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बीजेपी सांसद के ताक़त का मारा एक लाचार ऑटो वाले की कहानी!

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By Afroz Alam Sahil

बीजेपी की पूर्व राज्यसभा सांसद कुसुम राय की ताक़त का मारा एक लाचार शख्स अब ‘ज़िन्दा लाश’ में तब्दील हो चुका है. बिहार के ज़िला पश्चिम चम्पारण के शहर बेतिया में जन्में इस शख्स का नाम मृत्यूंजय तिवारी है.

आज से क़रीब 20 महीना पहले 16 जून, 2014 को दिल्ली में इस ग़रीब आदमी को कुसुम राय की बेटी मधुलिका ने टक्कर मार दी. इस टक्कर में तिवारी बुरी तरह से ज़ख़्मी हो गएं.

मौक़े पर पुलिस भी पहुंची. एफ़आईआर भी दर्ज हुआ. मगर कुसूम राय के रसूख के आगे इसके इंसाफ़ की लड़ाई में कुछ भी हासिल नहीं हो सका.

39 वर्षीय ऑटो ड्राईवर मृत्युजंय कुमार तिवारी आज भी 16 जून की उस रात को याद करके दहल उठते हैं. आंखों से आंसू रूकने का नाम नहीं लेता.

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वो बताते हैं कि उस रात कस्तुरबा गांधी मार्ग पर ऑटो चलाते हुए आ रहे थे. जैसे ही फिरोज़शाह रोड के क्रासिंग पर पहुंचे तो सामने देखा कि एक कार जो बहुत तेज़ रफ्तार से उनकी तरफ़ आ रही है. इन्होंने अपना ऑटो धीमा कर लिया. लेकिन उस कार ने सीधा आकर एक ज़ोरदार टक्कर मार दी.

तिवारी का आरोप है कि उस लड़की ने शराब पी रखी थी. पुलिस उसे पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने ले गए. वहां एफ़आईआर भी दर्ज किया और उसकी कापी भी मुझे दी, (BeyondHeadlines के पास एफ़आईआर की कापी मौजूद है और उस पर लड़की का नाम मधुलिका, पिता का नाम राजेश राय और पता C-704, स्वर्ण जयंती अपार्मेंट, विशाम्भर दास मार्ग, नई दिल्ली-1 दर्ज है. एफ़आईआर के मुताबिक़ कार हुंडई वर्ना जिसका नम्बर DL-3CBL-9999 थी.) लेकिन जैसे ही पुलिस वालों को पता चला कि वो भाजपा राज्यसभा सांसद कुसुम राय की बेटी है. तुंरत इस मामले को दबाने में लग गए.

इंसानियत की हदें पार करने वाली घटना तब हुई उसको कुसुम राय के दबाव में अस्पताल से मिल रहे इलाज से ही महरूम कर दिया गया.

तिवारी का कहना है कि मुझे काफी गंभीर चोट लगी थी. मेरी एक टांग भी टूट गई थी.  पुलिस वाले ही मुझे राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले गए. लेकिन अगले ही दिन रात में अस्पताल वालों ने हमें निकाल दिया. उस रात हम हॉस्पीटल के गेट के बाहर थे. फिर उसके बाद कौशाम्बी के सर्वोदय ट्रामा सेन्टर गए. वहां प्लेटलेट्स की कमी बताई गई, मैं अपने भाई के प्लेटलेट्स से ज़िन्दा हूं.

तिवारी कहते हैं कि छह दिनों तक मैं बेहोश रहा. सातवें दिन होश आया. फिर मुझे दिल्ली के लोक नायक हॉस्पीटल रेफर कर दिया गया. इस हॉस्पीटल ने भी आधे घंटे में ही बाहर कर दिया. मेरी हालत काफी बिगड़ गई. अस्पताल के रेफर करने पर भाई मुझे फिर राम मनोहर लोहिया लेकर गया, लेकिन वहां अन्दर भी नहीं जाने दिया गया. फिर हम मजबूरन महरौली के भगवती हॉस्पीटल गए. वहां मुझे खून चढ़ाने की बात कही गई. जहां भाई ने खून खरीदा.

तिवारी के मुताबिक़ इसी अस्पताल में उसकी मुलाक़ात आम आदमी पार्टी कार्यकर्ता बंसल से हुई. वो उसे तेग़ बहादुर अस्पताल लाएं. वहां से मुझे दिल्ली स्टेट कैंसर हॉस्पीटल भेजा गया. जहां बताया गया कि मुझे ब्लड कैंसर है. बंसल साहब ने अपने स्तर पर बातचीच करके मैक्स हॉस्पीटल ले आए. मुझे यहां ज़िन्दा रखने के लिए इलाज चल रहा है.

हालांकि यहां इलाज के बाद तिवारी अब सही हो गए हैं. उनके मुताबिक़ एक पैर के अंदर रॉड डाली गई है. एक पैर करीब पौना इंच छोटा भी हो गया है. तिवारी के अपना हैंडीकैप सर्टिफिकेट पाने की कहानी भी काफी चिंतनीय है.

जब हमने पूछा कि –‘आपको कैसे मालूम कि मधुलिका सांसद की बेटी है?’ तो तिवारी ने बताया कि उस रात टक्कर मारने के बाद वो खुद कार से उतर कर चिल्लाकर बोली कि दो दिन पहले लंदन से आई हूं. तुम्हे मेरे ही गाड़ी के नीचे आना था. जानते हो मैं सांसद की बेटी हूं. शायद वो बहुत अधिक नशे में थी. अगले दिन एक दो अख़बारों में भी यह ख़बर आयी.

वो रोते हुए बताते हैं कि मेरे पिता घर ज़मीन बेचकर मेरा इलाज करा रहे हैं. मेरे चार बच्चे हैं. तीन लड़कियां हैं. क्या होगा मेरे बाद उन सबका… यह सब बताते हुए वो फूट-फूट कर रो पड़ते हैं. फिर हौसले के साथ बोलते हैं –ज़िन्दा रहा तो लड़ूंगा… इंसाफ़ मिलने तक लड़ूंगा…

यह मामला अब अदालत में है. इधर ये बेचारा गरीब अपनी ज़िन्दगी बचाने की जद्दोजहद में है तो उधर रसूखदारों की पूरी की पूरी जमाअत अपनी ताक़त और रसूख का मुज़ाहिरा करने में लगी हुई है.

राज्यसभा की बेटी की गाड़ी की रफ्तार आज भी ज्यों का त्यों है, मगर बेचारा तिवारी एक के बाद दूसरे ज़ख्म को झेलता हुआ हर रोज़ मौत की ओर कई क़दम बढ़ रहा है. पुलिस प्रशासन से लेकर दिल्ली के कई बड़े अस्पताल तक सब उस रईसज़ादी लड़की के साथ खड़े हैं. और इधर इस बेचारे ग़रीब के साथ सिर्फ उसकी तक़दीर है, जो ताक़त और रसूख के इस ज़लज़ले के आगे लगभग घुटने टेक चुकी है.

सच तो यह है कि दिल्ली की अदालत में अपनी लड़ाई लड़ रहा ये शख़्स अब बुरी तरह से टूट चुका है. इसके पास अपने हक़ के पाने के ख़ातिर ज़रूरी सारे काग़ज़ात, दस्तावेज़ और सबूत मौजूद हैं. सिर्फ़ ज़रूरत है समाज के उस जागरूक तबक़े की, जो इसकी लड़ाई को हाथों-हाथ ले सके और ‘ज़िन्दा लाश’ में तब्दील हो चुके इस शख़्स को नई ज़िन्दगी दे सके.

तिवारी की यह कहानी बताती है कि सत्ता की हनक कितनी निर्मम होती है. कुसूम राय उसी बीजेपी की सदस्य हैं, जो ‘सबके साथ –सबका विकास’ का दावा करती है. मगर दावे की हक़ीक़त यह है कि ये शख़्स सत्ता के इन रसूखदारों के अत्याचारों के चलते ज़िन्दगी और मौत के दहलीज़ पर खड़ा है और सुनवाई करने वाला कोई नहीं है.

दुआ कीजिए कि इस लड़ाई में तिवारी को ताक़त मिले और कम से कम इंसाफ़ की उम्मीद न मरने पाए….

मृत्यूजंय तिवारी का एक पत्र आप यहां पढ़ सकते हैं :

एक ग़रीब ऑटो ड्राईवर का देशवासियों के नाम एक खुला पत्र

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