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	<title>Beyond Headlines &#187; Holi Special</title>
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		<title>त्यौहार रंगो से नहीं दिल से मनाए जाते हैं&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2013 08:16:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Anita Gautam for BeyondHeadlines होली रंगों का त्यौहार, नीले-पीले, लाल गुलाबी चारों ओर रंगमय खुशनुमा माहौल, कुछ लोग रंग खेलते हैं तो कुछ होली को नशे के साथ धूमधाम से मनाते हैं. पर मेरा मानना है कि त्यौहार अनेक रंगो से नहीं दिलों से मनाए जाते हैं. लोगों का कहना है इस दिन सारी दुश्मनी ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Anita Gautam for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">होली रंगों का त्यौहार, नीले-पीले, लाल गुलाबी चारों ओर रंगमय खुशनुमा माहौल, कुछ लोग रंग खेलते हैं तो कुछ होली को नशे के साथ धूमधाम से मनाते हैं. पर मेरा मानना है कि त्यौहार अनेक रंगो से नहीं दिलों से मनाए जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">लोगों का कहना है इस दिन सारी दुश्मनी भूला दुश्मन को भी गले गलाना चाहिए. अगर किसी के मन में किसी के प्रति बैर है तो उसे हमेशा के लिए समाप्त करना चाहिए न कि सिर्फ एक दिन हर बातों को भूल, अपने दुश्मन को गला लगाना उचित होगा और वो भी दिल से.</p>
<p style="text-align: justify;">त्यौहार होली के रंगों और दिपावली के दीयों से नहीं दिलों से मनाए जाते हैं, हाथ में रंग थामे जबरन लोगों को रंग लगाना आसान हो सकता है, पर लोगों के मन में बुरे भाव को निकालना उतना ही मुश्किल. दीपावली पर अपने घरों को रोशन तो हर इंसान करता है, पर किसी अंधियारे के घर रोशनी करना, गोवर्धन पर्वत उठाने समान है. 364 दिन भगवान को भूल जाना और एक दिन एकाएक धर्म और संस्कृति की बात करना&#8230; मेरे लिए हर रोज होली और दीपावली है. मात्र एक दिन नहीं&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/santabanta.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15531" alt="Photo Courtesy: santabanta.com" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/santabanta.com_-400x280.jpg" width="400" height="280" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">जबसे समाज को समझने की शक्ति आई है, मैंने आजतक हिन्दू हो कर भी कभी कोई भी एक दिवसीय त्यौहार अर्थात् सिर्फ एक दिन भगवान का नाम लेना, एक दिन पवित्रता की बात करना, साल भर महिलाओं और बच्चियों को बुरी नज़र से देखना पर नवरात्रों में देवी का रूप मान पूजा करना, साल भर पति को गाली देना और एक दिन उसकी लंबी आयु की मंगलकामना करना, तो श्राद्ध के नाम पर अपने पितरों के नाम पितरों के मनपसंदीदा भोजन बना ब्राह्मणों को भोजन कराना पर ये भूल जाना कि जिसको जिंदा पर पानी देना आफत सा लगता था, उसके हिस्से की एक रोटी सेंकना बहुत मुश्किल काम था, आज उसके मरणोपरांत श्राद्ध कर रहे हैं&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">लोग एक दिपावली के त्यौहार को मनाने में हजारों लाखों रूपये तक बरबाद कर देते हैं, अपने घर का कोई कोना नहीं छोड़ते जहां रोशनी न हो, यहां तक कि लोग बाथरूम के बाहर दीया लगाकर लक्ष्मी का स्वागत करते हैं, लेकिन देश में ऐसे भी अनेक घर हैं जहां एक समय भी लोग ठीक से खाना नहीं खा पाते, कोई बीमारी के कारण गरीब है, तो कोई गरीबी के कारण गरीब है, उस घर में कोई एक मोमबत्ती का उजाला करने के नाम पर एक मोमबत्ती देते हुए लाखों बार सोचता है, पर बात जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर हो रहे प्रोटेस्ट की हो तो लोग मोमबत्तियों पर मोमबत्त्यिां लिये चल देते हैं. लोगों को प्रोजेस्ट करना, जुलुस निकालना, बलात्कारी को फांसी की सजा देने की मांग करना ज़रूरी सा लगता है, पर वहीं लोग अपने अंदर के इंसान को मार देते हैं. और उन्हीं में से अनेक रेपिस्ट तैयार होते है.</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे नहीं लगता दामिनी के मरने के बाद भी देश में रेप के अपराध पर कुछ काबू भी पाया गया हो अलबत्ते रेपिस्टों को एक सैक्स के नाम नया रॉड स्टाईन भी पता लग गया. होली के रंगों के साथ-साथ लोग मादक पदार्थों के नशे में चूर लोग त्यौहार के नाम पर कोई ऐसी जगह नहीं छोड़ते, जहां महिलाओं के साथ बदसलूकी न हो. लोग त्यौहार तो बड़ी धूमधाम से मनाते हैं, पर उस त्यौहार के पीछे की कहानी, उसको मनाने का औचित्य, लोगों की अवधारणा तक को भूल जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">अजीब है मेरा देश, मेरे घर होली के रंग, दीपावली की रोशनी, मिठाईयां ही मिठाईयां, तो दूध में ठंडाई का स्वाद और दूसरी ओर मेरा पड़ोस का मकान जो टूटा है, जिनके घर कमाने वाला एक इंसान, बेटी की शादी की जिम्मेवारी, पढ़े लिखे बेटे को नौकरी की समस्या, बहु की डिलीवरी की चिंता, छोटे बेटे की नशे की लत, बड़ी बेटी के पति ने दहेज के लिए उसे अपने घर से निकाल दिया उसका हर रोज सामाजिक दबाव, इतनी परेशानी के साथ जी रहे लोगों के लिए आप ही बताइए क्या होली क्या दिपावली?</p>
<p style="text-align: justify;">और मैं, जब से होश संभाला मां-पिताजी को हालात से जुझते पाया, हम तीन भाई बहनों के अच्छे भविष्य के लिए माता-पिता ने कठोर परिश्रम किया. जब भैया घर की जिम्मेवारियां संभालने लायक हुए तो अचानक एक्सीडेंट से रीढ की हड्डी टूट गई, एक मिनट न बैठने वाला मेरा भाई इतने सालों से बिस्तर पर लेटा पल-पल मर रहा है, तो कुदरत का क़हर, दो साल पहले बारिश के कारण एकाएक हमारा घर ढह गया, उसे ठीक करवाने के पैसे नहीं थे क्योंकि उसी दौरान मेरे पिताजी ब्रेनफिवर के कारण हॉस्पिटल में कोमा में पड़े थे, ठीक होने के बाद भी आए दिन बुढ़ापा उनकी आयु से कुछ साल पहले ही आ गया.</p>
<p style="text-align: justify;">कोई रात ऐसी नहीं जब दिल में छुपाए दर्द को ले हर रात मेरी मां सोते हुए आंखों में नींद से पहले भैया, परिवार और शायद मेरी चिंता और आंसूओं के साथ न सोए, तो आप ही बताईए मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए किसी होली दिपावली का क्या मलतब. ये त्यौहार तो खुशियों के लिए मनाया जाता है, पर मेरे चौखट पर न जाने कब वो खुशियां आई और कब चलीं गईं कुछ पता ही नहीं लगा.</p>
<p style="text-align: justify;">पर फिर भी साल में एक दिन त्यौहार के नाम करना, मुझे नहीं लगता वो असली त्यौहार होगा, अगर आप वास्तव में त्यौहार में मनाना चाहते हैं, तो हर दिन को पवित्र और विचारधारा को शुद्ध करीए. ईश्वर उपवास करने वाले से खुश होने की बजाय नेक काम करने वाले खुश होते हैं. सिर्फ गंगा में डुबकी लगाने भर से ही पवित्रता नहीं होती, पवित्र होने के लिए मन के पाप को समाप्त करना पड़ता है.</p>
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		<title>पिया बिन नाही आवत चैन&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2013 07:10:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Bindu Chawla for BeyondHeadlines खयाल के साथ-साथ ध्रुपद-धमार, ठुमरी-दादरा सब गाने वाले चौमुखी गायक कहलाते थे. होरी पर होरी-धम्मार और होरी काफी की धूम रहती है. शास्त्रीय संगीत वाले रंगों की फुहार को मन में श्रृंगार, करुणा और भक्ति के रस-रंग का छलकना ही समझते हैं. सइयां हो या साईं होरी के एक-एक बोल योग-वियोग ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Bindu Chawla for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b style="font-size: 13px;"><i>खयाल के साथ-साथ ध्रुपद-धमार</i></b><b style="font-size: 13px;"><i>, ठुमरी-दादरा सब गाने वाले चौमुखी गायक कहलाते थे. होरी पर होरी-धम्मार और होरी काफी की धूम रहती है. शास्त्रीय संगीत वाले रंगों की फुहार को मन में श्रृंगार, करुणा और भक्ति के रस-रंग का छलकना ही समझते हैं. सइयां हो या साईं होरी के एक-एक बोल योग-वियोग की कहानी ही कहते हैं.  शास्त्रीय संगीत गाने वालों में ‘चौमुखी गायक वे कहलाते थे जो सब कुछ गा सकते थे-उन्हें खयाल के साथ-साथ ध्रुपद-धमार भी आता और ठुमरी दादरा के साथ-साथ वे होरी ठुमरी, होरी काफी भी गाते. आप फरमाइश करके तो देखिए! यह अलग बात है कि उनका गाना किसी एक शैली में ज्यादा प्रस्तुत किया जाता था. होली और शास्त्रीय संगीत के संबंधो को बयां करता </i></b><b style="font-size: 13px;">बिन्दु चावला<i> का यह आलेख-</i></b></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/commentexpress.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15520" alt="Photo Courtesy: commentexpress.com" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/commentexpress.com_-400x258.jpg" width="400" height="258" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">इन दिनों उत्तर भारत में, खास तौर पर ब्रजभूमि में जगह-जगह होरी काफी, होरी धम्मार गाए जाने की प्रथा है. होरी धम्मार यानी वह धम्मार जिसके बोल होरी के बारे में होते हैं ओर होरी काफी, जो एक ही राग-राग काफी में गाए जाने वाली ठुमरी है, जिसके बोल होरी के बारे में होते हैं. शास्त्रीय संगीत वाले रंगों की फुहार को मन में श्रृंगार, करुणा और भक्ति के रस-रंग का छलकना ही समझते हैं-सइयां हों या साईं एक-एक ठुमरी होरी, एक-एक ठुमरी धम्मार के बोल योग और वियोग की कहानी ही कहते हैं-‘आग लगे ऐसों फाग/ सखी मोहे भाग ही फूटे/ फागुन में पिया घर तो आए/ प्रीति पुरानी कहां धरि आए/ हम सजन की तजि/ हमरों रंग फाग ही झूठे’ फागुन का रंग तब चढ़ता है जब सइयां घर आए. और आवे तो प्रीति जतावे. इसी बात को सूफियाने अंदाज में देखा जाए तो प्रभु भक्ति भी तभी सवाई होती है जब प्रभु का आशीर्वाद किसी न किसी अनदेखे साक्षात्कार में मिल जाए या प्रकट हो जाए. कृष्ण मंदिरों में होरी धम्मार गाने वाले यही उद्गार अपने मन में रखते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">प्राचीन ध्रुपद-धम्मार से कुछ कम नहीं हमारे कव्वाल जो होली के उपलक्ष्य में अमीर खुसरो के ज़माने से इन रंगों के दिनों को सजदा करते आ रहे हैं: आज रंग है रंग है, रे मां. आज रंग है रंग है. सजन मिलाने मां, कन्त मिलाने मां, आज रंग है, रंग है. होरी-ठुमरियों में भी कितने ‘रंग-गुलाल’ पर मिलते हैं. वही गुलाल जो सुहाग का रंग भी है और भक्ति का भी. माथे पर उसी जगह लगाया जाता है जहां तीसरा नेत्र खुलता है- ‘लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गई लाल.</p>
<p style="text-align: justify;">चौमुखी गायक अलग-अलग तालीम नहीं लेते थे. खयाल, ध्रुपद, ठुमरी, होरी-अलग-अलग तो ये सब हुए. खयाल वाले कहते, ‘ठुमरी भी कोई अलग से सीखने की शैली है’ सरोदवादक बाबा अलाउद्दीन खां साहिब से एक बार एक शिष्य ने राग झिंझोटी सिखाने की गुस्ताखी कर दी तो बाबा भड़क उठे-इसे भी मुङो सिखाना होगा? यानी ध्यान लगाने की बात है-क्या मन के संस्कार उसे खोज कर बना न लेंगे!</p>
<p style="text-align: justify;">और यहीं से बनी वह जिसे खयाल वालों की ठुमरी कहा जाने लगा. जो ‘पक्के रागज् गाने वालों के पास ही मिलती और कहीं नहीं. उस्ताद अब्दुल करीम खां साहिब का ‘पिया बिन नाही आवत चैन’ किसी को भूल सकता नहीं! उस्ताद बरकत अली खां-उस्ताद बड़े गुलाम अली खां के छोटे भाई, और गुलाम अली, पाकिस्तान के गुरु-पूरी रागदारी से पटियाला गायकी गाते, लेकिन उनकी ठुमरी ही सुनी गई और मशहूर हुई. बड़े गुलाम अली खां साहिब-उनकी ठुमरी खयाल जसी आदरणीय थी और उनका खयाल ठुमरी की तरह मन को छू लेता था. गायकों को मालूम सब होता, लेकिन कुछ उसमें से, प्रस्तुतिकरण के लिए रखा जाता.</p>
<p style="text-align: justify;">इंदौर घराने के मशहूर उस्ताद अमीर खां साहिब एक बार घर पर रियाज में थे, जब उनकी तीसरी पत्नी रईसा बेगम, अपनी मां के घर-घराने के बारे में कुछ ज्यादा ही तारीफ कर बैठीं, तो खां साहिब बोले, ‘जरा लाना यह तबला इधर’ और ऐसा उस रोज उन्होंने तबला बजाया की बेगम धक रह गई. क्या लग्गी और क्या खेले! और कहते हैं कि खां साहिब ने कई सालों के बाद तबला उस रोज छुआ था.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी तरह इंदौर घराने के पंडित अमरनाथजी जो काफिया गाते, पंजाब की गीत-शैली, जो संतों के बोलों पर आधारित होती है-ऐसी ठुमरी गाते, किसी को मालूम नहीं था। राग काफी में उनकी एक ठुमरी है, जिसमें बोल उन्हीं के हैं:</p>
<p style="text-align: justify;">लागी रे न्यारी लगन मितवा सों हमारी</p>
<p style="text-align: justify;">अनहद बानी प्रीत जतावे,</p>
<p style="text-align: justify;">जिया जानत सगरी</p>
<p style="text-align: justify;">औरन की प्रीत मुख देखन की,</p>
<p style="text-align: justify;">हमरी तो प्रीत नाम सिमरन की</p>
<p style="text-align: justify;">रटत करट सगरी.</p>
<p style="text-align: justify;">मेरी लगन एक अनकही बानी है जिसके नाम को रटने से तर जाते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">यह एक मौन का जाप है. वही प्रीत का जाप भी है.</p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>पापा गुस्सा, मैं हुड़दंगी…</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2013 06:36:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Vinit Utpal for BeyondHeadlines होली की अधिकतर मेरी यादें या तो बिहार के मधेपुरा जिले में स्थित अपने गांव आनंदपुरा से जुड़ी हैं या फिर मुंगेर शहर के उस छोटे से शहर तारापुर से, जहां पापा पदस्थापित थे. पापा के कॉलेज में होली के मौके पर 8-10 दिनों की छुट्टी होती थी और हम लोग ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Vinit Utpal for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">होली की अधिकतर मेरी यादें या तो बिहार के मधेपुरा जिले में स्थित अपने गांव आनंदपुरा से जुड़ी हैं या फिर मुंगेर शहर के उस छोटे से शहर तारापुर से, जहां पापा पदस्थापित थे. पापा के कॉलेज में होली के मौके पर 8-10 दिनों की छुट्टी होती थी और हम लोग भरपूर मजा लेते थे. एक ओर पापा को होली के हुड़दंग से सख्त नफरत थी, वहीं मुझे हुड़दंग करने में मजा आता था. इस कारण सुबह होते ही पापा अपना मूड खराब कर लेते और शाम तक उनका मूड वैसा ही रहता. लेकिन जब शाम तक हुड़दंगियों की फौज अपने-अपने घर को चली जाती तब उनका मूड अच्छा हो जाता. लेकिन होली जैसा मौका हो तो फिर मैं कहां चूकने वाला. उनके मूड ऑफ रहने के बावजूद घर के पिछवाड़े से किसी ने किसी बहाने हुड़दंगियों के बीच चला ही जाता.</p>
<p style="text-align: justify;"> <a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/theatlantic.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15527" alt="Photo Courtesy: theatlantic.com" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/theatlantic.com_-400x271.jpg" width="400" height="271" /></a></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><b>पैरों पर गुलाल</b><b>, माथे पर टीका</b></span></p>
<p style="text-align: justify;">जब हमलोग तारापुर में होते तो वहां मनोज भैया, सुभाष भैया, प्रभाष भैया, मानव भैया, बाबू साहेब, संतोष, मोनी, राजेश, रत्नेश, केशव, मुन्ना, टुन्ना, बबलू, बुच्चन आदि लोगों के साथ जमकर होली मनाता था. हम सभी लोगों की टोली पूरे तारापुर का चक्कर लगाती. हम लोगों के घर के सामने काफी जगह थी और सुबह होते ही सभी युवाओं की टोली जमा हो जाती. फिर सभी मिलकर उल्टा नाथ महादेव मंदिर, उर्दू बाजार, पुरानी बाजार, थाना, मोहनगंज, हटिया, बस स्टैंड होते हुए यानी पूरे तारापुर का चक्कर लगाते हुए घर पहुंचते. शाम होते ही सभी तैयार होकर सभी के घर जाते. बड़ों के पैरों पर गुलाल डालते और छोटों के माथे पर टीका. जिसके यहां जाता, कुछ न कुछ खाने के लिए ज़रूर मिलता.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><b>दही-बड़े और अनरसा</b></span><b></b></p>
<p style="text-align: justify;">मुझे बचपन से दही-बड़े (दही-भल्ले) अच्छे लगते. होली की शाम मैं जब भी किसी के यहां जाता तो वहां दहे-बड़े जरूर खाता. और तो और मां और सभी बहनें तो अलग-अलग तरह के पकवान के साथ खाना बनाने में जुटे रहते जिसकी तैयारी 2-3 दिन पहले से ही शुरू हो जाती. मिथिला में &#8216;अनरसा’ नामक पकवान होली के मौके पर बनाया जाता था. हमारे यहां भी मां बनाती थी. संयोगवश तारापुर कॉलेज के किसी भी प्रोफेसर या स्टॉफ के यहां यह नहीं बनता था और शाम में पापा के कॉलेज के सभी स्टाफ मेरे यहां आते. घर से बाहर काफी जगह थी और फिर वहीं 40-50 लोगों की बैठक हो जाती और सभी लोग उस &#8216;अनरसा&#8221; का स्वाद लेते. तारापुर छोड़े हुए 16 साल हो गए हैं लेकिन हर होली वहां की याद आती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><b>जब घोंटा था भांग</b></span><b></b></p>
<p style="text-align: justify;">होली के मौके पर ही मैंने पहली बार भांग पीया था. उस वक्त करीब 7-8 साल का रहा होउंगा. गांव में था. गांव के एक चाचा बमजी और हम उम्र कल्याणजी ने कहा कि ज़रा पीकर देखो कितना अच्छा लगता है. उन्होंने वादा किया कि वह मेरे भांग पीने की बात किसी को नहीं बताएंगे. मैंने एक-दो घूंट लिया लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा. रात में मां ने भोजन करने के लिए बुलाया तो मेरा पैर लड़खड़ा रहा था. हालांकि मैंने खुद पर कंट्रोल किया और किसी को मालूम भी न हुआ लेकिन उस चाचा ने मुझे दगा दे दिया और दो-चार दिनों बाद मां को उन्होंने बता दिया.</p>
<p style="text-align: justify;">होली के बाद मेरी चचेरी बहन की शादी थी और मां को जैसी ही पता चला मां ने मुझे बुला भेजा. उस वक्त मैं भोज खा रहा था. उन्होंने जैसे ही मुझे बुलाया और सवाल किया तो मुझे सांप सूंघ गया. मां ने मेरी पिटाई तो नहीं की लेकिन पांच बार उठक-बैठक लगाने को कहा और हिदायत दी कि कभी भांग को मुंह लगाया तो तुम्हारी खैर नहीं.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>खेलत फाग बढ़त अनुराग</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2013 04:25:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<category><![CDATA[बियॉंडहेडलाइन्स हिन्दी]]></category>
		<category><![CDATA[Holi]]></category>
		<category><![CDATA[kathak and holi]]></category>
		<category><![CDATA[कथक और होली]]></category>

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		<description><![CDATA[Dr. Abhinaw Upadhyay for BeyondHeadlines कथक और होली का गहरा संबंध है. होरी पर ज्ञात-अज्ञात कवियों के अति सुंदर पद हैं. कथक में उन पर भावाभिनय का चलन पुराना है. ब्रज और कृष्ण भी होली से और कथक से इस तरह घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं. होली पर बहुत लिखा गया है. वैसे भी ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Dr. Abhinaw Upadhyay for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>कथक और होली का गहरा संबंध है</i></b><b><i>. होरी पर ज्ञात-अज्ञात कवियों के अति सुंदर पद हैं. कथक में उन पर भावाभिनय का चलन पुराना है. ब्रज और कृष्ण भी होली से और कथक से इस तरह घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं. होली पर बहुत लिखा गया है. वैसे भी होली प्रेम का त्योहार है. त्योहार तो सभी प्रेम का संदेश देते हैं पर होली पर प्रेम ज्यादा उमड़ता है. होली और कथक पर प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना उमा शर्मा से जब मैने इस संबंध में बातचीत की तो कई बातें आई जिससे यह पता चला कि आज का युवा बहुत सी चीजों से अनभिज्ञ है&#8230; </i></b></p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/instartupland.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15516" alt="Photo Courtesy: instartupland.com" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/instartupland.com_-400x291.jpg" width="400" height="291" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">कथक और होली का गहरा संबंध है. कथक में होरी, ठुमरी का भाव होता है. ठुमरी गायिकी में बहुत चलती है. होरी में बहुत ठुमरियां हैं. कथक में होली की गजल भी बन सकती है, क्योंकि कथक में हिन्दू-मुस्लिम दोनों की प्रथा है. कथक में ध्रुपद गायिकी के साथ भी नृत्य होता है. ध्रुपद धमार होरी पर चलता है. होरी के ऐसे पद हैं जो कथक से मिलाए जा सकते हैं जसे, ‘मैं तो खेलूंगी उनही से होरी गुइयां, लेइके अबीर गुलाल कुमकुम वो तो रंग से भरी पिचकारी गुंइयां.’</p>
<p style="text-align: justify;">रसखान ने लिखा है कि ‘खेलत फाग बढ़त अनुराग, सुहाग सनी सुख की रमकै. कर कुमकुम लैकर कंजमुखी, प्रिय के दृग लावन को झमकै.’  ऐसे बहुत सुंदर पद कवियों ने लिखे हैं जो हमलोग करते हैं. कथक का यह चलन है जो काफी पुराना है. हालांकि अब ये चीजें बाहर जा रही हैं. कथक में गाकर भाव बताना एक कला है. मैंने अपने गुरु शंभू महाराजजी से यह कला सीखी है इसलिए अभी तक मैं इसे चला रही हूं. कविताओं में होरी का सारा माहौल उभरकर आता है. ये कथक में होता आ रहा है.</p>
<p style="text-align: justify;">कथक में होरी कई तरह से प्रस्तुत होती है. एक तो गाकर भाव बताया जाता है. एक समूह में होली होती है. कविता पर भी होली खेली जाती है. वृंदावन की रासलीला में राधा कृष्ण गोपियां सभी फूल की भी होली खेलती हैं. गुलाल से भी होली होती है. पिचकारी से रंग डालना ये सब कथक नृत्य में भाव भंगिमा से दर्शाया जाता है. यह समूह और एकल दोनों माध्यम से होता है. मैं तो भाव बताकर होली प्रस्तुत करती हूं और यह एक परंपरागत तरीका है. मैं कविताओं को लेकर प्रस्तुति करती हूं.</p>
<p style="text-align: justify;">अज्ञात कवियों ने बहुत से पद लिखे हैं. रसखान, विद्यापति, नजीर अकबराबादी, खुसरो आदि ने होरी के बहुत सुंदर पद लिखे हैं. एक अज्ञात कवि ने लिखा है ‘बा संग फाग खेले ब्रज माही’, यह एक विहरिणी नायिका है. इसके अलावा एक कवि ने यह भाव लिखा है कि पीछे आई गोपी और उसने एकदम पीछे से कृष्ण को अचानक अबीर लगाया. ऐसी बहुत सी लोकप्रिय रचनाएं हैं. अज्ञात कवि ने इतने सुंदर ढंग से श्रृंगार का वर्णन किया है होरी के माध्यम से, इसी तरह एक कविता में राधा की ईष्र्या है, इस तरह पदों में विविधता है. होरी और कथक दोनों उत्तर भारतीय हैं. वृंदावन से होरी का गहरा संबंध है. कृष्ण तो होली खेलने में प्रसिद्ध है. सबसे अधिक कृष्ण की होली, वृंदावन से कृष्ण का नटवरी नृत्य कृष्ण की छेड़छाड़ को कथक में अधिकांश रूप से लिया जाता है. उत्तर भारतीय कवियों ने होली पर बहुत लिखा है और कथक में इसका प्रयोग हो रहा है. यदि साहित्य को टटोला जाए तो ऐसे बहुत से पद हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">नृत्य से अलग भी होली का अपना महत्व है. एक दूसरे से मिलें तिलक लगाएं. पहले टेसू के फूल से रंग निकाल कर चंदन और केसर का तिलक लगाया जाता था. गुलाल भी बहुत अच्छा होता था. उसमें कुछ मिला नहीं होता था. सब एक-दूसरे के ऊपर रंग लगाते थे. लेकिन बीच में रसायनयुक्त रंगों के प्रयोग होने से रंगों से लोग बचने लगे. गाना बजाना, होरी ठुमरी, भाव के साथ होली मनाने का अपना आनंद है. मैं अपने संस्थान में इसी परंपरा के साथ हर साल इसका जश्न करती हूं.</p>
<p style="text-align: justify;">होली का अपना महत्व है, यह प्रेम भाव बताता है. हमारे सभी त्योहार प्रेमभाव बताते हैं. प्रेम के भाव के साथ यदि आप किसी के साथ होली खेलते हैं तो उससे एक प्रेम उमड़ता है और वास्तव में यह प्रेम की होली है. एक-दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली, गाना-बजाना यह सब प्रेम की बातें हैं. इससे आपस में प्रेम बांट सकते हैं. यही सब होली दर्शाती है. होली यह बताती है कि आपमें कोई मतभेद या भेदभाव नहीं है.</p>
<p style="text-align: justify;"><b></b><em><b>(प्रसिद्ध नृत्यांगना उमा शर्मा से डॉ. अभिनव उपाध्याय की बातचीत पर आधारित)</b></em></p>
<p style="text-align: justify;">
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		<title>देख बहारें होली की&#8230;</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2013 04:14:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नज़ीर अकबराबादी जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की। और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की। परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की। खम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की। महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की। गुलजार खिलें ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><b><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/boston.com_.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15523" alt="Photo Courtesy: boston.com" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/boston.com_-400x274.jpg" width="400" height="274" /></a>नज़ीर अकबराबादी</b><b></b></p>
<p>जब फागुन के रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।</p>
<p>और डफ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।</p>
<p>परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।<br />
खम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।</p>
<p>महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की।<br />
गुलजार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।</p>
<p>कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।<br />
मुंह लाल, गुलाबी आंखें हों और हाथों में पिचकारी हो।</p>
<p>उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।<br />
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।</p>
<p><em id="__mceDel"> </em></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>होली की के रंग, मस्ती, दोस्तों का हुड़दंग सबकुछ जैसे किसी ख़्वाब सा बनकर रह गया है</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Mar 2013 20:23:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Mahboob Khan for BeyondHeadlines पुश्तैनी गाँव में जब होश संभाला तो गाँव के एक कोने में कुछ अलग रंग नज़र आते थे, चाहे वह दीवाली हो या होली. उन रंगों में शामिल होने की बहुत तलब होती थी लेकिन उस कोने में सबको जाने की इजाज़त नहीं थी, ख़ासतौर से बच्चों को तो क़तई नहीं. ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Mahboob Khan for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">पुश्तैनी गाँव में जब होश संभाला तो गाँव के एक कोने में कुछ अलग रंग नज़र आते थे, चाहे वह दीवाली हो या होली. उन रंगों में शामिल होने की बहुत तलब होती थी लेकिन उस कोने में सबको जाने की इजाज़त नहीं थी, ख़ासतौर से बच्चों को तो क़तई नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">बात ये है कि उस कोने में समाज के तथाकथित निचले तबके के लोग रहते थे और वहाँ समाज के उच्च तबके के लोग जाना पसंद नहीं करते थे. लेकिन इस पाबंदी की वजह से शायद मेरी वह तलब और मज़बूत होती गई और मैंने हिम्मत करके बड़ों से जानना चाहा कि साल में एक बार ये लोग इतना धमा चौकड़ी क्यों जमाते हैं, इतने रंग बिखेरते हैं कि सूरतें ही पहचान में नहीं आती.</p>
<p style="text-align: justify;">क्या मैं इस रंग और मस्ती में शामिल नहीं हो सकता? मेरे इस सवाल एक बड़ा बवाल खड़ा कर दिया.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/memories-of-holi.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15510" alt="memories of holi" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/memories-of-holi-400x248.jpg" width="400" height="248" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">यह तमन्ना अधूरी ही रही, शहर में कॉलेज में दाखिला लेने के समय तक. और अमरोहा में जब कॉलेज में दाखिला लिया तो जैसे सबसे पहले इसी अधूरी तमन्ना को पूरा करना था. एक मुश्किल ये थी कि कॉलेज होली से कई दिन पहले ही बंद होने का ऐलान हुआ तो कुछ मायूसी हुई कि असली रंग और मस्ती तो कॉलेज में ही होती.</p>
<p style="text-align: justify;">होली का दिन जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था दिल की धड़कनें तेज़ होती जा रही थीं, मैं दिखाना चाहता था कि होली में मेरी कुछ ख़ास दिलचस्पी नहीं है लेकिन अंदर से बेताबी बढ़ रही थी.</p>
<p style="text-align: justify;">मम्मी से कहा भी कि अगर दोस्त बुलाने आएं तो कह दीजिएगा कि मैं घर पर नहीं हूँ, लेकिन यह भी डर बैठा कि सचमुच अगर दोस्त मुझे बिना लिए ही लौटकर चले गए तो सारा मज़ा ही ख़राब हो जाएगा. और जब रंगों से भूत बने दोस्तों ने जब दरवाज़े पर दस्तक दी तो इससे पहले कि मम्मी कुछ कह पातीं, मैंने आव देखा न ताव, जाकर मसख़रों की टोली में शामिल हो गया. फिर तो बस, जो हुड़दंग हमने मचाया उसे शब्दों में कहाँ बयान किया जा सकता है. हाँ, एक घटना आज भी नहीं भूलती.</p>
<p style="text-align: justify;">अमरोहा के मशहूर और पुराने बसावन गंज इलाक़े में जब हमारी टोली पहुँची तो छतों पर लड़कियों की टोली रंगों से भरे गुब्बारे लिए हमारा इंतज़ार कर रही थी. उन्होंने ताबड़तोड़ गुब्बारों की बौछार हम पर कर दी लेकिन हममे से कुछ ने वे गुब्बारे क्रिकेट की गेंद की तरह कैच कर लिए और निशाना साधा.</p>
<p style="text-align: justify;">अब उन लड़कियों की हालत देखने लायक थी. बहरहाल रंगों में इतने पुत चुके थे कि किसी को यह पता ही नहीं था कि आख़िर कौन कौन है? बस आवाज़ से पहचान हो पाती थी. और मज़ा तो तब आया जब दिन भर की मस्ती और कई दोस्तों के घर पर ख़ूब सारी गुंजिया खाने के बाद जब घर लौटा तो मम्मी ने छत पर से ही कह दिया- बेटा, महबूब तो घर पर नहीं है, वह तो दोस्तों के साथ होली खेलने गया है&#8221;.</p>
<p style="text-align: justify;">अब जब से रोज़गार के सिलसिले में अमरोहा छूटा है, होली के रंग भी छूट गए हैं. जहाँ-जहाँ भी काम किया वहाँ होली और दीवाली के मौक़े पर ख़ासतौर से मुझ पर ही ज़्यादा नज़र रहती थी. और पत्रकारिता, रेडियो और टेलिविज़न की दुनिया में तो काम 24 घंटे चलता ही है. इसलिए जब सारे लोग होली मनाते हैं तो महबूब ख़ान मन मसोसकर काम कर रहा होता है. लेकिन जब से लंदन आया हूँ, यह भी पूछना पड़ता है कि होली कब है. मैं ही नहीं, कई दोस्तों से पूछा तो उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए, चलो, किसी से पूछते हैं कि होली कब है.</p>
<p style="text-align: justify;">अमरोहा की गलियों के साथ-साथ होली की के रंग, मस्ती, दोस्तों का हुड़दंग सबकुछ जैसे किसी ख़्वाब सा बनकर रह गया है लेकिन इस ख़्वाब को बार-बार देखने की कोशिश करता हूँ. आँख बंद करके उस सबको याद करता हूँ तो अनोखी ताज़गी मिलती है. एक ऐसी ताज़गी जो एक अनमोल धरोहर बन चुकी है.</p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखक बीबीसी से जुड़े हुए हैं.)</i></b></p>
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		<title>होली में होशियार&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Mar 2013 06:58:39 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[Shakeel Shamsi for BeyondHeadlines आज रात होली जलाई जाएगी और कल के दिन सारे मुल्क में होली का रंगारंग त्योहार मनाया जाएगा, जिसको रंग-पंचमी भी कहते हैं. खास तौर पर यह त्योहार उत्तरी भारत के लोगों काफी लोकप्रिय है. मुल्क के दूसरे हिस्सों में इस दिन वो जोश-खरोश नहीं दिखाई पड़ता जैसा कि बिहार, उत्तर ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><b>Shakeel Shamsi for BeyondHeadlines</b></p>
<p style="text-align: justify;">आज रात होली जलाई जाएगी और कल के दिन सारे मुल्क में होली का रंगारंग त्योहार मनाया जाएगा, जिसको रंग-पंचमी भी कहते हैं. खास तौर पर यह त्योहार उत्तरी भारत के लोगों काफी लोकप्रिय है. मुल्क के दूसरे हिस्सों में इस दिन वो जोश-खरोश नहीं दिखाई पड़ता जैसा कि बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली और हरियाणा के शहरों व कस्बों में दिखाई पड़ता है. इस दिन को ज़ालिम पर मज़लूम की फ़तह (जीत) की यादगार के बतौर मनाया जाता है. हमारे मुल्क पुरानी कथाओं के मुताबिक एक ज़माने में हिरण्य कश्यप नाम का एक बहुत ही ज़ालिम और ताक़तवर बादशाह हिन्दुस्तान पर हुकूमत करता था. वो अपने को भगवान कहने लगा था और अपनी जनता को अपने आगे सर झुकाने पर मजबूर करता था. उसने आम आदमी की ज़िन्दगी तबाह कर रखी थी.</p>
<p style="text-align: justify;">फिर उसी के घर में प्रहलाद नाम का एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ जो उसके भगवान होने के दावे को मानने से इंकार करता था. प्रहलाद के बारे में नजूमियों ने राजा को बताया कि यह बच्चा ही बड़ा होकर उसका क़त्ल करेगा और उसके ज़ुल्म व  सितम से मुल्क के लोगों को निजात दिलवाएगा.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/Holi-Festival-2.jpg"><img class="aligncenter size-large wp-image-15482" alt="Holi-Celebration" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2013/03/Holi-Festival-2-400x278.jpg" width="400" height="278" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">एक बेटे के ज़रिए बाप को भगवान तस्लीम न करने की बात और अपने कत्ल की बात सुनकर हिरण्य कश्यप ने प्रहलाद को मारने की साज़िशें रचना शुरू कर दिया, लेकिन हर बार उसकी रूहानी ताक़तें बचा लेती थी. आखिर में हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन (जिसका नाम होलिका था) से कहा कि वो प्रहलाद को आग में लेकर बैठ जाए. हिन्दू धर्म के धार्मिक किताबों में होलिका के आग में बैठने की वजह यह बताई जाती है कि होलिका के पास एक ऐसा दुपट्टा था जिसको ओढ़ लेने के बाद उस पर आग का कोई असर नहीं हो सकता था.</p>
<p style="text-align: justify;">हिरण्य कश्यप के कहने पर होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर एक बड़े से अलाव में बैठ गई, लेकिन (कथाओं के मुताबिक) जिन रूहानी ताक़तों का प्रहलाद भक्त था उन्होंने होलिका के दुपट्टा के दुपट्टे की ताक़त अपने अंदर जज्ब कर ली. उसकी वजह से होलिका इस आग में जलकर राख हो गई और प्रहलाद को आसमानी ताकतों ने बचा लिया. उस वक़्त से होलिका को बुराई की निशानी फागुन महीने की पुर्णिमा के पांचवे दिन होलिका दहन का रस्म अदा की जाती है और शैतानी ताक़तों की तरफदार होलिका के जल कर भस्म होने का जश्न मनाया जाता है. इसी दिन गर्मी के मौसम के आमद का ऐलान भी माना जाता है और लोग जाड़े के कपड़ों को संदुक में बंद कर देते हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">होलिका जलाए जाने के दूसरे दिन खुशी के इज़हार के तौर पर लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं और माथे पर गुलाल लगाकर मुबारकबाद देते हैं. वैसे तो यह खुशी बांटने व खुसी मनाने का त्योहार है लेकिन इस दिन की खुशियों में खटास भी शामिल करने की कोशिश करते हैं और होली खलेते वक़्त यह लोग उन लोगों पर भी रंग डाल देते हैं, जिनको रंग खेलने से परहेज़ होता था. वैसे जहां तक मेरी मालूमात है रंग खेलना मज़हब का पार्ट नहीं, सिर्फ एक संस्कृति का हिस्सा है, जिसकी शुरूआत कृष्ण जी के दौर में मथुरा में हुई थी.</p>
<p style="text-align: justify;">होली जैसे त्योहार पर हम सबको ऐसे तत्वों से होशियार रहना है जो त्योहार को फसादात में तब्दील करके रंग-पाशी की जगह खून-खराबा करवाते हैं. हम सबको चाहिए कि ऐसे तत्वों से दूर रहें जिनका मकसद ही समाज में फसाद फैलाना होता है. इसके अलावा सब्र व बर्दाश्त की ताक़त का मुज़ाहरा भी करें. अगर कोई हम पर गलती से रंग डाल दे तो मार-पीट या लड़ाई-झगड़े की सूरत पैदा न होने दें. जिस वक्त तक रंग खेला जा रहा हो, हम अपने घरों में ही रहें. अपने हिन्दू भाईयों को इस बात का भी अहसास दिलाएं कि हम भी इसके खुशी में शरीक हैं. एक सेक्यूलर मुल्क में ज़िन्दगी गुज़ारने का मज़ा तो इसी में है कि हर मज़हब के लोग अपने-अपने अक़ीदे पर क़ायम रहते हुए एक दूसरे की खुशियों में शरीक हों.</p>
<p style="text-align: justify;"><b><i>(लेखक उर्दू के इंकलाब अखबार, उत्तरी भारत के संपादक हैं और यह लेख उन्होंने उर्दू में लिखा था जिसे </i></b><b><i>BeyondHeadlines </i></b><b><i>के पाठकों के लिए अनुवाद किया गया है.)              </i></b></p>
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		<title>The colour of Holi</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Mar 2011 10:57:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[Holika was a demoness in Hindu mythology, who was burnt to death with help of Brahma by Prahlad. On the night before Holi, symbolic pyre of Holika is burnt signifying the triumph of good over evil, and death of Holika is celebrated as Holi. (Photgraphs of celebration in Pune by Pushkar Achyute)]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/a/' title='a'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/a-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="Pyre of Holika in Pune (Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr145-2/' title='qr145'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1451-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr147-2/' title='qr147'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1471-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr148-2/' title='qr148'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1481-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr149-2/' title='qr149'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1491-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr150-2/' title='qr150'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1501-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr151-2/' title='qr151'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1511-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr152-2/' title='qr152'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1521-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr153-2/' title='qr153'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr1531-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr154/' title='qr154'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr154-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>
<a href='http://beyondheadlines.in/2011/03/the-colour-of-holi/qr155/' title='qr155'><img width="150" height="150" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/qr155-150x150.jpg" class="attachment-thumbnail" alt="(Photo: Pushkar Achyute)" /></a>

<p></strong></p>
<p><strong> </strong></p>
<p><strong>Holika</strong> was a demoness in Hindu mythology, who was burnt to death with help of Brahma by Prahlad. On the night before Holi, symbolic pyre of Holika is burnt signifying the triumph of good over evil, and death of Holika is celebrated as Holi. (Photgraphs of celebration in Pune by Pushkar Achyute)</p>
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		<title>Colours of Holi And Poor Rickshaw Pullers</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Mar 2011 19:13:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
				<category><![CDATA[Holi Special]]></category>
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		<description><![CDATA[Afroz Alam Sahil  BeyondHeadlines Diverse colour! That’s what defines India- diversity in culture, religion, ethnicity, languages, politics, etc. Every day of the year is the celebration of this very diversity. Holi, the festival of colours, celebrate that very idea. However, colours smeared are not always happy ones. Terrorists, often from across the border, but also ...]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><strong>Afroz Alam Sahil  BeyondHeadlines</strong></p>
<p style="text-align: justify;">Diverse colour! That’s what defines India- diversity in culture, religion, ethnicity, languages, politics, etc. Every day of the year is the celebration of this very diversity. Holi, the festival of colours, celebrate that very idea.</p>
<p style="text-align: justify;">However, colours smeared are not always happy ones. Terrorists, often from across the border, but also indigenous; spill blood of innocent citizens. We do not even hesitate to kill our loved ones for sake of ‘honour’ or in bout of anger. Seldom, a day pass without news of some women killed for dowry, girl raped and brutally murdered or dead body found in suit cases.</p>
<p style="text-align: justify;"><a href="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/happy-holi-wallpaper.jpg"><img class="aligncenter size-medium wp-image-1329" title="happy-holi-wallpaper" src="http://beyondheadlines.in/wp-content/uploads/2011/03/happy-holi-wallpaper-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">Some play politics of colour – saffron, red, green. Some leaders do not even mind changing the colour of their ideology, if pays to do so (at least that’s what recent <em>WikiLeaks</em> reveal).</p>
<p style="text-align: justify;">Life of some super rich is colourful enough, while inflation does not allow many poor to have even grains of food.</p>
<p style="text-align: justify;">Drought has taken greenery out of villages and left many stomachs hungry. Meeting two squares meal a day has become difficult for many. Buying colour is unthinkable!</p>
<p style="text-align: justify;">Our rich leaders’ think little of poor and even less number of projects actually reach on the ground. The colour of the festival of Holi will go in few days, but the changing colour of society will remain&#8230;</p>
<p style="text-align: justify;">Bablu Singh, a poor rickshaw puller in South Delhi, says: “Holi or any festival has little meaning for poor people like us. Our urgent need is two squares meal a day. Festivals are for rich&#8230;”</p>
<p style="text-align: justify;">Amit, another such rickshaw puller from West Bengal’s Malda district, says with tears full in eyes: “in villages at least, we would enjoy with friends&#8230;I don’t even imagine having some ‘colour’ here.”</p>
<p style="text-align: justify;">Another such rickshaw puller, Kamlesh blames politicians for their dire state. “Leaders are busy earning for themselves. Who will remember poor like us?” he laments. He whines that leaders are seen only during elections. He is rather worried that on the day of Holi his earnings would be even less and would “have to hear the brunt of drunken rowdies.”</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #888888;"><em>(BeyondHeadlines wishes all its readers a very happy and colourful Holi. Enjoy the festival of colour, but take care of other&#8217;s sensibility. BH also welcomes its readrs to share their views on Holi.)</em></span></p>
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