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	<title>Beyond Headlines &#187; बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी</title>
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		<title>पांच ग्रामीणों को वर्दी पहनाकर ले गई पुलिस</title>
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		<pubDate>Mon, 20 May 2013 12:47:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[adivasi in dantewada]]></category>
		<category><![CDATA[Police took five villagers clad in uniforms]]></category>

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		<description><![CDATA[BeyondHeadlines News Desk दंतेवाड़ा ज़िले के बेंगपाल में शनिवार की सुबह सुरक्षा बल के जवानों ने ग्रामीणों पर कहर ढाया. साथ ही वो पांच ग्रामीणों को भी नक्सलियों की वर्दी पहनाकर अपने साथ ले गए. ग्रामीणों के मुताबकि 18 मई की सुबह सुरक्षा बल के जवान ग्राम बेंगपाल पहुंचे. गांव ने उंडामी भीमा पिता देवा ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>BeyondHeadlines News Desk</b></p>
<p style="text-align: justify;">दंतेवाड़ा ज़िले के बेंगपाल में शनिवार की सुबह सुरक्षा बल के जवानों ने ग्रामीणों पर कहर ढाया. साथ ही वो पांच ग्रामीणों को भी नक्सलियों की वर्दी पहनाकर अपने साथ ले गए.</p>
<p style="text-align: justify;">ग्रामीणों के मुताबकि 18 मई की सुबह सुरक्षा बल के जवान ग्राम बेंगपाल पहुंचे. गांव ने उंडामी भीमा पिता देवा उंडामी, हुंगा पिता देवा, आयतू पिता नंदा एवं हिरोली दोकापारा निवासी जोगा कड़ती, लेखामी पोदिया, तुमनार निवासी लखमे एवं मोटू पिता देवा को पकड़ कर उनको काली वर्दी पहनाई. उसके बाद उक्त ग्रामीणों में से लखमें एवं मोटू को जवानों ने छोड़ दिया तथा शेष पांचों ग्रामीणों को अपने साथ हेलीकॉप्टर से पुरंगेल की ओर ले गए.</p>
<p style="text-align: justify;">बेंगपाल के ग्रामीणों ने यह भी बताया कि सुरक्षा बल के जवानों ने ग्रामीणों के साथ मारपीट की एवं गांव के 25 घरों से रूपये, जेवरात, मुर्गा-मुर्गी एवं चावल लूट कर ले गए.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Photo-Courtesy-the-hindu.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16386" alt="Photo Courtesy: the hindu" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Photo-Courtesy-the-hindu-400x245.jpg" width="400" height="245" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">इस पूरे मामले पर मानव अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार बताते हैं कि संभवत पुलिस उन पांचों को मार देगी, जैसा वो पहले से करते आई है. और फिर इसे एक मुठभेड़ बता देगी . उसके बाद इनके साहब को तरक्की मिल जायेगी और छत्तीसगढ़ सरकार को दिल्ली से और पैसा मिल जाएगा. रही बात आदिवासियों की तो इन्हें तो कोई भी नहीं बचा सकता अब. आदिवासियों की इस तरह की फर्जी हत्याओं के अनेकों मुकदमे अभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लटके हुए हैं .  सच पूछे तो कोर्ट इन आदिवासियों के लिये नहीं हैं. सरकार इन्हें मार रही है . ये आदिवासी अपनी जान कैसे बचाएं ?</p>
<p style="text-align: justify;">इसी बीच यह भी खबर मिली है कि छत्तीसगढ़ के बीजापुर में फिर से आठ आदिवासियों को पुलिस ने मार डाला है . सभी गाँव वाले थे. पुलिस ने भी इनके माओवादी होने का दावा नहीं किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">ये सभी आदिवासी अपनी नई फसल की बुआई से पहले बीज की पूजा कर रहे थे. पिछले साल भी इसी समय बीज की पूजा करते हुए सत्रह निर्दोष आदिवासियों की इसी तरह हत्या कर दी गई थी. तब सरकार ने दावा किया था कि मारे गये लोग दुर्दांत माओवादी थे. लेकिन बाद में साबित हुआ कि वे तो स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे और गाँव वाले थे.</p>
<p style="text-align: justify;">मानव अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार बताते हैं कि ‘हमने दंतेवाड़ा में अनेकों जनसंहार देखे हैं. इन में से सभी में आदिवासियों ने कभी पुलिस को किसी भी तरह से नहीं उकसाया. लेकिन पुलिस ने बिना किसी उकसावे के आदिवासियों का सामूहिक संहार किया है. हांलाकि ध्यान से देखा जाय तो इस तरह के जनसंहार से सरकार को फायदा कम और नुकसान  ज़्यादा होता है. हम एक समाज हैं. समाज नियमों से चलता है. नियम समाज ने ही बनाये हैं. अगर सरकार नियम तोडती है तो उस पर से समाज का विश्वास कम हो जाता है. इस हालत में सरकार का विरोध करने वाली ताकतों के प्रति लोगों को अधिक सहानुभूति मिलने लगती है.’</p>
<p style="text-align: justify;">आगे वो बताते हैं कि ‘अब सरकार जनता के बल पर नहीं बल्कि बाज़ार की शक्तियों के पैसों के दम पर चुनाव जीतती हैं. इसलिये सरकार को जनता की नहीं बल्कि खुद को पैसा देने वाले उद्योगपतियों की ज़्यादा परवाह है.  इस हाल में जनता के कल्याण के नाम पर चुनाव जीतने वाली सरकार अपनी ही जनता को मारने लगती है. इसलिये हमें याद रखना चाहिये जब हम आदिवासियों की हत्या करते हैं तो दरअसल हम अपने लोकतन्त्र की हत्या कर रहे होते हैं. इसी के साथ अपनी संस्कृति, धर्म, परम्परा  और सम्मान की भी हत्या कर देते हैं.’</p>
]]></content:encoded>
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		<title>एसटीएफ अधिकारियों को बचाने के लिए की गई खालिद की राजनितिक हत्या</title>
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		<pubDate>Mon, 20 May 2013 08:11:42 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[khalid mujahid custodial death]]></category>
		<category><![CDATA[Khalid's custodial assasination in Barabanki]]></category>
		<category><![CDATA[Post Mortem Report]]></category>
		<category><![CDATA[Post Mortem Report of khalid mujhahid]]></category>
		<category><![CDATA[Rihai Manch puts 12 point demand.]]></category>

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		<description><![CDATA[BeyondHeadlines News Desk उत्तर प्रदेश के रिहाई मंच ने खालिद मुजाहिद की हत्या को सपा सरकार की सरपरस्ती में एसटीएफ अधिकारियों को बचाने के लिए की गई साजिशन राजनितिक हत्या क़रार देते हुए कहा कि इस शहीद मौलाना खालिद मुजाहिद के जनाजे से सपा सरकार की उल्टी गिनती शुरु हो गई है. रिहाई मंच ने सरकार ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>BeyondHeadlines News Desk</b></p>
<p style="text-align: justify;">उत्तर प्रदेश के रिहाई मंच ने खालिद मुजाहिद की हत्या को सपा सरकार की सरपरस्ती में एसटीएफ अधिकारियों को बचाने के लिए की गई साजिशन राजनितिक हत्या क़रार देते हुए कहा कि इस शहीद मौलाना खालिद मुजाहिद के जनाजे से सपा सरकार की उल्टी गिनती शुरु हो गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">रिहाई मंच ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार इस मुगालते में न रहे की कि मौलाना खालिद की हत्या कराकर इस आंदोलन को रोक देगी. 2007 में खालिद-तारिक की रिहाई को लेकर शुरु हुआ बेगुनहों की रिहाई का यह आंदोलन जिसके नीवं में खालिद के चचा ज़हीर आलम फलाही रहे हैं, को हम मंजिल तक पंहुजाएंगे. क्योंकि यह दिन हमारे लिये शोक का नहीं बल्कि संकल्प का दिन है.</p>
<p style="text-align: justify;">मंच ने बाराबंकी में खालिद मुजाहिद के पंचनामे पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह से बाराबंकी प्रशासन ने पंचनामे में समाजवादी पार्टी से जुड़े नेताओं को पंच बनाया और इस तथ्य को परिजनों तथा वहां मौजूद सैकड़ों लोगों  से छिपाया उससे जाहिर हो जाता है कि प्रशासन की नियत वास्तविक तथ्यों को छिपाने का था. रिहाई मंच के नेताओं ने कहा कि खालिद के चचा जहीर आलम फलाही समेत कई लोगों ने खालिद के शव का निरिक्षण किया, जिसके मुताबिक खालिद के कान और नाक के आस-पास खून के धब्बे थे, उनके गर्दन की हड्डी पर किसी भारी चीज से मारे जाने का जख्म के निशान के चलते वहां काला धब्बा और सूजन थी, बायें हाथ की कोहनी के ऊपर काला निशान और चेहरा शरीर के बाकी हिस्से के मुकाबले स्याह होना तथा सूजा हुआ था. <b></b></p>
<p style="text-align: justify;">इसके बावजूद पोस्ट मार्टम के पहले ही बाराबंकी के पुलिस अधिक्षक सैयद वसीम अहमद का यह कहना कि खालिद की मौत स्वाभाविक कारणों से हुई है, प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है कि पुलिस का पूरा जोर मौलाना की हत्या के वास्तविक तथ्यों को छिपाना था.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/DSC06376-Copy.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16381" alt="Khalid's custodial assasination in Barabanki, Rihai Manch puts 12 point demand." src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/DSC06376-Copy-400x182.jpg" width="400" height="182" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">रिहाई मंच के अध्यक्ष और खालिद के अधिवक्ता मोहम्मद शुएब ने कहा कि फैजाबाद जेल में 3 साढे़ तीन बजे वो साथ थे और खालिद पूरी तरह स्वस्थ था और उसने अपने परिवार वालों को सलाम भी भेजा था. सबसे अहम बात कि फैजाबाद में वह कुर्ते-पैजामे में था जबकि सुबह जब पोस्टमार्टम के समय शव को परिजनों को दिखाया गया तो वो टी शर्ट और लोवर में था, जिसे मौलाना खालिद कभी पहनते ही नहीं थे. और उनके साथ दिखाए गए सामानों में भी कुर्ता-पैजामा नहीं था, जिससे साफ हो जाता है कि स्कोर्ट ने जब हत्या की तो मौलाना खालिद के नाक-कान से निकला खून जो उनके कपड़े पर भी गिर गया, जिसे छुपाने के लिए उनके कुर्ते-पैजामें को छुपा दिया गया और मौलाना खालिद को टी शर्ट-लोवर पहना दिया गया.</p>
<p style="text-align: justify;">इन सब बातों से स्पष्ट हो जाता है कि खालिद की मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि सपा सरकार के सरंक्षण में सुनियोजित आपराधिक षडयंत्र के तहत की गई जघन्य हत्या है.</p>
<p style="text-align: justify;">रिहाई मंच को शक है कि जिस तरह से पंचनामे से ही तथ्यों को छिपाने की कोशिश शुरु हो गई उससे प्रशासन की नियत पर संदेह बढ़ जाता है कि वह पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट में भी इन तथ्यों को छिपाते हुए इसे स्वाभाविक मौत करार दे.<br />
बाराबंकी में मौजूद रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुएब और प्रवक्ता शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि वहां मौजूद लोगों द्वारा जिलाधिकारी बाराबंकी से मांग के बावजूद कि वहां मुख्यमंत्री आकर परिजनों से मिलें और<br />
उनकी बात सुने. लेकिन संवेदनहीन अखिलेश को यह बात मंजूर नहीं हुई.</p>
<p style="text-align: justify;">मंच ने कहा कि खालिद के चचा ज़हीर आलम फलाही द्वारा डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीवनाथ सिन्हा, एस आनंद और आईबी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराने के बावजूद न अब तक इन अधिकारियों को और न ही इस हत्या को अजांम देने वाले पुलिस स्कोर्ट को अब तक गिरफ्तार किया गया और न ही इनको निलंबित किया गया.</p>
<p style="text-align: justify;">मडि़याहू में मौजूद रिहाई मंच आज़मगढ़ के संयोजक मसीहुदीन संजरी, तारिक शफीक, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, सालिम दाउदी, गुलाम अम्बिया, सादिक खान, शौकत अली, वर्धा महाराष्ट्र से आए लक्षमण प्रसाद, अब्दुल्ला एडवोकेट, दिल्ली से आए एपीसीआर के राष्ट्रीय संयोजक अखलाक अहमद ने बताया कि जिस तरह आज खालिद के जनाजे में बीसीयों हजार से ज्यादा लोगों ने शिरकत की और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हुए उसने यह साफ कर दिया है कि सपा सरकार ने खालिद की हत्या करवाकर अपनी कब्र खोद ली है. जिसका मुहतोड़ जवाब देने के लिए जनता तैयार है.</p>
<p style="text-align: justify;">रिहाई मंच ने मांग की है कि:-</p>
<p style="text-align: justify;">1- खालिद मुजाहिद के चचा ज़हीर आलम फलाही द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में नामित डीजीपी विक्रम सिंह, एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीवनाथ सिन्हा, एस आनंद पुलिस अधिकारीयों और खालिद को ले जा रहे पुलिस स्कोर्ट को तत्काल प्रभाव से टर्मिनेट किया जाय, तथा आईबी समेत सभी दोषियों को तत्काल गिरफ्तार करके कानूनी कार्यवाई शुरु की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">2- सपा सरकार अपने चुनावी वादे के मुताबिक आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह नौजवानों को तत्काल रिहा करे. क्योंकि मौलाना खालिद की हत्या ने साफ कर दिया है कि जो सरकार मौलाना की हत्या करवा रही है वो किस आधार पर अन्य को सुरक्षा दे सकती है.</p>
<p style="text-align: justify;">3- शहीद मौलाना खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक कासमी को निर्दोष साबित करने वाली आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट को तत्काल सदन के पटल पर रखा जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">4- मौलाना खालिद की हत्या की सीबीआई जांच तत्काल शुरु की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">5- गृह सचिव, बाराबंकी जिलाधिकारी और सरकारी वकील द्वारा बाराबंकी न्यायालय में मौलाना खालिद मुजाहिद और हकीम तारिक कासमी पर से मुकदमा वापसी की प्रक्रिया में जानबूझकर की गई आपराधिक साजिश जिसकी वजह से रिहाई संभव नहीं हो पाई, एवं मौलाना खालिद की बाराबंकी में हत्या भी हो गई, ऐसे में इन सभी शासन व प्रशासन के अधिकारियों को जांच के दायरे में लाया जाए और कार्यवायी की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">6- मौलाना खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की 22 दिसंबर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से की गई फर्जी गिरफ्तारी और 18 मई 2013 को मौलाना खालिद की बाराबंकी में की गई हत्या से स्पष्ट होता है कि इस हत्या के तार बाराबंकी से गहरे जुड़े हैं, ऐसे में दिसंबर 2007 और मई 2013 के दौरान बाराबंकी के पूरे प्रशासनिक अमले को जांच के दायरे में लाया जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">7- 16 दिसंबर 2007 को मौलाना खालिद मुजाहिद को मडि़याहूं से अपहरण करने के बाद उच्च पुलिस अधिकारी अमिताभ यश, एसटीएफ के अधिकारियों समेत अन्य पुलिस अधिकारियों द्वारा जिस तरीके से उत्पीड़न किया गया और जिसके बारे में मौलाना ने शिकायत भी की थी, जिस पर अब तक कोई कार्यवाई नहीं हुई, ऐसे में इन दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाई की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">8- मौलाना खालिद मुजाहिद को लगातार जेल और पेशी के दौरान जिस तरीके से एसटीएफ-एटीएस के इशारे पर स्कोर्ट द्वारा उत्पीडि़त किया जाता था और हत्या करने की धमकी दी जाती थी, और जिसकी शिकायत भी उनके अधिवक्ताओं द्वारा लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के न्यायधीशों को शिकायती पत्रों द्वारा अवगत कराया जाता था, पर इसके बावजूद कोर्ट ने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया और ना ही कोई कार्यवाई इन दोषी पुलिस वालों पर हुई, ऐसे में इन दोषी पुलिस अधिकारियों समेत लखनऊ, बाराबंकी और फैजाबाद के जिन न्यायधीशों ने दोषियों को बचाया उनको भी जांच के दायरे में लाते हुए कार्यवाई की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">9- खालिद की हत्या के बाद जिन पुलिस अधिकारियों ने तारिक कासमी से बाराबंकी कोतवाली में दबाव देकर झूठा बयान दिलवाया कि खालिद की तबीयत पहले से खराब थी (जिसे की जेल प्रशासन और खालिद के वकील मो. शुऐब ने इंकार किया है) उन सभी अधिकारियों को जांच के दायरे में लाते हुये कार्यवायी की जाए.</p>
<p style="text-align: justify;">10- मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या इस बात की पुष्टि करती है कि सरकारी एजेंसियों एसटीएफ-एटीएस और आतंकी संगठनों में गठजोड़ है जो खालिद मुजाहिद की रिहाई को लेकर भयभीत थे जिसके चलते मौलाना खालिद की हत्या कर दी गई. ऐसे में कचहरी धमाकों समेत यूपी में हुई आतंकी घटनाओं की जांच कराई जाए. जिससे खुफिया एजेंसियों, एटीएस और आतंकी संगठनों का गठजोड़ सामने आ सके.</p>
<p style="text-align: justify;">11- उत्तर प्रदेश के जितने युवक आतंकाद के आरोप में दूसरे राज्यों में बंद हैं उनके सुरक्षा की गारंटी उत्तर प्रदेश सरकार सुनिश्चित कराए.</p>
<p style="text-align: justify;">12-  पीडि़त परिवार को तत्काल एक करोड़ रूपये मुआवजा दिया जाए.</p>
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		<title>असग़र अली इंजीनियर अब बस यादों में&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 14 May 2013 12:39:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[asgar ali engineer]]></category>

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		<description><![CDATA[Dr. Abhinaw Upadhyay for BeyondHeadlines उन दिनों गोरखपुर से राजनीति विज्ञान मे एम.ए. कर रहा था. तभी एक दिन विभाग  की प्राध्यापिका डा. शुभा  राव ने मुझसे कहा था कि जाकर मनोज सिंह से मिल लो. मनोज जी से मिला वह मुझे बनारस एक सेमिनार में भेजना चाहते थे. मैंने हां कर दी. सेमिनार सांप्रदायिक दंगों के दौरान ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Dr. </b><b>Abhinaw Upadhyay for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">उन दिनों गोरखपुर से राजनीति विज्ञान मे एम.ए. कर रहा था. तभी एक दिन विभाग  की प्राध्यापिका डा. शुभा  राव ने मुझसे कहा था कि जाकर मनोज सिंह से मिल लो. मनोज जी से मिला वह मुझे बनारस एक सेमिनार में भेजना चाहते थे. मैंने हां कर दी.</p>
<p style="text-align: justify;">सेमिनार सांप्रदायिक दंगों के दौरान की परिस्थतियों को समझने और उसके बारे सही कदम उठाने को लेकर था. यहां मेरी पहली मुलाकात असगर अली इंजीनियर से हुई क्योंकि यह सेमिनार उनकी संस्था और बनारस की एक संस्था के साथ मिलकर हो रहा था.</p>
<p style="text-align: justify;">दंगों के दौरान की परिस्थिति का गवाह बनारस भी  रहा है और मेरा जिला मऊनाथ भंजन भी&#8230; फिर दो साल बाद उनसे मुलाकात सहारनपुर में हुई. वहां का वाकया दिलचस्प था. इंजीनियर साहब को कट्टर हिन्दू मुस्लिमों का एजेंट कहते थे, क्योंकि यह दंगों में शामिल हिन्दुओं  के बारे में कहते थे कि प्राय: दंगों में अफवाह के कारण बहुसंख्यक अल्पसंख्यकों पर हमला करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/601729_10200637384509897_1960483950_n.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16230" alt="asgar ali engineer" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/601729_10200637384509897_1960483950_n-295x400.jpg" width="295" height="400" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">इंजीनियर साहब के विचार मुस्लिमों के बारे में भी  जुदा थे. वह हमेशा कहते रहे कि सच्चे मुसलमान का मतलब मुसल्लम इमान है. मुस्लिमों को महिलाओं के हक़  के बारे में भी  सोचना चाहिए. उनके पास कुरान के तर्क थे. इसलिए कट्टर मुसलमान उनको हिन्दुओं का एजेंट कहता था और इस्लाम का दुश्मन मानते थे.</p>
<p style="text-align: justify;">सहारनपुर में भी  यही वाकया हुआ. लगभग एक सप्ताह का सेमिनार था. परिचर्चा के लिए एक कालेज में सबलोग इकट्ठा हुए, रात के आठ बज रहे थे. शहर के प्रतिष्ठित मुसलमान भाई लोग भी  आए थे मुल्ला लोग भी  थे. असग़र अली इंजीनियर ने इस्लाम में महिलाओं को दिए जाने वाले हक़ के संबंध में अपनी बात रखनी शुरू की.</p>
<p style="text-align: justify;">बात अभी  कुछ देर चली कि एक मुल्ला साहब खड़े हो गए और उन्हे इस्लाम का दुश्मन घोषित कर दिया लेकिन उनके पास कोई तर्क नहीं था. इंजीनियर साहब बार-बार कह रहे थे कि आप अपनी बात तर्क के साथ रखिए मुल्ला जी की तरफ़ से कई लोग खड़े हो गए मामला गंभीर देख बैठक को जल्द ही समाप्त कर दिया गया.</p>
<p style="text-align: justify;">वह बार-बार कहते थे कि दंगों को भड़काने में मीडिया की भूमिका अहम है. इसके लिए पत्रकारों को प्रशिक्षित करने की ज़रूरत है कि दंगों के दौरान किस तरह की रिपोर्र्टिंग करे. शायद ही कोई संस्थान अपने पत्रकारों को प्रशिक्षण देता हो लेकिन वह पूरे भारत में इसको लेकर वर्कशाप चलाते थे.</p>
<p style="text-align: justify;">उनसे आखिरी मुलाकात मुम्बई में हुई. यह महज एक मुलाकात नहीं थी क्योंकि गोरेगांव में 10 दिनों का वर्कशाप था मुझे भी बुलाया गया. वहां कई लोग पूरे देश भर से आए थे. सबको एक साथ रहना था, बातें करनी थी और एक दूसरे धर्म के बारे में खुल कर बात करनी थी केवल अच्छाइयों के बारे में ही नहीं बुराइयों के बारे में भी. पहली बार इस तरह का माहौल मिला था जमकर चर्चा हुई. कई मुस्लिम दोस्त बने, कुछ इसाई भी&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">यह परिचर्चा से उपजे सवाल और उनके जवाब दोनों अविस्मरणीय थे. क्योंकि हमें किस जाति,धर्म या संप्रदाय में पैदा होना है यह मेरी इच्छा पर निर्भर नहीं करता लेकिन इसके लिए लड़ाई हम इस हद तक लड़ते हैं कि जान की भी परवाह नहीं करते. ऐसे वर्कशॉप के बाद कई लोगों के विचारों में बदलाव आए मैं भी उनमें से एक था. यहाँ समाज को नए सिरे से देखने समझने का मौका मिला.</p>
<p style="text-align: justify;">आज असग़र अली इंजीनियर हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके रहते हुए भी  उनके बेटे इरफान इंजीनियर इसे आगे बढ़ाते रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि वह आगे भी  इसी तरह बढ़ाएंगे&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
]]></content:encoded>
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		<title>फिर भी कुछ नहीं कहती मां&#8230;</title>
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		<pubDate>Sat, 11 May 2013 20:11:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Anita Gautam for BeyondHeadlines समय के साथ रिश्ते-नाते, प्यार और संबंधों की मज़बूती दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है. हर रिश्तों में कहीं न कहीं स्वार्थ समा गया है. पर इसी जहान में एक रिश्ता ऐसा भी है जिसमें कोई स्वार्थ नहीं, और वो है सिर्फ माँ का&#8230; माँ की परिभाषा की व्याख्या करना ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Anita Gautam for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">समय के साथ रिश्ते-नाते, प्यार और संबंधों की मज़बूती दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है. हर रिश्तों में कहीं न कहीं स्वार्थ समा गया है. पर इसी जहान में एक रिश्ता ऐसा भी है जिसमें कोई स्वार्थ नहीं, और वो है सिर्फ माँ का&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">माँ की परिभाषा की व्याख्या करना शायद उतना ही कठिन है जितना ब्रह्मांड या आसमान का चित्रण करना&#8230; आधुनिकता और भागदौड़ में आज का दिन हम जैसे व्यस्त लोगों ने अपनी माँ के नाम किया है. पता नहीं ये आधुनिकता है या लोगों की व्यस्तता, हर रिश्ते को मात्र एक दिन में समेट कर रख दिया गया है. बच्चे की आयु चाहे कुछ भी हो पर माँ स्वयं कष्ट में रहकर बच्चे का सदैव भला ही सोचती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">स्वयं भगवान माँ की ममता पाने धरती पर राम, कृष्ण जैसे अनेक रूपों में अवतरित हुए. जन्म देने वाली हो या पालन-पोषण करने वाली मां, उसकी बच्चों के प्रति ममतामयी अवश्य ही होती है. माँ देवकी और माँ यशोदा का भगवान कृष्ण के प्रति वात्सल्य, किसी से छिपा नहीं.</span></p>
<p style="text-align: justify;">पूतना जो कि एक सुंदरी थी, वो चाहती थी कि कृष्ण को अपने गोद में बिठा उन्हें स्तनपान कराएं किन्तु किसी श्राप के कारण वो पूतना बनी, लेकिन वो भी भगवान की ही माया थी जिसमें उन्होंने पूतना का स्तनपान करते ही उसे श्रापमुक्त कर दैवलोक में भेज दिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Mothers-Day-Flowers-1.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16089" alt="Mothers Day" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Mothers-Day-Flowers-1-400x266.jpg" width="400" height="266" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">काल कोई भी रहा हो माँ बच्चे की हजारों गलतियों को माफ़ कर निर्मल, पावन हृदय से सीने से लगाये घुमती है. लोगों को दर्द में यकीनन मां की याद आती है और शायद गाली के नाम पर भी&#8230; लोग बहुत ही तसल्ली और शान से माँ की गाली दे देते है.</p>
<p style="text-align: justify;">माँ, जो एक पत्नी भी है साल के 365 दिन बिना छुट्टी किए, ओवर टाईम करते हुए, पति, पैदा किए बच्चे, अनगिनत रिश्तेदारों की खारितनवाजी में दिन रात चुर रहती है. वो एक महिला शादी के फेरों की अग्नि में अपने आप को समाप्त कर, सात फेरों के बंधनों में बंध, एक नये रिश्ते, नये स्वरूप और नये व्यवहार, नये आचरण में ढाल लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">उसने शायद ही कभी अपने मायके में अपने जूठे बर्तन धोये हों पर यहाँ सबका जूठन उठाए खुशी से ठीक वैसे ही रहती है जैसे माँ सीता अपने पुत्रों के साथ वन में रहती थी, राजा की पुत्री होने के साथ-साथ रघुकुल में ब्याहि एक सूर्यवंशी की पत्नी थीं, जिसके लिए शादी से पहले एक फूल तक उठाने के लिए अनेक सेविकाएं हुआ करती थी, वहीं स्त्री पत्नी धर्म का पालन कर अपने पति के साथ 14 वर्ष तक वनवास में रहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर वहीं सीता मां बाद में अपने दोनों पुत्रों के साथ वन में रहीं. वो लकड़ी काटती, घास-फूस तक एकत्रित कर चूल्हा जलाती थी और चक्की से आटा भी पिसती थीं, क्योंकि वो माँ है और मां के साथ एक स्वाभिमानी औरत भी.</p>
<p style="text-align: justify;">हमारे घरों में माँ के लिए यदि दाल सब्जी कम पड़ जाए तो खुद नमक से रोटी तो रोटी, खत्म होने पर चावल या कभी-कभी भूखे पेट ही सो जाती है, पर परिवार को भरपेट भोजन कराती है. रोज स्वादिष्ट खाना बनाती है तो परिवार का एक भी सदस्य तारीफ करने के लिए मुंह नहीं खोलता पर जिस दिन कभी गलती से नमक कम या ज्यादा हो जाए, रोटी ज़रा-सी जल जाए या चावल थोड़ा कड़ा हो जाए, घर में कोई सदस्य बोलने से नहीं चुकता.</p>
<p style="text-align: justify;">खुद के बदन दर्द में पति के शरीर का दर्द दूर करती है, बच्चों के दूध के खातिर खुद कैल्शियम की कमी से घुटने के दर्द से जुझती है. अपनी पैदा हुई बेटी के लिए उसके विवाह के सपने देख-देख गहने तक संजोने लगती है तो बेटे की पढ़ाई के लिए घर तक गिरवी रख देती है और पति से लाख झगड़ा करने पर भी सुहागन मरने की जिद करती है और पति महोदय, श्रीमति जी के लिए कभी प्यार से दो टूक बोलें या ना बोलें पर फरमाइश पूरी होते ही ये बोलने से बाज़ नहीं आते- काम के धून की पक्की, ऐसी है मेरी पवन चक्की&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">ये वही औरत है, जो शायद कभी किसी की प्रेमिका हुआ करती होगी पर आज हमारी माँ है. तब इसकी एक मुस्कान पर लोग गश (मूर्छा) खा गिरते थे, लोग एक नज़र देखने को तरसते थे. पर आज अपनी जिम्मेदारियां तले चेहरे की झुर्रियों के बीच हम अपनी माँ को एक नज़र उठा नहीं देखते. </span></p>
<p style="text-align: justify;">माँ रात-दिन, सोते-जागते सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चों के बारे में ही सोचती हैं पर क्या हम कभी अपनी माँ के बारे में, थोड़ा समय निकाल सोचते हैं? जितने प्रेम से अपने मित्रों का ध्यान रखते हैं क्या कभी अपनी माँ की तबीयत खराब में उसका ख्याल रखते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">दो दिन यदि माँ बीमार हो जाए, पूरा घर अस्त-व्यस्त हो जाता है. सबकी नैया पार लगाने वाला भगवान भी बिना मैया के नहीं रह सका फिर हम तो एक आम इंसान हैं. लोग बोलते हैं अच्छे कर्म करो, भगवान खुश होंगे पर भगवान को खुश करने की अपेक्षा हर दिन हर पल अपनी माँ को सुख देना चाहिए, क्योंकि माँ भगवान का ही एक रूप है.</p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखिका प्रतिभा जननी सेवा संस्थान से जुड़ी हैं.)</i></b></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>एक बार नहीं हज़ार बार गाऊंगा मैं ‘वन्दे मातरम’</title>
		<link>http://beyondheadlines.in/2013/05/not-a-single-thousand-times-i-will-sing-vande-mataram/</link>
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		<pubDate>Sat, 11 May 2013 17:36:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Ahmad Ansari for BeyondHeadlines अभी मैं ‘वन्दे मातरम’ का उर्दू में अनुवाद देख ही रहा था कि एक मेरे एक दोस्त मुझ से मिलने आ गए. बात ‘वन्दे मातरम’ की ही होने लगी. मैंने उनसे पूछा कि आखिर प्रॉब्लम क्या है वन्दे मातरम गाने में? उन्होंने कहा देखो अहमद भाई! हम लोग मुसलमान हैं. एक ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Ahmad Ansari</b><b> </b><b>for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">
अभी मैं ‘वन्दे मातरम’ का उर्दू में अनुवाद देख ही रहा था कि एक मेरे एक दोस्त मुझ से मिलने आ गए. बात ‘वन्दे मातरम’ की ही होने लगी. मैंने उनसे पूछा कि आखिर प्रॉब्लम क्या है वन्दे मातरम गाने में?</p>
<p style="text-align: justify;">उन्होंने कहा देखो अहमद भाई! हम लोग मुसलमान हैं. एक अल्लाह को मानते हैं. अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं करते. और इस्लाम में लिखा है कि अल्लाह के अलावा किसी के आगे सर मत झुकाओ.</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने कहा- हाँ! ये तो है. लेकिन अगर मैं ‘वन्दे मातरम’ गाता हूं तो इस में सर झुकाने की बात कहां से आ गई? मैं तो अपने देश की वंदना करता हूं. अपने देश की तारीफ करता हूं.</p>
<p style="text-align: justify;">वो बोले कि अहमद भाई बात सही है आपकी, लेकिन हम अपने देश की तारीफ करने में हम अपना ईमान ख़राब नहीं कर सकते.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/M_Id_229027_Vande_Mataram.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-16092" alt="Vande Mataram" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/M_Id_229027_Vande_Mataram.jpg" width="300" height="200" /></a></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">थोड़ी देर तक हम लोगो में बात चीत हुई. फिर वो बोले कि अहमद भाई मुझे कुछ पैसे की ज़रुरत थी.</span></p>
<p style="text-align: justify;">मैंने पूछा- कितना? बोले ज्यादा नहीं पांच सौ चाहिए. मैंने पांच सौ की नोट निकाली और उनकी तरफ बढ़ाते हुए ज़मीन पर गिरा दी. उनको लगा कि मेरे हाथ से छूट कर निचे गिर गयी है. उन्होंने जल्दी से झुक कर मेरे पैर के पास गिरी हुई नोट उठा ली.</p>
<p style="text-align: justify;">जैसे ही खड़े हुए मैंने पूछा क्या साहेब पांच सौ की नोट के लिए आपने मेरे आगे सर झुका दिया. बोले, क्या मतलब?</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने कहा अभी आप कह रहे थे कि अल्लाह ने अपने इलावा किसी और के आगे सर झुकाने की लिए मना किया है और अभी-अभी आपने पांच सौ रूपये की नोट उठाने के लिए मेरे आगे अपना सर झुकाया है.</p>
<p style="text-align: justify;">वो बोले, अहमद भाई आप कैसी बातें कर रहे हो. अगर कोई चीज़ निचे गिरी है तो उसको उठाने के लिए मुझे तो झुकना ही पड़ेगा. इसका मतलब वो थोड़े ही जो हम मस्जिदों में जाकर सजदे करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने कहा- देखने वालों को तो यही लगेगा कि आप मेरे आगे झुक रहे हो. वो बोले कि मेरे दिल में क्या है ये अल्लाह जानता है.</p>
<p>मैंने कहा- सही बात कही आपने. मैं भी वही समझाना चाह रहा था आपको. किसके दिल में क्या होता है ये अल्लाह जानता है. तो फिर ‘वंदे मातरम’ गाने से ईमान कैसे खराब हो सकता है? क्या ‘वन्दे मातरम’ गाने वाले के दिलो की बातें अल्लाह नहीं जानता. ज़बान से ‘वन्दे मातरम’ गाने में क्या बुराई है? अगर केवल ‘वन्दे मातरम’ गाने भर से कोई इस्लाम से बाहर हो जाता है तो क्या सिर्फ पहला क़लमा &#8220;ला इलाहा इल लल्ला, मोहम्मदूर्र रसूल अल्लाह &#8221; ज़बान से पढ़ देने भर से कोई मुसलमान हो जायेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">मैंने बहुत सारे अपने हिन्दू दोस्तों को देखा है जो ये क़लमा पढ़ते हैं, बल्कि मैंने भी अपने कई दोस्तों को ये क़लमा याद कराया है तो क्या वो सारे मुसलमान हो गए ? &#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">नहीं ! इस्लाम की बुनियाद तो पांच चीजों पर है और जब तक कोई इन पाँचों चीजों को फॉलो नहीं करता वो मुसलमान नहीं हो सकता. उसी तरह अगर कोई ‘वन्दे मातरम’ गीत एक बार नहीं हज़ार बार भी गायेगा, उसके ईमान में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.</p>
<p>दोस्तों! वन्दे मातरम एक ऐसा गीत है जिसने हमें आज़ादी दिलाने में अहम् भूमिका निभाई. अंग्रेजो से लड़ाई के वक़्त सभी क्रांतिकारी इस गीत को गाया करते थे. और आज़ादी के बाद जब हमें अपना संविधान मिला तो इसी गीत को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. और अगर प्रॉब्लम थी तो उस समय विरोध क्यों नहीं किया गया?</p>
<p style="text-align: justify;">हमें अपने संविधान का सम्मान करना चाहिए. क्योंकि इसी संविधान ने हमें अपना धर्म को मानने की आज़ादी दी है. ये हमारा संविधान ही है जिसने मुसलमानों को अपनी मस्जिदों पर लाउड स्पीकर लगा कर अज़ान देने की आज़ादी दी है. मस्जिदों के पास अगर हिन्दू बस्तियां भी होती है और उनके घरों में नन्हे बच्चे और कुछ बूढ़े बीमार भी होते हैं, जिनको इन अज़ान की आवाज़ों से बहुत तकलीफ होती है, फिर भी आज़ादी है मुसलमानों को अपने धर्म की.</p>
<p style="text-align: justify;">उसी तरह दुर्गा पूजा और दीपावली में भी तेज़ आवाज़ में बजने वाले डीजे से मुसलमानों को भी तकलीफ होती है. लेकिन हमारा संविधान हर धर्म के बराबर होने का अधिकार देता है.</p>
<p style="text-align: justify;">हमें गर्व होना चाहिए अपने संविधान और अपने देश पर. अपने देश की इस धरती माँ ने ही हमें ज़मीन का टुकड़ा दिया है जिस पर अपनी मस्जिद बना कर अपने रब के आगे सजदा करते हैं. देश की ज़मीन का वो टुकड़ा ही है, जिस पर हम अपना घर बनाते हैं और जिस देश की ज़मीन से पैदा होने वाले गेंहू और चावल या अन्य अनाज खाकर ही हम जिंदा हैं. और मरने के बाद यही धरती हमें अपने ज़मीन का टुकड़े (कब्रिस्तान) में अपने दिलों के अन्दर दफ़न कर लेती है.</p>
<p style="text-align: justify;">देश और धर्म में हमेशा अपने देश को पहले रखो. पहले देश होना चाहिए और फिर धर्म. जब ज़मीन ही नहीं रहेगी तो सजदा कहा करोगे?</p>
<p style="text-align: justify;">पहले मैं अपने भारतीय होने पर गर्व करता हूं फिर मुस्लमान&#8230; मेरे लिए देश पहले है धर्म बाद में. मैं अपने देश के लिए एक नहीं हज़ार बार ‘वन्दे मातरम’ गाऊंगा.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>सिविल सर्विसेज में मुसलमानों का घटती संख्या :  ज़िम्मेदार कौन?</title>
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		<pubDate>Sat, 11 May 2013 06:41:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[Dwindling number of Muslims in civil services: Who is responsible?]]></category>
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		<category><![CDATA[Muslim in UPSC]]></category>
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		<description><![CDATA[Abdul Hafiz Gandhi for BeyondHeadlines सवाल उठता है कि क्या मुसलमानों की वर्तमान शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ेपन के लिए क्या सिर्फ और सिर्फ सरकार ही ज़िम्मेदार है? तो मेरा जवाब है: नहीं! सरकार अगर हमारे इस पिछड़ेपन के लिए ज़िम्मेदार हैं तो उससे कम मुस्लिम समाज भी जिम्मेदार नहीं है.  पिछले 65 सालों में मुसलमानों की ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Abdul Hafiz Gandhi for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">सवाल उठता है कि क्या मुसलमानों की वर्तमान शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ेपन के लिए क्या सिर्फ और सिर्फ सरकार ही ज़िम्मेदार है? तो मेरा जवाब है: नहीं!</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार अगर हमारे इस पिछड़ेपन के लिए ज़िम्मेदार हैं तो उससे कम मुस्लिम समाज भी जिम्मेदार नहीं है.  पिछले 65 सालों में मुसलमानों की संख्या सरकारी नौकरियों में घटी है. सच्चर कमेटी की माने तो हिंदुस्तान में कभी भी राज्य सरकारों की सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की संख्या उनकी जनसंख्या के मुताबिक नहीं रही है.</p>
<p style="text-align: justify;">पश्चिम बंगाल के 2006 तक के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि वहां मुसलमानों की जनसंख्या 25.5 फीसद है.लेकिन सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का हिस्सा सिर्फ 2.1 फीसद ही है. कमोबेश यही हालात दुसरे राज्यों के भी हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">केन्द्र सरकार के आंकड़े भी बहुत अच्छी तस्वीर पेश  नहीं करते हैं. सच्चर कमेटी रिपोर्ट बताती है कि IAS में सिर्फ 3 फीसद और IFS में 1.6 फीसद ही मुस्लमान हैं. यह उस वक़्त के देश भर में मुसलमानों की 13.7 फीसद जनसंख्या के मुकाबले काफी कम है.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/7722235336_dee5d4e65e_z.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15933" alt="Who is Responsible for the Muslim Under-Representation in UPSC?" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/7722235336_dee5d4e65e_z-400x300.jpg" width="400" height="300" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">हिन्दुस्तान जैसे देश में सभी वर्गों की सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी होनी चाहिए ताकि साझा लोकतंत्र कायम किया जा सके. यह हिस्सेदारी शैक्षिक संस्थाओं में भी होनी चाहिए, जिससे सभी को तरक्की का सामान अवसर मिल सके.   लेकिन सच्चाई पर नज़र डालें तो तस्वीर कुछ और ही उभरती है. 2006 में मौजूदा प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए शिक्षा की कमी एक ख़ास वजह है. लेकिन अगर कोई उनसे पूछे कि इस शैक्षिक पिछड़ेपन को कम  करने  के लिए आपकी सरकार ने क्या कोशिशें की तो शायद उनसे जवाब नहीं बन पड़ेगा. सच्चर कमेटी के मुताबिक मुस्लिम इलाकों में सरकारी स्कूलों की बेहद कमी है और नतीजतन ज़यादातर मुस्लिम बच्चे शिक्षा से महरूम रह जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सरकार के ज़रिये जो कोचिंग मुस्लिम नौजवानों को सिविल सर्विसेज की तैयारी के  लिए कराई जाती है, वहां उम्दा टीचर्स व किताबों की हमेशा कमी रहती है. एक सवाल सरकार से पूछना लाज़मी है कि हर साल मुसलमानों  की संख्या सिविल सर्विसेज में 2 से लेकर 4 फीसद तक ही क्यों रहती है? क्या कोई फिक्स्ड फार्मूला है या जानबूझ कर इसे 2 और 4 फीसद के बीच ही रखा जाता है. अगर ज़्यादा पीछे न जाकर 2006 से देखें तो उस  साल 2.2 फीसद, 2009 में 3.9 फीसद, 2010 में 2.4 फीसद, 2011 में 3.1 फीसद और 2013 में 3.1 फीसद मुस्लिम नौजवानों ने इस एग्जाम में सफलता पाई.</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों को किसी सरकारी विभाग या संस्था पर यक़ीन कायम रहे और वो यक़ीन और बढ़े इसके लिए ज़रूरी है कि उस विभाग या संस्था के  काम करने के तरीके को और पारदर्शी बनाया जाये. सूचना का अधिकार कानून-2005 से चीजें काफी पारदर्शी हुई हैं, लेकिन जहाँ तक UPSC का सवाल है तो चीजें अभी उतनी पारदर्शी नहीं हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">मिसाल के तौर पर अभी भी UPSC Preliminary exam के जवाब ना हीं अपनी वेबसाइट पर डालती है और न  ही दूसरे किसी तरीके से एग्जाम में बैठने वालों को पेपर के सही जवाब बताती है. अगर UPSC जवाब को वेबसाइट के ज़रिये आम कर देती है तो लोगों को इससे मदद मिलेगी और उसकी पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे लोगों के यकीन में और मज़बूती आएगी.</p>
<p style="text-align: justify;">UPSC सारे सब्जेक्ट्स को बराबर दर्जा देने के लिए स्केलिंग सिस्टम का इस्तेमाल करती है, पर आज तक यह क्या है और कैसे इसको निर्धारित किया जाता है, आम लोगों से छुपा कर रखा गया है. हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र में जिसको हम अधिक से अधिक भागीदारी वाला बनाना चाहते है, उस देश में कोई संस्था सरकारी नौकरियां देने के लिए क्या मापदंड अपनाती है, इसको उजागर करना उस संस्था और सरकार दोनों का काम है, ताकि लोगों के यकीन को कायम रखा जा सके.  और कोई  भी सरकारी संस्था जो इतना बड़ा और ज़रूरी काम करती हो, उसे लोगों से अपने काम-काज के बारे में खुलना ही चाहिए. उसका पारदर्शी होना साझेदार लोकतंत्र की पहली शर्त है.</p>
<p style="text-align: justify;">एक बात तो यह रही कि सरकार और UPSC की क्या जिम्मेदारी बनती है, और दूसरी बात यह है  कि  मुस्लिम समाज अपनी जिम्मेदारी को कितना निभा रहा है और उन्हें क्या क्या करना चाहिए, ताकि मुस्लिम नौजवानों की संख्या सिविल सर्विसेज बढ़ सके.</p>
<p style="text-align: justify;">कोई भी सरकार चाह  कर भी एक समाज  के लोगों के लिए बहुत अधिक कुछ नहीं कर सकती. यह भी सच है कि सरकार की लापरवाही से मुस्लिम समाज शिक्षा, सरकारी नौकरियों में पिछड़ गया है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मुस्लिम समाज ने भी अपनी जिम्मेदारी का पूरी तरह से निर्वाहन  नहीं किया है.</p>
<p style="text-align: justify;">क्या वजह है कि ग्रामीण इलाकों में 54.6 और शहरी इलाकों 60 फीसद मुस्लिम बच्चे  कभी स्कूल ही नहीं गए. एक वजह स्कूलों का मुस्लिम इलाकों में न होना है. दूसरी वजह गरीबी है और तीसरी वजह कि मुसलमानों के मज़हबी, समाजी और सियासी रहनुमाओं  ने जदीद और अंग्रेजी शिक्षा की तरफ ध्यान ही नहीं दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">हम सभी बखूबी जानते हैं कि किसी भी competition को  निकालने के लिए आरंभिक शिक्षा यानी नर्सरी से लेकर 12 वीं तक बहुत अहम रोल अदा  करती है. लेकिन मुस्लिम समाज इस लिहाज से काफी पीछे है. सच्चर कमेटी भी इसी तरफ इशारा करती है कि सबसे बुरी हालत प्रारंभिक शिक्षा की है.</p>
<p style="text-align: justify;">सरकारी नौकरियों (जिसमें सिविल सर्विसेज भी है) में मुस्लिम नौजवानों की संख्या बढ़ानी है, तो प्रारंभिक शिक्षा को दुरुस्त करना होगा और  बढ़िया से बढ़िया शैक्षणिक संस्थान खोलने होंगे. ये  feeding centres जब कायम हो जायेंगे तो खुद बखुद कॉलेजों, यूनिवर्सिटीयों और सरकारी नौकरियों में मुस्लिम बच्चे आने लगेंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे यह लगता है कि अग्रेज़ी की मांग है, क्योंकि अंग्रेजी आज मार्केट की भाषा बन चुकी है. किसी भी नौकरी में अच्छी अंग्रेजी  बोलने और लिखने   वाले के चांसेज़ बढ जाते हैं. अंग्रेजी आज की दुनिया की connecting language बन चुकी है. इसलिए इसके बगैर काम चल जाये ऐसा मुमकिन नहीं. मुस्लिम समाज को इसके लिए आगे आना होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">साथ ही साथ मुस्लिम समाज को अपनी priorities fix करने की ज़रुरत है. जब यह साफ़ है  कि सरकारी कोचिंग सेन्टर्स में पढ़ाई और गाईडेंस का काम सही से नहीं होता तो क्या हम सबकी यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि हर जगह नहीं भी तो कम से कम कुछ खास शहरों में उम्दा टीचर्स और इंफ्रास्ट्रेक्चर के साथ सिविल  सर्विसेज के लिए प्राइवेट कोचिंग सेन्टर खोले जायें.</p>
<p style="text-align: justify;">ज़रा सोचिए ! कितना अच्छा होता कि मुशायरों पर लाखों रुपये हर साल खर्च न करके अधिक से अधिक पैसा इन कोचिंग सेन्टर्स को बनाने और चलाने में लगाया जाता. सवाल सिर्फ और सिर्फ priorities के बदलने का है. सबको मालूम है कि  चंदे या बकरीद पर खाल से  और वक्फ से जमा हुआ पैसा मज़हबी तालीम पर खर्च होता है. मैं इसके खिलाफ नहीं हूँ, पर इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा जदीद तालीम और इन कोचिंग सेन्टर्स और वहां पर क्वालिटी  टीचर्स के बहाली पर खर्च हो, ताकि कुछ पुख्ता नतीजे हमारे सामने आने लगे. वर्ना हर साल मुस्लिम बच्चों की UPSC में कम संख्या पर लिखा और बोला जाता रहेगा और नतीजा  वही ढाक के तीन पात रहेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">यह नहीं, हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि सिविल सर्विसेज और दूसरी सरकारी नौकरियों में कितने मुस्लिम बच्चे appear  हो रहे हैं. इस बारे में मेरे पास अधिक आंकडे नहीं हैं पर अगर 2003 और 2004 के आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह पता चलता है   की सिर्फ 4.9 फीसद मुस्लिम बच्चे written exam  में बैठे थे. यह देखना होगा कि किस तरह एग्जाम में बैठने की फीसद को बढ़ाया जाए. इसके लिए जागरूकता की बहुत ज़रुरत है. हर शहर और अल्पसंक्यक संस्थान में करियर काउंसलिंग की जानी चाहिए ताकि सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों के बारे में बच्चों को बताया जा सके.</p>
<p style="text-align: justify;">सच्चर कमेटी के हिसाब से मुस्लिम बच्चों में सिर्फ 3.4 फीसद ही ग्रेजुएट्स हैं और सिर्फ 1.2 फीसद पोस्ट-ग्रेजुएट्स हैं. इस  स्थिति में काफी सुधार की ज़रुरत है. जब ग्रेजुएट्स अधिक होंगे तो अधिक नौकरियों के लिए अप्लाई भी करेंगे और निश्चित तौर पर नौकरियां भी पाएंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">यहाँ मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि यह किसी से भी नहीं छुपा है कि मुस्लिमों के खिलाफ सिस्टम में कहीं न कहीं भेदभाव है. सच्चर कमेटी ने इस भेदभाव को बखूबी उजागर भी किया है. इसलिए इस institutional bias के प्रभाव को कम करने के लिए रिजर्वेशन से बढ़िया और कोई तरीका नहीं हो सकता. यहाँ मै सभी को रिजर्वेशन देने की वकालत नहीं कर रहा हूं, मगर यह सुविधा उन मुस्लिम बच्चों को ज़रूर मिलनी चाहिए जो पिछड़ी जातियों से आते हैं और इनके लिए 27 फीसद में से 8.44 फीसद का कोटा फिक्स कर देना चाहिए और इसको संसद से कानून पास करा कर अमल में लाना चाहिए. इससे मुस्लिम समाज के नौजवानों को फायदा पहुंचेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">एक बात और, हमारे मज़हबी और सियासी रहनुमाओं ने  &#8217;victimhood psyche &#8216; को बहुत मज़बूत कर दिया है. इससे एक सोच पैदा हो गयी  है कि मुस्लिम बच्चे कितना भी पढ़-लिख जाये, उनको सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी. मुस्लिम समाज को इस सोच से अपने आपको बचाना होगा और बच्चों को ज़्यादा से ज़्यादा प्रोत्साहित करना होगा कि वो competitive exams में बैठे. मैं यह क़तई नहीं कह रहा हूँ कि मुस्लिम बच्चों के साथ भेदभाव नहीं होता है और न यह कह रहा हूँ कि मुस्लिम समाज को  गुजरात जैसे हज़ारों  दंगों से नहीं गुज़ारना पड़ा है, पर मैं  यह ज़रूर कहना चाह  रहा हूँ कि इससे आगे की मुस्लिम समाज को  सोचनी होगी. मुस्लिम समाज को सुरक्षा तो चाहिए ही चाहिए, लेकिन भारत के नागरिक होने के नाते उनको विकास में भी भागीदारी चाहिए. यह भागीदारी सरकारी कामकाज और नौकरियों में उन्हें मिलनी ही चाहिए.</p>
<p style="text-align: justify;">आखिरी बात यह कि मुस्लिम समाज में कोई मज़बूत प्रेशर ग्रुप या अवेयर  ग्रुप नहीं है जो आंकड़े इकठ्ठा करे और सरकार का उनकी तरक ध्यान आकर्षित कराये. किसी ने खूब कहा है की लोकतंत्र में संघर्ष और पैनी नज़र दोनों होनी चाहिए. सरकार और मुस्लिम समाज दोनों आगे आयेंगे तभी जाकर मुस्लिम बच्चों की संख्या सिविल सर्विसेज में बढ़ेगी वर्ना और कोई तरीका हाल फिलहाल नज़र में नहीं आता.</p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय में रिसर्च स्कोलर हैं और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविधालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे हैं.)</i></b><b><i> </i></b></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>‘वन्दे मातरम’ राष्ट्रवाद की कल्पना के लिए नकारात्मक है</title>
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		<pubDate>Fri, 10 May 2013 05:15:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA['Vande Mataram']]></category>
		<category><![CDATA['Vande Mataram' is negative for the imagination of nationalism]]></category>

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		<description><![CDATA[Omair Anas for BeyondHeadlines राष्ट्र की कल्पना जिसमें उस में रहने वाले सभी वर्गों के इमेजिनेशन को शामिल न किया जाय तो वो कल्पना किसी दूसरे वर्ग के लिए एक इमेजिनरी कैदखाना बन जाता है, वो भारतीय इतिहास जिसमें दलितों को गर्व करने के लिए कुछ न हो वो उनको राष्ट्र की वही कल्पना नहीं ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Omair Anas for BeyondHeadlines</b><b></b></p>
<p style="text-align: justify;">राष्ट्र की कल्पना जिसमें उस में रहने वाले सभी वर्गों के इमेजिनेशन को शामिल न किया जाय तो वो कल्पना किसी दूसरे वर्ग के लिए एक इमेजिनरी कैदखाना बन जाता है, वो भारतीय इतिहास जिसमें दलितों को गर्व करने के लिए कुछ न हो वो उनको राष्ट्र की वही कल्पना नहीं दे सकता जो गैर दलितों को मिलेगा. इसलिए आज़ादी से पहले ब्रिटिश, मुग़ल, मौर्या, कुषाण, गुप्ता और अन्य  सम्राज्यवाद, समेत सभी किस्म की कल्पनाएँ जिसमें किसी एक वर्ग का इमेजिनेशन हो रद्द कर दिया जाना चाहिए था जो नहीं हुआ, और एक नई कल्पना गढ़नी थी जो सबके लिए सामान हो.</p>
<p style="text-align: justify;">देखा जाए तो मनुस्मृती में भी दो चार बाते सत्य वचन, सफाई, प्रेम आदि जैसे मूल्यों पर होंगी, लेकिन इसके बावजूद उन श्लोकों को राष्ट्र की परिकल्पना के लिए मिट्टी गारे के लिए प्रयोग नहीं कर सकते, और यदि ऐसा हुआ तो वर्ण व्यवस्था के पीड़ित लोग उसे कभी नहीं मानेंगे, दस अछूत बन्धुवों से ये पूछ कर बताएं कि क्या वो मनुस्मृति के वो श्लोक जो वर्ण व्यवस्था से सम्बंधित न हों किया वो उन श्लोकों का जाप करने को तैयार हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी तरह ‘वन्दे मातरम’ भी है जो एक विवादित पुस्तक और विवादित व्यक्ति के दिमाग से निकली है जो मुस्लिम नफ़रत पर आधारित है, इसलिए इस गीत को बढ़ावा देना दरअसल उस नफ़रत को बढ़ावा देना है. ये आप भली भांति जानते हैं कि इतिहास कभी पीछा नहीं छोड़ता. ‘वन्दे मातरम’ एक नफ़रत की कोख से जन्मा गीत है. इस बात से किसी तरह से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता. (देखिये आनंद मठ से कुछ मुसलमानों के लिए नफ़रत भरी मिसालें)</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/2.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16046" alt="2" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/2-400x203.png" width="400" height="203" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/dom-chamar.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16047" alt="dom chamar" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/dom-chamar-400x109.png" width="400" height="109" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/english-raaj.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16048" alt="english raaj" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/english-raaj-400x203.png" width="400" height="203" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/laeksh-musalman1.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16049" alt="laeksh musalman1" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/laeksh-musalman1-400x82.png" width="400" height="82" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/maleks-2.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16050" alt="maleks 2" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/maleks-2-400x144.png" width="400" height="144" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/musalman.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16051" alt="musalman" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/musalman-400x184.png" width="400" height="184" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/muslim-hindu.png"><img class="aligncenter size-large wp-image-16052" alt="muslim hindu" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/muslim-hindu-400x81.png" width="400" height="81" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">कुछ लोग कह रहे हैं की ‘वन्दे मातरम’ को आनंद मठ से अलग करके देखा जाना चाहिए. इतिहास में भटकने की बजाये खुले मन से आगे की ओर बढ़ना चाहिए. और ये कि वंदे मातरम् (आधुनिक) में  किसी तबके के खिलाफ कोई तकलीफदेह बात नहीं है. और ये की समाज तेजी से बदल रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले पांच हज़ार साल में वर्ण व्यवस्था पर आधारित हमारी सामाजिक सरंचना में क्या बदलाव आया है. भारतीय संविधान द्वारा उसे रद्द किये जाने के बाद भी ये एक सच्चाई बनी हुई है. अमूमन समाज में बदलाव संरचनात्मक नहीं आता है बल्कि सिर्फ ऊपर ऊपर आता है. जब सत्ता और पावर का समीकरण बदलता है तो फिर व्यापक बदलाव आता है वो भी ज़रा धीरे धीरे&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">भारत का इतिहास आपसी लडाई, संघर्ष, शोषण से भरा पड़ा है. जिसमें कोई एक वर्ग हमेशा पीड़ित रहा है. आज के सेकूलर और लोकतान्त्रिक भारत ने सभी वर्गों को पहली बार ये मौका दिया है कि वो समान रूप से समान अधिकारों और जिम्मेदारियों के साथ रहें और ये तजुर्बा अभी बस 60 साल का हुआ है. मुसलमान अभी इतना दिमाग खोलने को तैयार नहीं होगा, वो भी उस वक़्त जब वो देख रहा है की गुजरात में उसको कत्ल करने वाला, बाबरी मस्जिद पर चढ़ कर तांडव करने वाला, हर जगह वन्दे मातरम का नारा लगाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">जब कोई वन्दे मातरम जोर से गाता है मुस्लिम मन डरने लगता है. जैसे फिर कुछ होने वाला है. जय श्री राम और वन्दे मातरम पर उग्रवादी हिन्दू राष्ट्रवाद ने कब्ज़ा कर लिया है, जिससे इस बात का मौका ख़त्म हो गया है कि वन्दे मातरम को आनंद मठ से अलग कर के देखा जाय. (देखिये गुजरात दंगों में जयश्री राम और वन्दे मातरम का एक डरावना प्रयोग)</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/gujarat_riots.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16053" alt="gujarat_riots" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/gujarat_riots-258x400.jpg" width="258" height="400" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल बच्चे को उसकी माँ से अलग नहीं किया जा सकता. वन्दे मातरम बंकिम चन्द्र चटर्जी की बौद्धिक संतान है और रहेगा. और समाज में उसको सम्मान उसी रूप से ही मिलेगा. मुसलमान इसी बात से विचलित हैं कि वन्दे मातरम दरअसल उस पुरानी नफ़रत भरी कहानी को दुबारा स्थपित करने की कोशिश है.</p>
<p style="text-align: justify;">आज़ादी के संघर्ष के समय संघ परिवार के विचारकों ने इस गीत को आगे बढाया. उस ज़माने में मुसलमानों ने उसपर इसलिए कुहराम नहीं मचाया क्योंकि अग्रेजी सम्राज्यवाद का चैलेंज बहुत बड़ा था. लेकिन आजादी के बाद इस गीत को उनके ऊपर थोप कर जैसे धोका कर दिया गया हो.</p>
<p style="text-align: justify;">मैं मानता हूँ कि आज का भारत मुग़ल काल के भारत से या फिर उससे पहले के भारत से लाख गुना बेहतर है. लेकिन उसे कथित गौरवशाली इतिहास की तरफ वापस ले जाने का संघ का आन्दोलन आज के बदलते भारत का रास्ता बार-बार रोक रहा है. ये बात कि भारत को कथित गौरवशाली इतिहास की तरफ ले जाने की संघ परिवार की विचारधारा एक तबके में बहुत मज़बूत हो गयी है, जिसके समीकरण वोट की राजनीती से फिट बैठ रहे हैं. इसलिए हिन्दू राष्ट्र का सपना मात्र सपना नहीं बल्कि एक सचमुच में चल रहे संगठित और समर्पित विचारधारा है.</p>
<p style="text-align: justify;">इस विचारधारा में मुसलमानों की देशभक्ति को हमेशा शक के दायरे में रखना एक बहुत बड़ी राजनितिक ज़रूरत है, जिससे बहुसंख्यक वोट संगठित होता है. इसके लिए इतिहास में मुसलमानों द्वारा किये गए कथित अपराधों की सजा आज दी जायगी. हर वो चीज़ जो मुसलमानों से सम्बंधित हो वो या तो विवादित हो जाये, या शक के दायरे में हो या देशद्रोह की बू देने लगे, वन्दे मातरम का विवाद इसी सिलसिले की समय-समय पर आने वाला दृश्य है.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरी समझ ये कहती है कि हमें वन्दे मातरम पर इस मतभेद को स्वीकार करके एक दुसरे पर भरोसा करना होगा और मुसलमानों पर उसे थोपने की बजाये इक़बाल का सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा को भी एक संविधानिक दर्जा देकर दोनों गीतों को मान्यता देनी चाहिए. वक़्त गुज़रने दें अगर हम आगे को बढ़ते रहें तो आप की बात सही साबित हो जायगी कि वन्दे मातरम को आनंद मठ से हटा कर देखा जा सकता है और अगर संघ परिवार ने मुल्क को पीछे की ओर कथित गौरवशाली इतिहास की तरफ ले जाने की कोशिश की तो फिर संघर्ष गहरा होगा और ये खतरा गुजरात नरसंहार के बाद लगातार बढ़ता जा रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसलिए एक सेकूलर डेमोक्रटिक भारत की ज़रूरत देश के हर वर्ग की है. इसलिए एक नए भारत का निर्माण एक नए इतिहास से ही संभव है. ये मान लेना बहुत ज़रूरी हो गया है कि भारत का आज़ादी पूर्व इतिहास तमाम तरह की समस्याओं से भरा पड़ा है. इतिहास हमारे आज के भारत को हांकने की कोशिश न करे.</p>
<p style="text-align: justify;">कोई वन्दे मातरम आनंद मठ से अलग होकर गाये तो गाये. उसके देश प्रेम में शक करने की कोई वजह नहीं है, लेकिन जिन्हें मतभेद है तो उनके देश प्रेम पर सवाल न खड़े किये जाएँ. देश के लोगों से और देश प्रेम को किसी गीत के तराजू में तौलेंगे तो बड़ी भारी भूल होगी. उठाइए गद्दारों की और शहीदों की लिस्ट, जो वन्दे मातरम नहीं गाते हैं. उनके नाम देश के लिए क़ुरबानी में हर जगह नज़र आएंगे. और आगे भी, और जो वन्दे मातरम गाते थे उनके प्रमुख नाम गद्दारों की लिस्ट में अग्रेजों से समझौता करने वालों में ये नाम नज़र आएंगे, वन्दे मातरम गाना या नहीं गाना किसी तरह से देश प्रेम का सवाल नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;">मतभेद को स्वीकार करके भी आगे की ओर सफ़र जारी रह सकता है.  ये मुल्क एक बाग़ीचा है जहाँ हर तरह के फूल के रहने से ही सुन्दरता है. उसे नर्सरी या एक फूल वाली कियारी मत बनाओ. मुस्लमान मन भी खुद को मुग़ल काल के सपनों से बाहर कर ले. और हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले रामराज्य के बजाय “काम काज्य” बनाने पर ध्यान दें. वन्दे मातरम मुल्क को पीछे की तरफ धकेलने वाले हिन्दू राष्ट्र के सपने का एक हिस्सा है जिसका नुक़सान सिर्फ मुसलमानों को नहीं बल्कि पूरी हिन्दुस्तानी कौम को उठाना होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखक जेएनयू में अंतर्राष्ट्रीय अध्यन केंद्र में शोधार्थी हैं, उनसे </i></b><b><i><a href="mailto:omairanas@gmail.com">omairanas@gmail.com</a></i></b><b><i> पर संपर्क कर सकते हैं.)</i></b></p>
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		<title>कैसे नहीं जलेंगे लालटेन…?</title>
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		<pubDate>Wed, 08 May 2013 22:12:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[another stroy of bihar development]]></category>
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		<category><![CDATA[real facts of bihar]]></category>

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		<description><![CDATA[Rajeev Kumar Jha for BeyondHeadlines पूर्वी चम्पारण मुख्यालय से लगभग दो किलोमीटर दूर एक गाँव है बरियारपुर. गाँव क्या है शहर और गाँव के बीच का ब्रोडलाईन है. चकिया, कांटी, मुजफ्फरपुर से होते हुए पटना और उससे आगे जाने वाले वी.आई.पी लोगो को जैसे गच्चा देती हो यह गाँव… डी.एम. से लेकर सी.एम तक सांसद ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>Rajeev Kumar Jha for BeyondHeadlines </strong></p>
<p>पूर्वी चम्पारण मुख्यालय से लगभग दो किलोमीटर दूर एक गाँव है बरियारपुर. गाँव क्या है शहर और गाँव के बीच का ब्रोडलाईन है. चकिया, कांटी, मुजफ्फरपुर से होते हुए पटना और उससे आगे जाने वाले वी.आई.पी लोगो को जैसे गच्चा देती हो यह गाँव… डी.एम. से लेकर सी.एम तक सांसद से लेकर विधायक तक इसी गाँव की सरहद से गुजरते हैं. अब काले शीशे से बरियार पुर न दिखे तो अलग बात है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">खैर! शाम के लगभग सात बजें है. गाँव के घर लालटेन और डिबरियों से लाल हो गए हैं. बिजली के पोलों पर वर्षों से लटकी तारें जैसे खिल खिला रहीं हैं. इसी बीच एक घर में आठवी का छात्र विवेक लालटेन लेकर पढने बैठा है. इधर पास में मोतिहारी शहर बिजली से जगमगा रहा है. आप अब चहकिए मत! दरअसल यहाँ इस सप्ताह मुख्यमंत्री का दौरा है. ये बिजली भी न नेताओं के आने पर हीं जगमगाया करती है.</span></p>
<p style="text-align: justify;">शहर के हर चौक चौराहे पर आई.पी.एल. की खुमारी चढ़ी है. सो बिजली आज और ज्यादा सुहावन लग रही है. इधर तेज हवा के झोंके से विवेक की लालटेन बार-बार बुझ जा रही है. उधर कई घरों में चूल्हे में पानी पटा दिया गया है. आग लगने का डर जो है. अब आंधी जाए तब तो चुल्हा जले! अब आंधी जाए तो लालटेन जले!</p>
<p style="text-align: justify;">उधर आई.पी.एल.में छक्कों की बरसात पर किलकारियों और सिटिओं से आसमान के कान का चदरा फट रहा है. इधर कल टीचर से मार खाने को तैयार विवेक बिना होमवर्क किये सो गया है. घर के चूल्हे अभी तक नहीं जले हैं.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">अब विकास तो हो रहा है पर हमारे गाँव कहाँ है?</span><span style="font-size: 13px;">बिजलियों के खम्भों में तार के जाल तो बिछ रहें हैं, पर बिजली कहाँ है? </span><br />
<a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/522951_465197763519076_92829816_n.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16031" alt="another story of bihar development" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/522951_465197763519076_92829816_n-400x225.jpg" width="400" height="225" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">बरियारपुर के धर्मेन्द्र कुमार, विनय कुमार, त्रिलोकीनाथ बताते है “वर्षों से हम बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं. गांव में पोल और तार तो लगे है पर अब ऐसा लगने लगा है कि वह केवल हम ग्रामीणों को चिढाने के लिए ही थे.</p>
<p style="text-align: justify;">ऐसा नहीं है कि यह समस्या गिने चुने गांवो या शहरों की है. लेकिन इनमें गांवो के हालात ज्यादा बदतर हैं. पूरा राज्य बिजली के लिए त्राहि त्राहि कर रहा है. पटना, मुजफ्फरपुर, कांटी आदि जैसे कुछ बड़े शहरों को छोड़ दें तो सोरपानिया, मुरली, रुपौलिया, ढाका, भण्डार, देवापुर,  पताही, सुगौली, फुलवरिया, चोरमा, छगाराहा, सुगाव आदि जैसे सैकड़ों गाँव में बिजली महज एक नैनसुख बनकर रह गई है.</p>
<p style="text-align: justify;">छोटे शहरों में भी चार घंटे से अधिक बिजली नहीं रहती. यदि किसी शहर में आठ से दस घंटे बिजली किसी दिन रह जाए तो वहाँ के लोग समझ जाते है कि उस दिन निश्चित हीं कोई न कोई मंत्री या विधायक अथवा कोई कद्दावर नेता आया है.</p>
<p style="text-align: justify;">दरअसल, राज्य में औसतन 3000 मेगावाट बिजली की जरुरत है. लेकिन अलग अलग केन्द्रीय विद्यूत संयंत्रों से जो बिहार को हिस्सा मिलता है वह लगभग 1772 मेगावाट है. इस कारण पूरे राज्य में बिजली के लिए विभागीय छिना झपटी स्वाभाविक है.</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार के दौरान 1977 में लगाईं गयी दो बिजली इकाईओं के बाद भी यहाँ बिजली उत्पादन में कोई ख़ास इजाफा नहीं हुआ. फिर 17 मार्च 1986 में बिन्देश्वरी दुबे के कार्यकाल में मुजफ्फरपुर विद्यूत संयंत्र में 110 मेगावाट की दूसरी यूनिट स्थापित की गई लेकिन रख-रखाव के अभाव में इसने भी दम तोड़ दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">बिहार इकोनॉमिक्स सर्वे रिपोर्ट 2013 के मुताबिक़ राज्य में केंद्र सरकार की 6800 मेगावाट की परियोजनाए है. इसमें से 1772 मेगावाट बिजली यहाँ आवंटित होती हैं. इसमें 900 से 1000 मेगावाट बिजली ही सही से मिल पाती है. अब दस करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले राज्य में इतनी बिलजी ऊंट के मुंह में जीरा डालने की तरह है. अकेले पटना में 450 मेगावाट बिजली की जरुरत है जिसमें 250-300 मेगावाट ही मिलता है. अब उससे जो बचे उसमें पूरा बिहार है. सबसे बड़ी दुर्भाग्य की बात तो यह है कि गांवो के देश भारत में राष्ट्रीय औसत 20.30 फीसदी की एक चौथाई बिजली ही किसानों को मिल पाती है. 2002-03 में बिजली की मांग और आपूर्ति का फीसद अंतर 4.6 फिसद था जो 2010-11 में बढ़कर 48.53 फीसद हो गया. फिर कैसे नहीं होगी हाहाकार&#8230; कैसे नहीं जलेंगे लालटेंन&#8230; कैसे बने विवेक का होमवर्क?
</p>
<h2 style="text-align: justify;">बिजली का पता नहीं बढ़ गया बिजली दर</h2>
<p style="text-align: justify;">एक तो भीषण गर्मी ऊपर से बिजली की बेवफाई और इसी बीच बिजली दर में इजाफे की घोषणा नें लोगों की व्याकुलता को और बढ़ा दिया है. बढ़ी हुई दरें एक अप्रैल से लागू हो चुकीं हैं. व्यवसायिक और अन्य वर्ग के करीब 24 लाख उपभोक्ताओं के लिए औसतन 6.9 फीसदी बढ़ोतरी की गई है. इस से बिहार राज्य पावर होल्डिंग कम्पनी लिमिटेड को करीब 241 करोड़ अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति होगी. घरेलू आपूर्ति वर्ग में प्रति माह 100 यूनिट खपत करने वालों को अब 2.85 रुपये देने होंगे, जबकि 101-200 यूनिट के लिए 3.50 रुपये, 201-300 यूनिट के  लिए 4.50 रुपये, 300 से अधिक यूनिट खपत करने वालों को 5.30 की दर से बिजली बिल देने होंगे.</p>
<p style="text-align: justify;">
<h2 style="text-align: justify;">क्या कहती है सरकार</h2>
<p style="text-align: justify;">बिहार के मुख्यमंत्री साफ़ शब्दों में यह कह चुके हैं कि 2015 तक यदि गाँव-गाँव तक बिजली नहीं पहुंचाई और बिजली कि समस्या से निजात नहीं दिलाया तो वह वोट माँगने नहीं जायेंगे. हालाकि यह घोषणा किये भी लगभग तीन साल बीत चुके हैं. इस बीच शहरों की स्थिति तो ज़रुर सुधरी है किन्तु गांवो की स्थिति जस की तस बनी हुई  है.</p>
<p style="text-align: justify;">गाँव में बिजली की स्थिति दुरुस्त करने के लिए कारवाई शहरों से शुरू करनी होगी. बिजली बिल को सख्ती से वसूलना होगा. सरकारी कर्मचारियों जिनके यहाँ लाखों रुपये बिजली बिल बाकी रहते हैं उन्हें सख्ती से वसूलना होगा. जो उपभोक्ता समय पर लगातार बिल का भुगतान करते हैं उन्हें स्थानिय स्तर पर पुरस्कृत करने से भी अच्छा सन्देश जाएगा. सबसे अहम कदम यह कि राज्य में मध्य प्रदेश की तर्ज पर कम से कम 50 बायोमास संयंत्र लगाए जाएँ. बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य के लिए यह संयंत्र न केवल बिजली की किल्लत को दूर करेगा बल्कि बिहार से बाहर मजदूरों के पलायन में रोकने में अहम भूमिका भी निभाएगा. इस संयंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें गोबर, घास, गेहूं और धान के नाड़, भूसा आदि जैसे अपशिष्ट पदार्थों से बिजली का उत्पादन किया जाता है. अब गेहूं और धान भी पैदा करो और अच्छी कीमत में भूसा, चोकर और गोबर तक बेचो. मतलब किसानों के लिए यह आम के आम और गुठलियों के दाम सिद्ध होगा.</p>
<p><em><strong>(लेखक बिहार विश्व विद्यालय में पत्रकारिता में शोधछात्र है और उनसे <a href="mailto:cinerajeev@gmail.com">cinerajeev@gmail.com</a> पर संपर्क किया जा सकता है )</strong></em></p>
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		<title>&#8220;आज़ाद मैदान विरोध-प्रदर्शन&#8221; सरकार दोहरे पैमाने समाप्त करे</title>
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		<pubDate>Wed, 08 May 2013 15:11:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[azad maidan protest]]></category>
		<category><![CDATA[PIL on azad maidan protest]]></category>

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		<description><![CDATA[Mujtaba Farooque for BeyondHeadlines पिछले साल बर्मा व असम में मुसलमानों के क़त्ल-ए-आम के खिलाफ आज़ाद मैदान में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान अचानक हो जाने वाले दंगे से नुक़सान की भरपाई के लिए मंगलवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए भरपाई हासिल करने के लिए महाराष्ट्र सरकार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 सप्ताह ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Mujtaba Farooque for BeyondHeadlines</b><b></b></p>
<p style="text-align: justify;">पिछले साल बर्मा व असम में मुसलमानों के क़त्ल-ए-आम के खिलाफ आज़ाद मैदान में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान अचानक हो जाने वाले दंगे से नुक़सान की भरपाई के लिए मंगलवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए भरपाई हासिल करने के लिए महाराष्ट्र सरकार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 सप्ताह की और मोहलत दी है. अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से इस पूरे मामले में होने वाले नुक़सानात का तफ़सील व तमाम सवालों का जवाब देने का भी आदेश दिया है. दरअसल यह सुनवाई दो पत्रकारों के ज़रिए आज़ाद मैदान में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान अचानक हो जाने वाले दंगे से नुक़सान की भरपाई के लिए दाखिल की गई जनहित याचिका पर हो रही थी.</p>
<p style="text-align: justify;">आज़ाद मैदान विरोध-प्रदर्शन से संबंधित जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की रुचि बहुत खूब है. ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान का यह पहला प्रदर्शन है जिसमें तोड़फोड़ हुई है और अमन व इंसाफ का निज़ाम (व्यवस्था) इसके इस्लाह (सुधार) के लिए हरकत में आ गया हो.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/hindustantimes.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-16023" alt="Azad Maidan protest : government should eliminate dual scale of justice (Photo Courtesy: hindustantimes.com)" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/hindustantimes.com_-400x297.jpg" width="400" height="297" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">काश ऐसा होता कि कहीं कोई दंगा का माहौल नहीं बनता. लेकिन न जाने क्यों यह ज्यादा बड़ी व खतरनाक घटनाओं का नोटिस नहीं लिया जाता, उस समय हमारे यह जोशी या फिर कुलकर्णी कहाँ होते हैं?</p>
<p style="text-align: justify;">कितने ही विरोध-प्रदर्शन ऐसे हैं जिसमें शिव-सेना और दूसरे संगठनों ने खुलेआम कानून का उल्लंघन करते हुए न सिर्फ तोड़-फोड़ की है, बल्कि कई मीडिया के कार्यालयों को तहस नहस कर दिया. लेकिन किसी मीडिया की हिम्मत नहीं होती, वो इसका सही विरोध भी सके. क़ायदे से अपने दफ्तर पर हुए हमले को भी दिखा सके.</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे बड़ी घटना जो भारतीय इतिहास का एक काला अध्याय है. वो है बाबरी मस्जिद की शहादत&#8230; इस आंदोलन के नतीजे में न जाने कितने मस्जिदें शहीद कर दी गई. हालांकि कई जगह मंदिर भी तोड़े गए. यानी  सैकड़ों मंदिरों, मस्जिदों में तोड़फोड़ सैकड़ों दंगे, सैकड़ों लोगों की जान- माल, इज़्ज़त व आबरू सब कुछ खाक में मिल गईं. सरकार की संपत्तियों का  करोड़ों-करोड़ का नुकसान हुआ.</p>
<p style="text-align: justify;">पिछले 20 सालों से हर साल 6 दिसंबर देश के प्रशासन के लिए एक नासूर है. लेकिन क्या इस देश में कोई है जो इस आंदोलन के आयोजक आडवाणी जी, उमा भारती, विनय कटियार, अशोक सिंघल आदि से उसका भरपाई करवा पाए. कम से कम उन्हें इसके लिए नोटिस भेज सके. लोगों के जान-माल, इज़्ज़त व आबरू का इंसाफ मांग सके. कोई अदालत suo moto के तहत कोई कार्रवाई  कर सके. कोई सनकित और जोशी जनहित याचिका दाखिल करे.</p>
<p style="text-align: justify;">आज़ाद मैदान के विरोध-प्रदर्शन में न जाने कौन लोग थे, जिन लोगों ने तोड़फोड़ की? न जाने यह किसकी साज़िश थी? उसकी जांच की जानी चाहिए थी, पर अफसोस किसी ने इसकी जांच नहीं की या न ही इसके जांच की मांग की. हमारी वेल्फेयर पार्टी महाराष्ट्र सरकार और भारत सरकार से मांग करती है कि अपने न्याय के दोहरे पैमाने को समाप्त करे. देश को वाक़ई अमन व इंसाफ देने के लिए हर घटने का नोटिस ले और जो इसके वास्तविक दोषी हैं उन्हें सजा दे. सिर्फ आज़ाद मैदान के आयोजकों को गैर जरूरी परेशानी क्यों हो?</p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखक वेल्फेयर पार्टी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)</i></b></p>
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		<title>सिनेमा के सौ साल : ‘श्रीराम’ से लेकर ‘तेरी बहन’ तक&#8230;</title>
		<link>http://beyondheadlines.in/2013/05/100-years-of-indian-cinema/</link>
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		<pubDate>Mon, 06 May 2013 06:17:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Latest News]]></category>
		<category><![CDATA[Lead]]></category>
		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[100 years of indian cinema]]></category>
		<category><![CDATA[सिनेमा के दशक ‘श्रीराम’ से लेकर ‘तेरी बहन’ तक...]]></category>

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		<description><![CDATA[Anita Gautam for BeyondHeadlines बहुत दिनों से टीवी पर मुंबई टाकिज के कुछेक गाने हर जगह छाए हुए हैं जिसमें हर दशक को बखुबी दिखाया गया है. बावजूद उसके आज बहुत दिनों बाद रामानंद सागर द्वारा बनाई रामायण देख आंखे भर आईं. 80 के दशक में शायद लोग कामधाम छोड़, रामायण ठीक उसी प्रकार देखा ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Anita Gautam for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">बहुत दिनों से टीवी पर मुंबई टाकिज के कुछेक गाने हर जगह छाए हुए हैं जिसमें हर दशक को बखुबी दिखाया गया है. बावजूद उसके आज बहुत दिनों बाद रामानंद सागर द्वारा बनाई रामायण देख आंखे भर आईं. 80 के दशक में शायद लोग कामधाम छोड़, रामायण ठीक उसी प्रकार देखा करते थे जैसे आज के दौर मे लोग आईपीएल या कोई मैच देखते हैं. तब लोग राम का वनवास, सीता हरण यहां तक कि मां सीता की अग्नि परीक्षा से लेकर उनका धरती मां में समाना देख फूट-फूट वैसे रोते थे, जैसे अब कहानी घर-घर की में मिहीर को मरता देखकर…</p>
<p style="text-align: justify;">कार्यक्रम देखने की उत्सुकता बच्चों और महिलाओं में ठीक वैसी ही होती थी जैसे आज सास-बहु धारावाहिक या कार्टून देखने की होती है. उस समय बच्चे खेल-खेल में राम-भरत-शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान, सीता और रावण की भूमिका निभाते थे, उन सबके मुखौटे और नकली पूंछ लगा घुमते थे और आजकल के बच्चे डारिमान, स्पाइडर मैन, निंजा-हतौड़ी और आयरन मैन के मुखौटे लगा घुमते हैं. आज की महिलाएं सीता का किरदान निभाना तो दूर कमोलिका, मल्लिका, झूंपा लहरी बनने की बखुबी कोशिश करती हैं&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Indian-Cinema-Completes-100-Years-1913-To-2013-1724.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-15977" alt="Indian Cinema Completes 100 Years" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/05/Indian-Cinema-Completes-100-Years-1913-To-2013-1724.jpg" width="383" height="258" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">अजीब बात है, एक वो दौर था और एक ये दौर है. इस दौर में संबंधों की समझ न के बराबर रह गई है और वो डोर अब मज़बूत नहीं रही, इसके पीछे वो हाई क्लास तबका है जो समाज को नये-नये आइडिया देता है. ऐसे धारावाहिक या फिल्में हैं जिसे देख लोग 2 तो क्या 4 शादियों को गलत करार नहीं देते. लोगों को लगता है जब धारावाहिक में मिस्टर बजाज दो शादी कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? राखी का स्वयंवर हो सकता है तो मैं क्यों नहीं? अरे फला हिरोईन ने तो चार शादी की फिर मैं क्यों नहीं? लेकिन ऐसे हाई क्लास लोग अपने कुकर्म को सुकर्म मानकर लोगों के सामने अपनी मानिकता को चित्रित करते हैं और हम लोग भी भेड़चाल में विश्वास करने वाले अपने शरीर को ढ़कने की जगह उसे अधनंगा किये मॉडर्न फैशन की बात करते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">पर्दे का खुलापन कहिए या समाज का, महेश भट्ट जैसे महान लोग ये तक बोलते शर्म नहीं करते कि अगर पूजा मेरी बेटी न होती तो मैं इससे शादी कर लेता, तो फिर ये वहीं समाज ही तो है जिसमें बाप-बेटी का भाई-बहन की इज्जत को तार-तार करने से बाज नहीं आ रहा. आखिर समाज हम से ही तो है.</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं लिव इन रिलेशनशिप, एक्सट्रा मैरिटल अफेयर्स नामक नये नये शब्द संबंधों की शब्दावली में जुड़ते जा रहे हैं. मानों अब तो समय के साथ संबंधों की परिभाषा का भी माडलाइजेशन हो गया हो. यदि किसी मीडिया या फिल्म निर्माता टाइप लोगों से आज कल की फिल्मों में हो रही अश्लीलता पर बात की जाए तो वो हंस कर बोलते हैं हम तो वही दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है. अब वो जमाना गया.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर कोई ज़रा मुझे यह समझाए कि आज कौन सा जमाना है, क्या इस ज़माने की पसंद और मांग बलात्कार से भी उपर उठकर गैंगरेप में बदल गयी है या औरत का स्वरूप सिर्फ मर्दों को गोरा करने वाली क्रीम तक रह गया है? आज शायद लोगों की पसंद यूटीवी, एमटीवी, फैशन चैनल, स्टार प्लस या एक्शन मूविस हो गई हैं. जो गलती से आस्था या संस्कार चैनल देख लिया पाया जाता है लोग उसे बाबा या माताजी बोलने लगते हैं. बुक स्टाल पर आप भी किसी दिन अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए एक बार किसी धार्मिक पुस्तक के बारे में पूछिएगा, अंग्रेजी अथवा हिन्दी किताबों पर अधनंगे कपड़ों में कोई गोरी नज़र आ जाएगी और दुकान वाला आपको घुर कर देखेगे, मैं ऐसा इसलिए बोल रही हूं कि विगत दिनों में संस्कार पत्रिका लेने नई दिल्ली स्टेशन, अधिकांश मेट्रो स्टेशन की दुकानों के अलावा सरकारी दफ्तरों के बाहर की दुकानों पर भी संस्कार पत्रिका को ढूंढ रही थी, संस्कार पात्रिका तो क्या अन्य कोई धार्मिक पत्रिका नहीं मिली, अलबत्ता दुकान वाला हंसते हुए बोला-अरे मैडम इसे पढ़ता भी कौन होगा? फिर आप ही सोचिए क्या इन सबके चलते हम अपनी गंदी मानसिकता और अपराधों पर काबू पा संकेगें?</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 13px;">मैं आज सिर्फ ये सोच रही हूं कि हमारी आने वाली पीढि़यां क्या सीखेंगी? हम तो स्वयं माड्रन कल्चर और आधुनिकता के अधीन हो चुके हैं फिर कौन उन्हें संस्कार, संस्कृति, समाज, राष्ट्रधर्म, पिता भक्ति, मां का आदर कर वचनों का पालन करने की शिक्षा देगा? क्या सलमान खान, जान इब्राहिम, इमरान हाशमी, सनी लियोनी, मल्लिका शेहरावत, करीना कपूर आदि कलाकारों से हमारा समाज सुधरेगा?</span></p>
<p style="text-align: justify;">80 के दशक में भी मीडिया और सिनेमा थी और आज भी है, फिर इतना परिवर्तन क्या हमारी सोच और ज़रूरतों के हिसाब से नहीं हो रहा? क्या आपको नहीं लगता हमें ऐसे धारावाहिक या फिल्मों का बहिष्कार करना चाहिए? ज़रूरी नहीं हर जंग हर लड़ाई का समाधान युद्ध या जंतर-मंतर से इंडिया गेट तक की मोमबत्ती यात्रा ही हो&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">
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