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Reading: निमेष आयोग ने उठाए यूपी पुलिस पर सवाल
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BeyondHeadlines > Exclusive > निमेष आयोग ने उठाए यूपी पुलिस पर सवाल
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निमेष आयोग ने उठाए यूपी पुलिस पर सवाल

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published December 3, 2012 22 Views
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19 Min Read
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Afroz Alam Sahil & Dilnawaz Pasha for BeyondHeadlines

23 नवंबर 2007 को उत्तर प्रदेश के तीन शहरों लखनऊ, फैजाबाद और वाराणासी में 25 मिनट के भीतर सिलसिलेवार धमाके हुए. इन धमाकों में 18 लोग मारे गए और 21 घायल हुए. उत्तर प्रदेश में हुए इन धमाकों से दिल्ली तक दहल गई.

आतंक के साए में जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी. इसी बीच 12 दिसंबर 2007 को अपने यूनानी दवाखाने से लौट रहे एक डॉक्टर को टाटा सूमो में सवार कुछ अज्ञात लोग उठा कर ले गए. 16 दिसंबर 2007 को ऐसी ही एक घटना में एक शिक्षक को टाटा सूमो से उठा लिया गया.

अचानक गायब हुए इन लोगों के परीजन परेशान हो गए. पुलिस थाने के चक्कर काटे. अख़बारों में उनकी गुमशुदगी खबर बनी. कुछ स्थानीय राजनेताओं ने बड़े-बड़े अधिकारियों को ज्ञापन दिए. धरने-प्रदर्शन हुए. सवाल खड़े हुए. अचानक अपहरण किए गए युवकों के परिजनों ने उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने की हर संभव कोशिश की. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला.

14 दिसंबर 2007 को डॉक्टर के परिजनों ने स्थानीय थाने रानी सराय में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई. स्थानीय नेताओं ने अपहृत किए गए डॉक्टर के विषय में जानकारी पाने के लिए जिला मुख्यालय पर धरना भी दिया तथा मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा. परिजनों ने डॉक्टर के बीएसएनएल के मोबाइल को भी सर्विलांस पर लगाकर लोकोशन पता लगाने का आग्रह किया.

16 दिसंबर 2007 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली और डीजीपी उत्तर प्रदेश को शिक्षक की गिरफ्तारी के विषय में फैक्स किया गया. 17 दिसंबर 2007 को अख़बारों में शिक्षक की गिरफ्तारी का समाचार प्रकाशित हुआ. स्थानीय लोगों के डेलीगेशन ने थाने में जाकर मुलाकात भी की. इसी दिन प्रदेश की मुख्यमंत्री, जौनपुर जिले के डीएम, राज्य के गवर्नर एवं मुख्य सचिव को फैक्स के ज़रिए गिरफ्तारी की जानकारी दी गई. इसी बीच 18/19 दिसंबर की रात कुछ अज्ञात लोग शिक्षक के घर पहुंचे और कुछ किताबें ले गए. 19 दिसंबर को ही एक बार फिर मुख्यमंत्री, डीएम और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को फैक्स करके घटना की जानकारी दी गई.

23 दिसंबर 2007 को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए दो आतंकवादियों की गिरफ्तारी की घोषणा की. गिरफ्तार आतंकवादियों में से एक के पास से जिलेटिन की छड़ें, कलर डेटोनेटर, नोकिया मोबाइल, सिम कार्ड जबकि दूसरे के पास से 3 डेटोनेटर, पॉलीथीन में लिपटा हुआ आरडीएक्स, नोकिया मोबाइल व सिमकार्ड बरामद दिखाया गया. पुलिस ने यह भी दावा किया कि इन आतंकियों को 22 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से गिरफ्तार किया गया.

पुलिस के प्रेस कांफ्रेंस अख़बारों की सुर्खियों में दो आतंकवादियों के चेहरे छपे. इनमें से एक का नाम मोहम्मद तारिक़ कासमी और दूसरे का नाम खालिद मुजाहिद बताया गया. इत्तेफाक़ से ये वही लोग थे जिनके टाटा सूमो से अपहृत किए जाने का आरोप उनके परिजन लगा रहे थे.

12 और 16 दिसंबर को अपहृत किए गए तारिक़ कासमी और खालिद मुजाहिद को 22 दिसंबर 2007 को बाराबंकी के रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार दिखाया गया. घटना के बाद स्थानीय लोगों ने गुस्से का इज़हार किया. फरवरी 2008 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के चौधरी चरण पाल सिंह और मज़हर आजाद ने लखनऊ में विधानसभा के बाहर आमरण अनशन किया. पुलिस ने 6 दिन के अंदर ही जबरन अनशन समाप्त करवा दिया. इसी बीच तारिक़ कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी की न्यायिक जांच की मांग लगातार जारी रही.

14 मार्च 2008 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह ने मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन को पत्र लिखकर न्यायिक जांच का अनुरोध किया जिसके बाद इसी दिन प्रदेश सरकार ने अधिसूचना जारी करके सेवानिवृत न्यायाधीश आरडी निमेष आयोग का गठन किया. इस एक सदस्यीय आयोग को 6 महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया. निमेष आयोग ने पूरे घटनाक्रम और तथ्यों की जांच की और 31 अगस्त 2012 को जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को प्रस्तुत भी कर दी. लेकिन आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश नहीं किया गया. बार-बार मांग किए जाने का बावजूद भी इस रिपोर्ट को विधानसभा में अब तक पेश नहीं किया गया है.

BeyondHeadlines को निमेष आयोग की रिपोर्ट की कॉपी सूत्रों से प्राप्त हुई है. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में खालिद मुजाहिद और तारिक़ कासमी की गिरफ्तारी और उनकी आतंकी घटनाओं में संलिप्तता को संदिग्ध बताया है. साथ ही आयोग ने उनका अपरहण करने वाले अधिकारियों की पहचान करने तथा उनके खिलाफ़ विधि अनुरूप कार्यवाई करने की सिफारिश भी की है.

मामला फिलहाल कोर्ट के अधीन है, इसलिए इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती. लेकिन निमेष आयोग की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े करती है. इस रिपोर्ट में पेश किए गए तथ्य समूची पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर देते हैं.

हम नीचे निमेष आयोग की रिपोर्ट के मुख्य तथ्य, सिफारिशें तथा निष्कर्ष प्रकाशित कर रहे हैं.

कमीशन के सामने आए तथ्यों से यह स्पष्ट है कि कथित आरोपी तारिक कासमी को दिनांक 12 दिसम्बर, 2007 को  दोपहर 12 बजे जब वह सराय मीर से अपनी मोटर साइकिल से इजतेमा के लिए जा रहा था तब उसे शंकरपुर चेकपोस्ट थाना रानी की सराय से कुछ व्यक्तियों ने उठाया व टाटा सूमो में डालकर ले गए व उनमें से दो अन्य व्यक्ति उसकी मोटर साइकिल लेकर चले गए.

इसी तरह उपरोक्त सभी तथ्यों से यह स्पष्ट है कि दिनांक 16.12.2007 को शाम 6.15 बजे कथित आरोपी खालिद मुजाहिद को महतवाना मोहल्ला थाना मड़ियाहूं जिला जौनपुर से टाटा सूमो में सवार व्यक्यितों ने उसे उठा लिया और उसे वहां से ले गए. दोनों आरोपियों को प्रताड़ित किया, निरुद्ध कर मारा पीटा गया.

दिनांक 12 दिसंबर 2007 के उपरान्त वो दिनांक 22 दिसंबर 2007 के पूर्व की घटनाक्रम में एसटीएफ के अतिरिक्त अन्य पुलिस दल का सम्मिलित रहना प्रतीत होता है. परन्तु साक्ष्य से यह स्पष्ट नहीं है कि कथित आरोपियों खालिद मुजाहिद व तारिक़ कासमी को जिन व्यक्तियों ने उठाया, निरुद्ध कर प्रताड़ित किया वो किस दल के व्यक्ति थे, कौन-कौन व्यक्ति थे व उनका क्या कृत्य था. अतः व्यक्तियों को चन्हित करने के उपरान्त ही उनका उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सकता है. परिवाद पत्र में उल्लेखित चिन्हित किए बिना उनको दोषी ठहराने पर कुछ ऐसे निर्दोष व्यक्ति दंडित हो सकते हैं जिनकी इस घटना में कोई सक्रिय भूमिका न रही हो, सिर्फ विधिसंगत आदेशों का ही पालन किया हो और कुछ ऐसे व्यक्ति छूट सकते हैं जिनकी घटना में विधि विरुद्ध सक्रिय भूमिका रही हो. गलत व विधि विरुद्ध कार्य करने वाले कुछ ही व्यक्ति होते हैं. अतः दिनांक 12 दिसंबर 2007 के उपरान्त व दिनांक 22 दिसंबर 2007 से पूर्व, कथित आरोपी खालिद मुजाहिद व तारिक़ कासमी के साथ घटित घटनाओं में, सम्मलित अधिकारी व कर्मचारीगण को जब तक चिन्हित नहीं कर लिया जाता है, तब तक ऐसे किन्ही अधिकारी व कर्मचारीगण का उत्तरदायित्व निर्धारित नहीं किया जा सकता है. और न उनके विरुद्ध किसी कार्यवाई की संस्तुति की जा सकती है.

अतः उपरोक्त घटनाक्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर विधि विरुद्ध कार्य करने वाले अधिकारी, कर्मचारीगण को चिन्हित कर उनके विरुद्ध के अनुसार कार्यवाई करने की संस्तुति की जाती है.

अंतिम निष्कर्ष:

तारिक़ कासमी व खालिद मुजाहिद की मुक़दमा संख्या 1891/2007 थाना कोतवाली जिला बाराबंकी की घटना दिनांक 22 दिसंबर 2007 में संलिप्तता संदेहजनक प्रतीत होती है. उपरोक्त केस जिला न्यायालय बाराबंकी में विचाराधीन है. अतः इस स्तर पर उपरोक्त घटना के संबंध में किसी व्यक्ति के विरुद्ध दायित्व निर्धारित नहीं किए जा सकते हैं.

निमेष आयोग की रिपोर्ट पृष्ठ संख्या-228 के आगे से कुछ मुख्य अंश:

1. जब दिनांक 12 दिसम्बर 2007 को तारिक़ कासमी को दोपहर 12 बजे रानी की सराय चेक पोस्ट से उसके सराय मीर धार्मिक इजतेमा में जाते समय चेक पोस्ट के समीप लखनऊ-बलिया मार्ग स्थिति ग्राम महमूद पुर से पकड़ा जाना कहा जाता है व जिसकी ख़बर भी दैनिक अखबार हिन्दुस्तान, अमर उजाला व दैनिक जागरण में भिन्न-भिन्न तिथियों में दिनांक 22 दिसम्बर 2007 तक छपी है उन खबरों को सत्यापित कर जांच क्यों नहीं की गई?

2. अज़हर अली ने दिनांक 14 दिसम्बर 2007 को तारिक़ के अपहरण की सूचना थाना रानी की सराय जिला आज़मगढ़ को दी जिसको थाने पर प्राप्त भी किया, अपनी मोहर भी लगाई. इस रिपोर्ट पर क्यों कार्यवाही नहीं की गई?

3. अज़हर अली द्वारा दाखिल प्रथम सूचना रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तारिक के पास मोबाइल न. 9450047342 था जो कभी बंद हो जाता था तो कभी चालू हो जाता था उसकी लोकेशन का क्यों पता नहीं लगाया गया?

4. कॉल डिटेल्स में 12 दिसम्बर, 2007 को अन्तिम बार लगभग 12 बजकर 23 मिनट पर कॉल की गई उस समय टावर की लोकेशन स्थित सराय रानी यूपी ईस्ट दिखाया है. उसके उपरान्त इस मोबाइल की स्थित 13 दिसम्बर, 2007 को शाम को 7 बजकर 10 मिनट विश्वास खण्ड लखनऊ उसके उपरान्त वि़जय खण्ड लखनऊ, तेलीबाग यूपी ईस्ट व पुनः 17 दिसम्बर 2007 को विश्वास खण्ड, नाका हिण्डोला, 18 दिसम्बर 2007 को नाका हिण्डोला, 19 दिसम्बर 2007 को विजय खण्ड, मेडिकल कालेज लखनऊ, टी.डी.एम. ऑफिस यूपी ईस्ट लखनऊ दिखाया है तो उपरोक्त तथ्य की भी जांच क्यों नहीं की गई?

5. नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी ने दिनांक 15 दिसम्बर 2007 को जिलाधिकारी आज़मगढ़ को ज्ञापन दिया गया कि मोहम्मद तारिक़ की मोटर साइकिल न. यूपी 50 एन/2943 के साथ उठा लिया गया व उसके मोबाइल न. 9450047342 का स्विच ऑफ है तो इस पर क्यों कार्यवाही नहीं की गई?

6. तारिक़ कासमी के अपहरण काण्ड के विरोध में नेलोपा का धरना प्रदर्शन दिनांक 16 दिसम्बर 2007 से जारी रहा जिसमें वक्ताओं व श्रोताओं की फोटो भी है जो कि दैनिक अखबार हिन्दुस्तान में 17 दिसम्बर 2007 को छपी है तो उसके उपरान्त तारिक़ कासमी के अपहरण की जांच क्यों नहीं की गई?

7. अकारण कोई भी न तो इस तरह रिपोर्ट करेगा और न ही धरना प्रदर्शन करेगा. अतः उपरोक्त तथ्यों पर भी कार्यवाही न करने का कोई कारण क्यों नहीं दर्शाया गया है?

8. नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी ने दिनांक 20 दिसम्बर 2007 को पुनः माननीय मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया कि मौलाना मो. तारिक कासमी को तत्काल सकुशल वापसी की जाए व उसकी तलाश की जाए. तो इस ज्ञापन पर भी क्यों कार्यवाही नहीं की गई?

9. नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के युवा प्रदेश अध्यक्ष चौ. चरण पाल ने महामहिम राज्यपाल को ज्ञापन दिया जिसमें कहा है कि तारिक़ कासमी का दिनांक 12 दिसम्बर 2007 को 12 बजे दिन में टाटा सूमो से ज़बरदस्ती अपहरण कर लिया गया है और यदि दिनांक 22 दिसम्बर 2007 को बकरीद के दिन तक मौलाना डॉक्टर मो. तारिक कासमी को बरामद करके पुलिस उनके परिवार को नहीं सौंप देती है तो चौ. चरण पाल दिनांक 22 दिसम्बर 2007 को 2 दिन कोटला मदरसा के सामने कासमी को बाराबंकी रेलवे स्टेशन के निकट से गिरफ्तार दिखाया गया व उससे आपत्तिजनक वस्तुएं बरामद होना दिखाया गया. उपरोक्त तथ्य की जांच क्यों नहीं की गई.

10. इसी तरह खालिद मुजाहिद को जब 16 दिसम्बर 2007 को मन्नू चाट वाले की दुकान के पास कस्बा मड़ियाहू ज़िला जौनपुर से उठाना बताया जाता है तो इस घटना के बाद की सूचना दूसरे दिन दिनांक 17 दिसम्बर 2007 को अखबारों में छपी है. उपरोक्त सूचना का संज्ञान क्यों नहीं लिया गया और उस पर कार्यवाही क्यों नहीं की. इसी तरह 20 दिसम्बर 2007 को अखबार में यह छपा है कि “एस.टी.एफ. ने युवक को उठाया” उपरोक्त सूचना पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गई और यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि उसे किस तरह और किसने उठाया? और यह सूचना गलत छपी है अथवा सत्य.

11. दिनांक 18 दिसम्बर 2007 को अख़बार में छपा है कि एस.टी.एफ. ने पूर्वांचल के जौनपुर व इलाहाबाद में छापा मारकर हूजी के दो सदस्यों को हिरासत में लिया व मड़ियाहू में भी छापा मारने वाली बात छपी है. दिनांक 21 दिसम्बर 2007 को यह भी लिखा है कि “मड़ियाहूं का खालिद जा चुका है तीन बार पाक” यदि खालिद पुलिस अभिरक्षा में नहीं था तो इस तरह की खबरें कहां से छपीं इस पर भी न कोई संज्ञान लिया गया है और न ही कोई कार्यवाही की गई है.

12. दैनिक अखबार हिन्दुस्तान ने दिनांक 21 दिसम्बर 2007 को यह भी लिखा है कि “काफी दिनों से खुफिया निगाह में था खालिद” और यह भी लिखा है कि 16 दिसम्बर 2007 को जब खालिद कस्बा में एक चाट की दुकान पर चाट खा रहा था तभी टाटा सूमो में सवार कुछ अज्ञात लोग आये और ले गए. जिसकी सूचना चाचा ज़हीर ने थाना मड़ियाहूं को दी. उपरोक्त तथ्य जब आम पब्लिक को भी ज्ञात था तो इस बात का कोई संज्ञान नहीं लिया गया और स्थानीय थानाध्यक्ष ने उस पर क्यों कार्यवाही नहीं की कि किस तरह से यह ख़बर अखबार में छपी और किस तरह से आम पब्लिक में आई.

13. दैनिक जागरण अख़बार में दिनांक 22 दिसम्बर 2007 में छपा है कि एसटीएफ द्वारा उठाये गए खालिद को लेकर परिजन हलकान व खालिद पर 6 माह से थी आई.बी. की नज़र. यदि खालिद को 22 दिसम्बर 2007 से पूर्व अज्ञात व्यक्तियों ने नहीं उठाया तो उपरोक्त समाचार किस तरह से प्रकाश में आया.

14. खालिद के चाचा ज़हीर आलम फलाही द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली, प्रभारी निरीक्षक कोतवाली मड़ियाहूं, पुलिस महानिदेशक लखनऊ, जिलाधिकारी जौनपुर को फैक्स दिये गये व सूचित किया गया कि दिनांक 16 दिसम्बर 2007 को लगभग शाम साढ़े 6 बजे फतेह मोहम्मद बिल्डिंग के पास मोहल्ला सदरगंज, मड़ियाहूं चाट की दुकान के पास से उसके भतीजे मोहम्मद खालिद को ज़बरदस्ती उठा ले गए जो एसटीएफ के लोग थे तो इसका कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया गया व इस पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई.

उपरोक्त सभी तथ्यों से कथित आरोपी खालिद मुजाहिद व तारिक कासमी की दिनांक 22 दिसम्बर 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है व अभियोजन के उपरोक्त साक्षागणों के बयानों पर पूर्ण रूप से विश्वास नहीं किया जा सकता.

आयोग के सुझाव:

  1. आतंकवादी घटना में पुलिस से अलग विभाग के राज्यपत्रित स्तर के अधिकारी को बरामदगी का गवाहान बनाना चाहिए.
  2. कथित आरोपियों से पूछताछ की वीडियो रिकार्डिंग होनी चाहिए.
  3. विवेचना पुलिस की किसी दूसरी शाखा के राज्यपत्रित अधिकारी द्वारा ही की जानी चाहिए.
  4. ऐसी घटनाओं के निस्तारण हेतु विशेष न्यायालयों का गठन होना चाहिए.
  5. ऐसे न्यायालयों के पीठासीन अधिकारी को केसों के निस्तारण में निर्धारित कोटा देने की बाध्यता नहीं होनी होनी चाहिए.
  6. अभियोजन की तरफ से कुशल एवं विशेष दक्ष अधिवक्ता/अभियोजन अधिकारी द्वारा ही राज्य सरकार की तरफ से पैरवी करनी चाहिए.
  7. इन केसों के लिए अलग से अभियोजन सेल गठित होना चाहिए जो केसों के जल्द निस्तारण में सहयोग कर योगदान प्रदान करें.
  8. ऐसे केसों का निस्तारण अतिशीघ्र अधिक से अधिक 2 वर्ष में होने की व्यवय्था होनी चाहिए तथा प्रत्येक स्तर की कार्यवाही की समय सीमा निर्धारित की जानी चाहिए. केस समय से निस्तारण न होने पर समीक्षा की जानी चाहिए व सम्बंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्यवाही होनी चाहिए.
  9. पीड़ित पक्षों को समुचित मुआवजा देने का भी प्रावधान होना चाहिए.
  10. अच्छे कार्य के लिए अधिकारी व कर्मचारीगण को पुरस्कृत किये जाने का भी प्रावधान होना चाहिए.
  11. निर्दोष लोगों को झूठा फंसाने पर दायित्वों का निर्धारण कर दण्ड दिये जाने का भी प्रावधान होना चाहिए.
  12. ऐसे केसों से जुड़े हुए अधिकारी, कर्मचारी, न्यायालय के पीठासीन अधिकारियों को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए.

     नोट: BeyondHeadlines के पास निमेष आयोग की 237 पृष्ठ की  पूरी रिपोर्ट मौजूद है.

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