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BeyondHeadlines > Edit/Op-Ed > बाटला हाउस : हक़ीक़त से कितनी दूर है ये फ़िल्म?
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बाटला हाउस : हक़ीक़त से कितनी दूर है ये फ़िल्म?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 13, 2019 28 Views
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7 Min Read
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Afroz Alam Sahil, BeyondHeadlines

बटला हाउस ‘हत्याकांड’ पर आधारित इसी नाम की फ़िल्म आगामी 15 अगस्त को रिलीज़ होगी. निर्देशक का दावा है कि फ़िल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित है. फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हो चुका है. अगर इसी ट्रेलर को फ़िल्म का रिप्रेज़ेन्टैटिव माना जाए तो मेरी नज़र में ये सच से बहुत दूर है. हालांकि पूरी फ़िल्म अभी रिलीज़ नहीं हुई है, तो बिना फ़िल्म देखे कोई प्रतिक्रिया देना वाजिब नहीं होगा…   

लेकिन मैं बता दूं कि जिस ‘हत्याकांड’ को बटला हाउस के लोग पूरी तरह से भूल चुके थे, इस फ़िल्म ने फिर से उनके पुराने ज़ख़्मों को कुरेद दिया है. फिर से उनके ज़ेहन में ‘काली यादें’ ताज़ा हो गई हैं. ऐसे में मुझे लगता है कि एक बार फिर से ये मांग उठनी चाहिए कि इस पूरे मामले की जांच हो. 

ग़ौरतलब रहे कि ये ‘हत्याकांड’ उस सरकार के शासन में हुआ था, जो उस वक़्त गुजरात में हुए तमाम ‘एनकाउंटरों’ को फ़र्ज़ी बताती रही है, सवाल उठाती रही है. उस वक़्त गुजरात में नरेन्द्र मोदी सीएम थे. 

ऐसे में केन्द्र की मोदी सरकार के पास एक अच्छा मौक़ा है कि बटला हाउस ‘हत्याकांड’ की जांच करवा दे ताकि कांग्रेस की काली करतूतों का पर्दाफ़ाश हो जाए. सोनिया गांधी के उस ‘घड़ियाली आंसू’ का भी पर्दाफ़ाश हो जाए कि उन्होंने वाक़ई आंसू बहाए थे या नहीं? अगर बहाए थे तो फिर उनकी सरकार जांच से भागती क्यों रही? 

मोदी जी आपके पास ‘सबका विश्वास’ जीतने का यही एक अच्छा मौक़ा है. आप बटला हाउस ‘हत्याकांड’ को जायज़ मानते हैं तो मानते रहिए. लेकिन कम से कम एम. सी. शर्मा की मौत की जांच ही करवा लीजिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए. ऐसा भी हो सकता है कि वह किसी षड्यंत्र का शिकार हुए हों. जब गुजरात में सोहराबुद्दीन और इशरत जहां केस फ़र्ज़ी हो सकता है, तो दिल्ली में बटला हाउस एनकाउंटर फ़र्ज़ी क्यों नहीं? क्या सिर्फ़ इसलिए कि गुजरात में उस समय भाजपा की सरकार है और दिल्ली में कांग्रेस की? और आप यह क्यों नहीं सोचते कि एक शहीद की शहादत पर लगने वाला दाग़ भी सदा के लिए धूल जाएगा. और पूरी दुनिया के मुसलमान उनकी शहादत को सलाम करेंगे.

आरटीआई द्वारा बटला हाउस ‘हत्याकांड’ से जुड़ी जानकारी निकालने में दो साल का समय लगा था. और सबसे गंभीर सवाल एम. सी. शर्मा की मौत पर है. जो व्यक्ति गोली लगने के बाद अपने पैरों पर चलकर चार मंज़िल इमारत से उतर कर नीचे आया और कहीं भी एक क़तरा खून भी न गिरा हो, और जो मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शाम पांच बजे तक बिल्कुल ख़तरे से बाहर हो तो उसकी शाम सात बजे अचानक मौत कैसे हो गई? 

अगर पोस्टमार्टम रिपोर्ट की बात करें तो उसके अनुसार इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को बाएं कंधे से 10 सेंटीमीटर नीचे के घाव के बाहरी भाग की सफ़ाई की गई. शर्मा को 19 सितंबर 2008 में L-18 में घायल होने के बाद निकटतम अस्पताल होली फैमली में भर्ती कराया गया था. उन्हें कंधे के अलावा पेट में भी गोली लगी थी.

रिपोर्ट के अनुसार पेट में गोली लगने से खून का ज्यादा स्राव हुआ और यही मौत का कारण बना. अब फिर यह सवाल उठता है कि जब शर्मा को 10 मिनट के अन्दर चिकित्सीय सहायता मिल गई थी और संवेदनशील जगह (Vital part) पर गोली न लगने के बावजूद भी उनकी मौत कैसे हो गई? कैसे उनके शरीर से 3 लीटर खून बह गया? 

सवाल यह भी है कि मोहन चंद शर्मा को गोली किस तरफ़ से लगी, आगे या पीछे से. क्योंकि आम जनता की तरफ़ से इस तरह की भी बातें आई थीं कि शर्मा पुलिस की गोली का शिकार हुए हैं. इस मामले में फारेंसिक एक्सपर्ट का जो बयान है वह क़ाबिले क़बूल नहीं है. और पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी इसे स्पष्ट करने में असमर्थ है, क्योंकि होली फैमली अस्पताल जहां उन्हें चिकित्सीय सहायता के लिए लाया गया था और बाद में वहीं उनकी मौत भी हुई, उनके घावों की सफ़ाई की गई थी. लिहाज़ा पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर अंतिम तौर पर यह नहीं बता सके कि यह घाव गोली लगने के कारण हुआ है या गोली निकलने की वजह से. 

दूसरी वजह यह है कि इंस्पेक्टर शर्मा को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (एम्स) में सफ़ेद सूती कपड़े में लिपटा हुआ ले जाया गया था. और उनके घाव पट्टी (Adhesive Lecoplast) से ढके हुए थे. रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जांच अधिकारी से निवेदन किया गया था कि वह शर्मा के कपड़े लैब में लाएं. लेकिन आज तक ऐसा हो न सका. उनकी मौत पर मेरे अनगिनत प्रश्न हैं जिनका उत्तर मुझे आज तक आरटीआई से भी नहीं मिल पाया है.

देश-वासियों! ज़रा सोचिए बटला हाउस ‘हत्याकांड’ की फ़ाइल बंद रहने से देश को बड़ा ख़तरा है या बटला का सच सामने आने से. बटला हाउस ‘हत्याकांड’ के फ़र्ज़ी साबित होने का मतलब यह है कि आतंकवाद के मूल सौदागर जीवित हैं और पुलिस की पहुंच से बाहर हैं और देश के ख़िलाफ़ और भी साज़िशें रची जा रही होंगी.

चलते चलते यह भी कहना चाहूंगा कि हमारे देश के वो मिल्ली और राजनीतिक नेता अब कहां ग़ायब हो गए हैं, जो इस मामले पर लगातार टोपी और शेरवानी की गर्द झाड़ते रहे हैं. वो राजनेता व तथाकथित ह्यूमन राईट्स एक्टिविस्ट कहां ग़ायब हैं, जिन्होंने इस पर भाषण देकर ख़ूब नाम कमाया…

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