख ऐसे गांव हैं जहां बिजली नहीं पहुंची,  अगर अदम गौंडवी के शब्दों में कहा जाए तो ‘‘ उलझ गई जो फाइलों की जाल में, बिजली पहुंचेगी गांव कितने साल में”

यहां तक कि इन 68 साल में लाखों गांव में ढंग का अस्पताल नहीं है. लोग गांव से शहरों में इलाज के लिए आते हैं. कई कई गांव में स्कूल नहीं, कोसो मील चलकर बच्चे स्कूल आते हैं. गांव के सरकारी स्कूलों में मेयारी तालीम की सख्त कमी है. अधिकतर स्कूल में छत और बलैक बोर्ड तक कि बुनियादी सुविधा नहीं है. इन 68 सालों में विकास गांव तक पहुंचा ही नहीं है, विकास महानगरों तक ही सीमित रह गया. ये सारे हालात एक ही सवाल पूछतें हैं कि इस आज़ादी के मायने क्या?

इंदिरा गांधी ने नारा दिया था ‘‘गरीबी हटाओ‘‘ लेकिन इतने सालों में गरीबी तो नहीं हटी. हां! सरकार ने गरीबों को हटाने का ज़रूर रास्ता चुन लिया. अब इस मुल्क में ग्रामीन क्षेत्रों में 32 रूपये कमाने वाला गरीब नहीं है. वह गरीबों को मिलने वाली किसी भी सहूलियत का हक़दार नहीं है. अब इन 32 रू प्रतिदिन कमाने वाले अमीरों के लिए इस आजादी के क्या मायने हैं.

नब्बे के दशक में भारत ने उदारीकरण की नीति अपनाई और विदेशी कंपनियों को भारत में व्यापार करने की खुली छूट दी. उस वक्त हुकूमत का तर्क था कि इससे समाज के अखिरी आदमी को फायदा होगा. समाज के आखिरी आदमी तक खुशहाली रस-रस कर पहुंचेगा. अर्थशास्त्रियों ने इसे नाम दिया था ‘‘ ट्रिकल डाउन थ्योरी‘‘ लेकिन अफसोस इन बीस सालों में पहुंचा तो केवल गरीबी, भूखमरी, अन्याय, शोषण, और अत्याचार.

बड़ी विदेशी कंपनियों को यहां कि ज़मीन, पहाड़, और प्राकृतिक संसाधन बेच दिये गये. इस विकास ने इतने लोगों को यहां बेघर किया जितना आस्ट्रेलिया में आबादी (ऐवरी बडी लव्स ए गुड ड्रौट, पी सायनथ) नहीं है.  पूजीपतियों की तादाद बड़ी तेज़ी से बढ़ी, लेकिन उससे भी तेजी से यहां गरीबों की तादाद बढ़ी.

गरीब जिस पहाड़ से अपना गुज़र बसर करते थें उन पहाडों को विदेशी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया. बडे़ बड़े डैम बना कर गांव के गांव डुबो दिये गये. उदारीकरण और भूमंडलिकरण ने इन्हें नई किस्म की आर्थिक गुलामी में जकड़ दिया. इन 68 सालों में इतने लोग घरों से निकाले गयें जितने कि कई देशों की आबादी तक नहीं होती है. इनके लिए इस आज़ादी के क्या मायने हैं जो घरों की तलाश में फुटपाथ पर आ गयें. बड़े सरामयादारों ने, पूंजीपतियों ने इनकी ज़मीने इनके खेत खलियान, इनके जंगल खरीद लिये. अब हुकूमते हिन्द नया कानून लाकर बची-कुची कसर भी पूरी कर देगी.

भगत सिंह ने एक सामाजवादी भारत का सपना देखा था, जहां सबके साथ सामाजिक और आर्थिक न्याय होगा. जहां समाज के हर तबके को बराबरी के साथ देश के संसाधनों में हिस्सा होगा. देश पर उनका बराबर का अधिकार होगा. लेकिन आज हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं. देश के अधिकतर संसाधनों पर चार से पांच घरानों का ही कब्ज़ा है. देश की पूरी दौलत सिर्फ चंद घरानों तक ही सीमित रह गयी. आज भी समाज का बड़ा वर्ग समाजिक और आर्थिक न्याय से वंचित रह गया है. देश की एक बड़ी आबादी तक संसाधनों का लाभ पहुंचा ही नहीं.

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के अनुसार किसी भी समाज की दशा वहां की महिलाओं के हालात को देखकर लगाया जा सकता है. इस देश में आज़ादी के इतने सालों के बाद भी महिलाओं की क्या स्थिती है, महिलाओं से जुडे कुछ आंकड़ों को ही सामने रखकर समझा जा सकता है.

पिछले दस सालों में 5 लाख बच्चियां गर्भ में मार डाली गई. महिलाओं के खिलाफ़ होने वाले अपराध ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. कहां तो बेटियां बेड़ी तोड़ते हुए चांद पर पहुंच गई, मगर इस देश में इनके लिए  कोई एक सुरक्षित जगह तक नहीं बन पाया है. हर सेकेंड कोई ना कोई महिला यौन शोषण की शिकार हो रही है. लैंगिक न्याय में भारत आज भी पिछड़े देशों की सूची में आता है. महिलाओं के खिलाफ़ हो रहे जुल्म और ज्यादती विदेशी स्तर पर भारत की छवि बना रही है. यहां आए दिन होने वाले बलात्कार दूसरे देशों के हेडलाईन बन रहे हैं. ऐसे में देश की इस आधी आबादी के लिए इस लोकतंत्र के क्या मायने हैं.

बात अगर सियासी आज़ादी और जम्हूरियत की कि जाए तो देश में कभी जनता के हाथों में शासन पहुंचा ही नहीं. देश में आज भी लोकतंत्र केवल कुछ परिवारों तक ही सीमित रह गया. आखिर ये कैसा लोकतंत्र है जहां परिवारवाद हावी है. देश का पूरा लोकतंत्र चार पांच घरानों तक ही सीमित है.

स्वतंत्रता संग्रामी राम मनोहर लोहिया कहते थे कि पार्टी परिवार होता है. लेकिन हमारे देश के रहनुमाओं ने तो पार्टी को ही परिवार बना लिया है. यहां तक कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के द्वारा चुनी गयी सरकार को भी एक संगठन चलाता है. ऐसे में देश की आज़ादी का क्या मतलब है. जहां लोकतंत्रनुमा सरकार तो है लेकिन लोकतंत्र की तलाश आज तक देश की जनता कर रही है.

इस आज़ादी का मतलब इस देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यकों के लिए क्या है ? जो इन 68 सालों की आज़ादी में मुसलसल पस्ती की तरफ़ ढकेले गयें. इन 68 सालों में जितने भी रिपोर्ट उनके सामाजिक और आर्थिक हालात को जानने के लिए बने हर रिपोर्ट ने उनकी बदहाली की तस्दीक की, लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ सियासी वोट बैंक के तौर पर किया गया. मुरादाबाद, मेरठ, जमशेदपुर, गुजरात, बाम्बे… ये सब वह ज़ख्म है जो इस मुल्क के जम्हूरियत ने उन्हें दिये. ऐसे में इस आज़ादी का मतलब उनके लिए क्या है?

आज भी देश की बहुत बड़ी आबादी उस सुबह के इंतज़ार में है, जिसका वादा किया गया था. लेकिन ये सुबह आज तक नहीं हुई. दरहकीकत हिन्दुस्तान जिन सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को लेकर आज़ाद हुआ था. वह लक्ष्य आज तक पूरे नहीं हुए. हिन्दुस्तान को आधी रात में आजादी नसीब हुई थी जिसकी सुबह आज तक नहीं हुई. हिन्दुस्तानी की बहुत बड़ी आबादी इस आजादी के सूरज की मुतंजिर है. आखिर में अदम गौंडवी के ये लफ्ज़

‘‘सौ में नब्बे जब नाशाद हैं

दिल पर हाथ रख कर कह

देश फिर कैसे आाज़द है‘‘

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