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हिन्दी पत्रकारिता और मेरी कहानी…

सिराज माही, BeyondHeadlines

आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है. इसलिए हिंदी पत्रकारिता की असलियत से थोड़ा रूबरू हो लिया जाए.

साल 2013 में दिल्ली के ओखला स्थित ‘रेहाब इंडिया फाउंडेशन’ नामक एक ग़ैर-सरकारी संस्था ने 12 मुस्लिम छात्र-छात्राओं को पत्रकारिता के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की थी. आज उन 12 मुस्लिम छात्र-छात्राओं में से मात्र दो पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं, बाक़ी 10 लोग इस क्षेत्र से तमाम मुश्किलों के चलते किनारा कर चुके हैं. और जो 2 लोग पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं वो कब पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम पकड़ लें कहा नहीं जा सकता.

ऐसा नहीं है कि जो 10 मुस्लिम बच्चे पत्रकारिता छोड़ चुके हैं वह बहुत अच्छी स्थिति में हैं या बहुत खराब स्थिति में हैं, बल्कि उन्हें पत्रकारिता में जगह नहीं मिली, इसलिए उन्हें पत्रकारिता छोड़ दूसरा काम करना पड़ा.

पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना उज्जवल भविष्य देखने वाले ये 10 पत्रकार जब दिल्ली और अपने राज्य में पत्रकारिता के क्षेत्र में नौकरी तलाश कर थक गए तो फिर खुद को दूसरे कामों में लगा लिया. इनमें से जो लड़कियां थीं, उन्होंने अपने घर का चूल्हा संभाल लिया.

पत्रकारिता कर रहे दो लोगों में मैं भी शामिल हूं. मैं अभी हिंदी पत्रकारिता से जुड़ा हूं, इसलिए अपनी बात करता हूं. हमें दिल्ली में आए हुए चार साल हो गए हैं. यहां हमें हिंदी पत्रकारिता के बड़े संस्थानों के आस-पास भी किसी ने भटकने नहीं दिया. हां, सीनियर पत्रकार और मेरे अध्यापक प्यूश बबेले जो इंडिया टुडे से जुड़े हैं, स्वतंत्र मिश्र जो फ़िल्हाल नेटवर्क-18 से जुड़े हैं, इनकी बदौलत दो चार जगह साक्षात्कार के लिए ज़रूर गया. धन्यवाद इन दोनों अध्यापकों का. लेकिन यह सिलसिला भी मात्र साक्षात्कार तक ही सीमित रहा. या यूं कहें कि हममे इतनी पोटाश नहीं थी.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ गैर-मुस्लिमों ने हिंदी पत्रकारिता में हमें जगह नहीं दी, बल्कि मुसलमानों का काम भी इस मामले में कम घिनौना नहीं है. चार सालों में अक्सर मुस्लिम पत्रकारों से मिलना जुलना रहा. कुछ मुस्लिम लोगों ने क़ौम की ख़िदमत के लिए या दूसरे शब्दों में कहें तो मुसलमानों से ही मुस्लिम के नाम पर पैसा ऐंठने के चक्कर में वेबसाइट शुरू की. इसमें से तीन-चार जगह काम करने का मौक़ा भी हमें मिला. कहीं दो महीने तो कहीं चार महीने काम किया. लेकिन इन लोगों ने पैसे के नाम पर सिर्फ़ दिल ही बहलाया. उस तन्ख़्वाह में भी आधे से ज़्यादा पैसा मार लिया गया.

उर्दू पत्रकारिता में काम कर रहे मुसलमान पत्रकारों की तो स्थिति और भयावह है. मैंने अपने बड़े  भाई से कई बार मुसलमान पत्रकारों की असलियत के बारे में सुना है, जो उर्दू अख़बारों में काम करते हैं. इनकी कहानी और भी भयावह है. वह अक्सर हमें मेहनत से काम करने की सलाह देते रहते हैं. वह बताते हैं कि मैं ऐसे भी मुसलमान पत्रकारों से मिला हूं, जे सिर्फ़ चार हज़ार रुपए में ही काम करते हैं और अपना पूरा ख़र्च चलाते हैं. 

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