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जर्मन मुसलमानों की मदद क्यों कर रहे हैं?

BeyondHeadlines Editorial Desk

अपने वतन, अपने अजीज़ों से बेदख़ल, बेसहारा लोग यूरोप में नई ज़िंदग़ी की तलाश में अपनी जान दांव पर लगाकर बेहद ख़तरनाक़ सफ़र तय कर रहे हैं. कुछ डूब रहे हैं, कुछ पहुँच रहे हैं. कुछ का सफ़र जारी है, बाक़ी है.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सबसे बड़ी मानवीय त्रास्दी घटित हो रही है. दसियों लाख नागरिक शरणार्थियों में तब्दील हो रहे हैं. मानवता के सामने इंसानियत को बचाने की चुनौती है. और इस बेहद चुनौतीपूर्ण माहौल में जब यूरोप के देश अपनी सीमाओं पर कंटीली तारें लगा रहे हैं, जर्मनी ने अपना दिल और बांहें दोनों खोल दी हैं.

शरणार्थियों के लिए रास्ते बंद करने वाले हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान जब मुसलमानों से ईसाइयत को बचाने की दुहाई देते हैं तो जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल मानवीय ज़िम्मेदारी को तरजीह देते हुए शरणार्थियों की मदद को ‘नैतिक और क़ानूनन’ ज़िम्मेदारी बताती हैं.

एक और जहाँ कई यूरोपीय देश शरणार्थियों के लिए अपने रास्ते बंद कर रहे हैं वहीं न सिर्फ़ जर्मन सरकार बल्कि आम जर्मन नागरिक भी बढ़-चढ़कर हर संभव मदद कर रहे हैं.

छोटे-बड़े शहरों में चंदा किया जा रहा है. ज़रूरतों का सामान जुटाया जा रहा है. मदद करने की भावना का आलम यह है कि लोग मदद करने के लिए अपनी बारी का इंतेज़ार कर रहे हैं.

ब्रितानी समाचार सेवा बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी में लोगों ने शरणार्थियों के लिए अपने घर तक  खोल दिए हैं.

एक सवाल मन में उठता है कि ऐसे माहौल में जब फ़्रांस इस्लामी चरमपंथ की दुहाई देकर मुसलमानों के प्रति सख़्त हो रहा है. ख़ुद को इंसानियत और मानवाधिकारों का पैरोकार बताने वाला ब्रिटेन भी शरणार्थियों की मदद न करने के बहाने तलाश रहा हो. (ये अलग बात है कि वैश्विक दबाव में ब्रितानी प्रधानमंत्री को ब्रिटेन में शरणार्थियों को स्वीकार करना पड़ रहा है) तब जर्मनी इतना बढ़-चढ़कर मुसलमान शरणार्थियों की मदद क्यों कर रहा है?

इसका जवाब शायद जर्मनी के इतिहास में है. जर्मनी को दूसरे विश्व युद्ध का ख़लनायक कहा जाता है. उसके माथे पर हज़ारों यहूदियों के क़त्ल का दाग़ है.

जर्मनी के लोगों में दूसरे विश्व युद्ध की त्रास्दी को लेकर अपराधबोध है.

आज विश्व की आर्थिक महाशक्ति बन चुका जर्मनी सबसे विश्व का सबसे खुला और धर्मनिर्पेक्ष समाज भी है.

आज जब दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रास्दी घटित हो रही तब जर्मनी मानवता को बचाने के इस मौक़े को  खोना नहीं चाहता है. और ये फ़ैसला सिर्फ़ जर्मन सरकार का नहीं है बल्कि जर्मनी के लोगों की आम भावना भी इसमें शामिल हैं.

यहाँ हुए तमाम सर्वे बताते हैं कि आम जर्मन लोग शरणार्थियों की मदद करना चाहते हैं. एक अनुमान के मुताबिक इस साल जर्मनी क़रीब आठ लाख शरणार्थियों की स्वीकार करेगा. ये संख्या पिछले साल के मुक़ाबले चार गुणा ज़्यादा है.

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल जिन्हें शरणार्थी ‘माँ’ पुकार रहे हैं सबसे ऊंचे क़द की नेता बनकर उभरी हैं.

जर्मनी युद्ध पीड़ित मुसलमानों की मदद क्यों कर रहा है इसका सबसे सरल जवाब यही है कि जर्मनी अपने देश में नई ज़िंदग़ी की उम्मीद में दाख़िल हो रहे लोगों को मुसलमान नहीं इंसान समझ रहा है और अपनी मानवीय ज़िम्मेदारी पूरी कर रहा है.

शायद जर्मनी के लोग इंसानियत को सबसे बेहतर ढंग से समझते हैं, क्योंकि उन्होंने युद्ध के सबसे वीभत्स रूप को देखा है.

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