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मोंटेक का टॉयलेट ख़बर, ‘लज्जो’ की बेबसी हेडलाईन क्यों नहीं?

अफ़रोज़ आलम साहिल

क्या आपको पता है कि देश की आर्थिक राजधानी यानी मुंबई जैसे शहर में सार्वजनिक शौचालयों में महिलाओं के लिये मुनासिब सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए मुहिम छेड़नी पड़ती है. दिल्ली के राजौरी गार्डेन बाजार में 600 दुकानें है, लेकिन एक भी महिला टॉयलेट नहीं है, योजना आयोग की नज़र में सबसे तेज़ी से विकास करने वाला राज्य बिहार में भी 77 प्रतिशत जनसंख्या के पास शौचालय की कमी है. यह हाल पूरे देश का है.

दरअसल, हमारे देश के लोगों को गंदे शौचालयों की इतनी आदत सी हो गई है कि वो महंगे टॉयलेट के बारे में अब सोचते भी नहीं. ऐसे में योजना आयोग 35 लाख रूपये टॉयलेट की मरम्मती और उसे आधुनिक बनाने के लिए खर्च करती है तो यक़ीक़न हम भारतीयों को ज़्यादा लगेगा ही. प्रतिदिन 28 रुपये खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब न मानने वाले योजना आयोग को टॉयलेट पर इतना पैसा खर्च करने के लिए आलोचना का सामना तो करना ही पड़ेगा.

जबकि ऐसा नहीं है कि टॉयलेट के नाम पर यह खर्चा या घोटाला कोई पहली बार हो रहा है. 3.5 करोड़ शौचालय इस देश में पिछले 2-3 सालों में गायब हो गए, लेकिन किसी ने कुछ नहीं बोला. इसके चोरी की एफआईआर भी थानों में दर्ज नहीं हुई. आखिर 8750 करोड़ रूपये के शौचालय घोटाला पर हम कैसे खामोश रह गए?

यह हमारे देश की सबसे बड़ी सच्चाई है कि भले ही हम हिन्दुस्तानियों ने चाँद तक अपने पैर जमा लिए हों, लेकिन आज भी हर दूसरे भारतीय के पास शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है. हर दिन क़रीब आधा भारत खुले में शौच जाता है. आंकड़े बताते हैं कि 1992 -93 में जहाँ एक ओर 70 प्रतिशत भारतीयों के पास शौच जाने की सुविधा नहीं थी, वहीं 2007-08 में 51 प्रतिशत ही ऐसे लोग रह गए हैं जिनके पास ये सुविधा उपलब्ध नहीं. लेकिन अब भी भारत में साफ़-सफ़ाई का स्तर ख़ासा ख़राब है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में क़रीब 36 करोड़ लोगों के पास ही साफ़ शौचालय की सुविधा है. आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण भारत में 66 प्रतिशत लोगों के पास शौचालय की सुविधा नहीं है जहाँ शहरों में ये आंकड़ा मात्र 19 प्रतिशत ही है.

थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हर दिन 60 लाख से ज़्यादा लोग मुंबई की लोकल ट्रेन से सफ़र करते हैं, लेकिन रेलवे स्टेशनों पर स्थित शौचालयों की स्थिति काफ़ी दयनीय है. मुंबई की लोकल रेलवे जैसे इस शहर की रफ़्तार की परिचायक है, लेकिन इन शौचालयों को देखकर लगता है कि यहां की रेलवे व्यवस्था में अव्यवस्था, गंदगी और उदासीनता का राज है. लाखों लोगों के लिए हैं सिर्फ़ 355 टॉयलट सीटें और सिर्फ 673 पेशाबघर हैं, जो कि नाकाफ़ी हैं. जो शौचालय हैं भी उनमें से कई गंदे हैं और कुछ बंद.

रिपोर्ट के मुताबिक़ लोकल ट्रेनों पर पड़ रहे बोझ को देखते हुए स्टेशनों पर कम से कम 12 हज़ार छह सौ टॉयलट सीटों की व्यवस्था होनी चाहिए, यानि कमी 12 हज़ार से ज़्यादा की है. ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली वर्षा राज कहती हैं, “वर्ष 2008-2009 में नए शौचालयों को बनाने का केंद्रीय रेलवे का वार्षिक बजट 14 लाख रुपए था, लेकिन एक ग़ैर-सरकारी संस्था के मुताबिक़ एक शौचालय बनाने में क़रीब 12 लाख रुपए का ख़र्च आता है. इसका मतलब साफ़ है कि हर साल सिर्फ़ एक शौचालय बनेगा और अधिकारी नए शौचालयों को बनाने को लेकर गंभीर नहीं हैं.”

खैर, बात घोटालों की चल रही है तो मैं आपको बताता चलूं कि झारखंड में हुए 321 करोड़ रुपये के शौचालय घोटाले की किसी सक्षम एजेंसी से जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है. प्रार्थी ने याचिका में आरोप लगाया है कि एपीएल और बीपीएल परिवारों के लिए लगभग चार लाख शौचालयों का निर्माण किया जाना था. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार ने 321 करोड़ रुपये आवंटित किए थे. यह काम उपायुक्तों ने एनजीओ, बीडीओ और सीडीपीओ के माध्यम से कराने का आदेश दिया था. इसके लिए संबंधित एजेंसी को अग्रिम राशि भी प्रदान की गई थी. यह मामला वर्ष 2002 से 2011 तक का है.

यही हाल उत्तर प्रदेश राज्य का भी है. उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग द्वारा ग्रामीण विकास मंत्रालय को बताया गया कि प्रदेश में 1.71 करोड शौचालयों का निर्माण करवाया गया है. लेकिन घरेलू जनगणना आंकड़ों में सामने आया कि प्रदेश में केवल 55 लाख ग्रामीणों के घर में ही शौचालय है. इससे साफ है कि उत्तर प्रदेश के 1.16 करोड़ ग्रामीणों के घर में शौचालय नहीं है. पूर्ण स्वच्छता अभियान की शुरूआत वर्ष 1999 में हुई थी, जिसके तहत वर्ष 2017 तक संपूर्ण भारत को गंदगी मुक्त बनाना है. उत्तर प्रदेश में इस योजना की शुरूआत वर्ष 2002 में हुई. इस योजना के तहत समाज के विभिन्न वर्गों को अपने घरों में स्थायी शौचालय बनवाने के लिए सब्सिडी दी गई. वर्ष 2002 में यह सब्सिडी राशि 600 रूपए थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 4,500 रूपए कर दिया गया. एक नए शौचालय का निर्माण 2,500 रूपए में हो सकता है, जिसके आधार पर इस योजना में 2,900 करोड़े के हेरफेर की आशंका है.

टोटल सेनिटेशन कैंपेन के आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में मात्र 17.50 प्रतिशत लोगों के घर में शौचालय नहीं है. जबकि जनसंख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार 78 प्रतिशत लोग शौचालय की सुविधा से महरूम हैं…

मोंटेक का 35 लाख का टॉयलेट तो हेडलाईन बन गया. इंतज़ार इस बात का है कि इज़्ज़त खतरे में डालकर जंगल जाती ‘लज्जो’ की बेबसी पर कैमरे की नज़र कब पड़ेगी? सैंकड़ों गरीबों के घर का शौचालय अफसर के बंगले का शावर बन गया, लेकिन किसी ने हिसाब नहीं मांगा. योजना आयोग के 35 लाख के टॉयलेट पर सवाल उठाने वाले लोगों को देश की 66 प्रतिशत लोगों की बेबसी को आवाज़ देनी चाहिए. मोंटेक का हाई-फाई टॉयलेट टीआरपी बटोर सकता है तो गरीबों का शौचालय सकारात्मक बदलाव ला सकता है. अगर हमारी मीडिया टीआरपी की जगह  सकारात्मक बदलाव को तवज्जो दे तो गरीबों के शौचालयों में हुए घोटाले भी हेडलाईन बन सकते हैं.

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