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दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक नागरिकों की बेदख़ली के ख़िलाफ़ जन हस्तक्षेप

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BeyondHeadlines News Desk

हरियाणा में बहुत सारे गाँवों में दलितों को सवर्ण जातियों ने हमला कर के गाँव से भगा दिया. मिर्चपूर और भगाना इस कड़ी के नए नाम भर हैं. इस तरह गाँव से हमला करके ज़बरदस्ती विस्थापित कर दिए गए दलित आज तक भी अपने गाँव वापस नहीं लौट सके हैं. उनकी घरेलू और खेती की ज़मीनों पर दबंग जातियों ने कब्ज़ा कर लिया.

अभी हाल ही में इसी तरह से अटाली गाँव के मुसलमानों को भी हमला करके, उन्हें उनके घरों से निकाल कर गाँव से भगा दिया गया है. हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि ये मुसलमान वापस जाने में डर रहे हैं. कैम्पों में ज़िन्दगी गुज़ारने को मजबूर हैं. भाजपा सरकार अपराधी दबंगों के साथ है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सरकार ने ठीक इसी तरह सलवा जुडूम चलाया था. वहाँ सरकार ने आदिवासियों के साढ़े छह सौ गाँव जला दिए थे और आदिवासियों को उनके गाँव से भगा दिया था.

अब सवाल है कि क्या भारत में अब ताकतवर समुदाय, कमज़ोर समुदाय को लूट पीट कर उसकी संपत्ति पर इसी तरह क़ब्ज़ा करते रहेंगे? क्या भारतीय समाज इन सबको ऐसे ही चुपचाप देखता रहेगा? क्या इसे हम लोकतंत्र मानते रहेंगे? अपने ही देश में नागरिक शरणार्थी बनकर रहने जीने को मजबूर किये जाते रहेंगे?

इसी सब सवालों को लेकर कुछ लोकतान्त्रिक मिजाज़ के साथी 14 तारीख शुक्रवार को चार बजे, गांधी पीस फाउन्डेशन –दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर बैठ रहे हैं ताकि अपने लोकतान्त्रिक मिज़ाज वाले देश में संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमारे अगले क़दम की योजना बना सकें.

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