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क्या सरकार कर रही है नैतिक पहरेदारी की कोशिश?

Siraz Mahi for BeyondHeadlines

पोर्नोग्रीफी को शायद किसी भी सभ्य समाज में सही नहीं कहा जा सकता. शायद इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने पोर्नोग्रीफी पर काबू पाने के लिए 2 जुलाई को 857 अश्लील वेबसाईटों पर प्रतिबन्ध लगा दिया, जिसे काफी हद तक सही क़दम माना जा सकता है.

अश्लील वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाने की मांग लंबे समय से उठती रही है. खासकर कम उम्र के बच्चों पर इनके नकारात्मक असर को लेकर चिंता जताई जाती है. इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी का दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि इनमें बच्चों के दुरुपयोग वाली सामग्री को छांटकर उन्हें प्रतिबंधित करना बड़ी चुनौती है. इसीलिए सरकार ने फिलहाल ऐसी आसान पहुंच वाली 857 वेबसाइटों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने को कहा है. माना यह भी जा रहा है कि यदि यही हाल रहा तो सरकार उन वेबसाइटों को भी प्रतिबंधित कर सकती है, जिन्हें वयस्कों के लिए माना जाता है.

हालांकि पोर्नोग्राफी को प्रतिबन्धित करने के पीछे सरकार की एक और मंशा बताई जाती है. वह ये है कि सरकार इंटरनेट पर नियंत्रण करना चाहती है. जिसकी यह शुरुआत है. पोर्नोग्राफी के बारे में हर देश संस्कृति अलग होने के बावजूद इससे नफ़रत करते है, चाहे वह सुन्नियों का देश सऊदी अरब हो, शियाओं का देश इरान हो, चाहे वह कम्युनिस्टों का देश चीन हो. हालांकि लोकतांत्रिक देश में पोर्नोग्राफी देखना बेहद निजी मामला है. इसको नियंत्रित करना मानों व्यक्ति की सोच और इच्छाओं को नियंत्रित करना है. यह लोगों के सबसे निजी आजादी पर प्रहार करता है. इसीलिए कहा जा रहा है कि बच्चों से संबंधित पोर्न सामग्री पर रोक लगाने के बहाने सरकार वयस्क नागरिकों के भी निजी क्षणों और जगहों को नियंत्रित करने और नैतिक पहरेदारी की कोशिश कर रही है.

सच पूछे तो निजी तौर पर कोई वयस्क इंटरनेट पर किस तरह की सामग्री को देखता-पढ़ता है, इसमें सरकार को दखल नहीं देना चाहिए. पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश एच.एल. दत्तू ने भी कहा था कि कोई व्यक्ति अपने निजी क्षणों में क्या देखता है, यह तय नहीं किया जा सकता. मगर सरकार के लिए यह बड़ी मुश्किल है कि वो कैसे सुनिश्चित करे कि इंटरनेट पर मौजूद पोर्न सामग्री अगर वयस्कों के लिए आसानी से उपलब्ध है तो वह बच्चों की पहुंच से दूर हो. दरअसल, यह जितना वयस्क नागरिकों की निजी जिंदगी के अधिकारों से जुड़ा मसला है, उतना ही संस्कृति से जुड़ा मामला भी है.

पोर्न फिल्मों या वीडियो में प्रदर्शित सामग्री व्यक्ति की यौन इच्छाओं को शांत तो करती है, पर यौन शिक्षा और जानकारी के अभाव में एक तरह की कुंठा भी पैदा करती है. इससे ही प्रेरित युवा वर्ग कई बार स्त्रियों के प्रति प्रत्यक्ष यौन-हिंसा भी करते हैं. सही जानकारी न होने की दशा में पोर्न सामग्री से निर्मित मानसिकता आमतौर पर व्यक्ति में नकारात्मक यौन ग्रंथियां ही विकसित करती हैं. मगर सच यह है कि इंटरनेट पर ऐसी सामग्री की आसान उपलब्धता के चलते बड़ी तादाद में लोग इसकी ओर आकर्षित होते हैं, जिनमें किशोरों से लेकर कम उम्र के बच्चे भी शामिल हैं. जिससे कोमल मन-मस्तिष्क वाले बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है. इसलिए ऐसी सामग्री तक पहुंच के मसले का नियमन ज़रूरी है.

जानकारों की मानें तो सरकार का पोर्न साइटों पर प्रतिबन्ध लगाना निरर्थक है. चाईना और अमेरिका जैसे देश अपने यहां पोर्न साइटों पर प्रतिबन्ध लगा चुके हैं, लेकिन लोग फिर भी दूसरी वेबसाईटों पर पहुंचते रहे. यहां की सरकारें सिर्फ चाईल्ड पोर्नोग्राफी रोकने में सफल रही हैं. बच्चों के प्रति यौन-हिंसा रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह उन व्यक्तियों को रोके जो बच्चों के प्रति आकर्षित होते हैं.

हालांकि सरकार द्वारा पोर्न वेबसाइटों को प्रतिबन्धित करने का दुष्परिणाम भी हो सकता है.  कुछ लोग इससे काला धंधा करना शुरू कर देंगे. जो लोग अभी तक पोर्न सामग्री देख रहे थे उनकी जिज्ञासा बनी रहेगी. इसका फायदा उठाकर अवैध तरीके चोरी छिपे पोर्न फिल्में बनाई जाएंगी. फिर इसकी सीडी बाजारों में ज्यादा कीमत पर बेची जाएंगी. सरकार को इस पहलू पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है.

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