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… तब चुनाव आयोग को भी केन्द्र परस्त/मोदी परस्त मान लेने में क्या ख़राबी है?

Hemant Kumar

अगर विकास वैभव को पटना के एसएसपी पद से हटाना गलत था, तो मनु महाराज को वापस गया भेजना सही कैसे हो गया?

चुनाव आयोग को अपने फैसले का आधार सार्वजनिक करना चाहिए. नहीं तो माना जायेगा कि चुनाव आयोग में दिल्ली के उप-राज्यपाल नजीब जंग की आत्मा घुस गयी है, जिनके हर फैसले से सियासत की बू आती रहती है. संविधान और कानून के नाम पर लिये गये तमाम फैसले जनहित में ही लिये गये माने जायें ,ऐसा हो नहीं सकता.

विकास वैभव या मनु महाराज ‘जनता के अफसर’ हैं, ऐसा मानने का मेरे पास कोई आधार नहीं है. ये पटना में रहें या पूर्णिया में, इससे आमजन की सेहत पर कोई असर पड़ता नहीं दिखता. इनके तबादले से कहीं मातम मनते या कहीं पटाखे फूटते किसी ने नहीं देखा होगा.

सवाल उठता है कि अगर नीतीश कुमार ने राजनीतिक फायदे के लिए अफ़सरों को हटाया, तो यह क्यों न मान लिया जाये कि आयोग ने राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर चुनिंदा अफ़सरों को इधर से उधर किया है.

रही बात आमिर सुबहानी को गृह सचिव के पद से हटाने की तो यह सच है कि उन्होंने गृह विभाग में लंबा समय बिताया है. लेकिन अपने नये कार्यकाल में तो वह साल भर पहले ही इस महकमे में आये थे. फिर भी उनके तबादले पर चुप रहा जा सकता है. आयोग इस फैसले को चुनाव की निष्पक्षता के लिहाज से अपनी ही बनायी परिपाटी के आधार पर जायज़ बता सकता है.

लेकिन आयोग को हमेशा याद रखना होगा कि निष्पक्षता का दिखावा करना और निष्पक्ष होना, दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है.

बिहार विधानसभा चुनाव, 2015 के चुनाव प्रोग्राम जिस तरह के बनाये गये हैं, उसमें भी आयोग की मनमानी नज़र आती है. सबसे पहले तो पांच चरणों में चुनाव कराना सही नहीं जान पड़ता. बीते लोकसभा चुनाव में चरणवार चुनाव का सियासी फायदा कैसे उठाया गया, यह सबको पता है. चुनाव प्रचार से लेकर विज्ञापन जारी करने तक में आयोग के नियमों में बने ‘बड़े-बड़े छेदों’ का इस्तेमाल किया गया. आयोग मुंह ताकते रह गया.

अभी बिहार को छोड़कर कहीं चुनाव नहीं है. पुलिस या सीपीएमएफ की कोई कमी नहीं है. तब आयोग एक या दो चरणों में चुनाव करा सकता था. ऐसी मांग भी हो रही थी. लेकिन आयोग ने इसे ठुकरा दिया. अब अगर यह आशंका जतायी जा रही है कि लंबे चुनाव प्रोग्राम का फायदा हवा बनाने-बिगाड़ने में माहिर राजनीति के खिलाड़ी करेंगे, तो इसे निराधार नहीं कहा जा सकता है.

फिर चुनाव प्रोग्राम में पहले से लेकर अंतिम चरण तक में जिस तरह क्षेत्रों समायोजित किया गया है, उससे भी लगता है कि एक खास दल के प्रभाववाले इलाके को पहले और दूसरे चरण में डाला गया है ताकि उस दल को कमजोर प्रभाववाले इलाके में हवा बनाने का अवसर मिले.

और हां! आयोग किन अफ़सरों को चुनाव कार्य में लगायेगा या अलग रखेगा, यह तय करने के मापदंड बने हुए हैं. मसलन, तीन साल से अधिक अवधि तक की पोस्टिंग या अतीत में आयोग की ओर से अनिफट अथवा दागी घोषित किये गये अफ़सरों को चुनाव कार्य से अलग रखा जाता है. मेरी जानकारी में ज्ञात आधार तो यही है.

आयोग ने जिन अफ़सरों को इधर से उधर किया है, उनमें से शायद कोई भी इस दायरे में नहीं आता है. तब क्यों नहीं माना जाये कि नीतीश सरकार जिन अफ़सरों को पसंद करती है, मौजूदा चुनाव आयोग उन्हें नापसंद करता है. सरकार की पसंद-नापसंद का मामला तो समझ में आता है. यह सरकार का ‘विशेषाधिकार’ है और सरकार को राजनीति भी करनी है. लेकिन चुनाव आयोग को कोई नाम पसंद या नापसंद क्यों होने लगा?

अगर आयोग राजनीतिक पूर्वाग्रह से काम नहीं कर रहा है, तो उसे किसी को हटाने या लगाने से पहले उसका कामकाज ही तो देखना है. पर, आयोग ने ऐसा कुछ नहीं किया है. क्या आयोग यह मानकर काम कर रहा है कि नीतीश के तैनात किये गये तमाम अफसर निकम्मे,बेईमान और पक्षपाती हैं. आयोग का यह रवैया, तो उन अफ़सरों की निजी और सार्वजनिक छवि के भी खिलाफ़ है, जिन्हें आयोग की वजह से नीतीश समर्थक मान लिया गया है.

किसी ने अगर किसी कथित घूसखोर अफसर की चर्चा की है, तो घूसखोरी के आधार पर कितने अफसरों को चुनाव में लगाया या हटाया जाता है?

आयोग के ये फैसले उसकी निष्पक्षता पर संदेह का आधार प्रदान करते हैं.

और अंत में! जिन अफ़सरों से जिलों की कमान छिनी गयी है ,उन्हें सरकार परस्त मान लिया गया है. तब चुनाव आयोग को भी केन्द्र परस्त/मोदी परस्त मान लेने में क्या ख़राबी है.

(लेखक पटना में सीनियर पत्रकार हैं. ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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