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एक और वार्ता लेकिन असर कब?

मोहम्मद शाहिद    

विभाजन के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में कड़वाहट रही है. हालात ऐसे भी हुए हैं कि यह कड़वाहट युद्ध की विभीषिका तक पहुंची हैं. हालांकि दोनों ही देशों ने रिश्तों को सुधारने के लिए भी समय-समय पर प्रयास किये हैं. लेकिन सवाल यह है कि मौजूद हालात में क्या भारत-पाकिस्तान के बीच वार्ताओं और शिखर सम्मेलनों के होने का कोई औचित्य है?

मानव इतिहास, साहित्य और सभ्यता बड़े से बड़े मुद्दों को बैठ कर शांत तरीके से सुलझाने की सलाह देते हैं. “बर्लिन की दीवार’’ का गिरना बातचीत की कामयाबी का शानदार उदाहरण है. लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के रास्ता कामयाबी की ओर जाता नहीं दिखता. हर वर्ष दोनों देशों के बीच कई स्तरीय वार्ताएं होती हैं जिसमें से हाल ही में शुरू हुई विदेश सचिव स्तरीय वार्ता है. वार्ता शुरू होने से पहले ही पाकिस्तान का दोमुंहा होना साफ़ नज़र आ गया. पाकिस्तान के विदेश सचिव जलील अब्बास जिलानी का सीधा रंजन मथाई से मिलने की जगह जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को बुलाकर बातचीत करने का क्या औचित्य है?

वास्तव में पाकिस्तान का ये रवैय्या कोई पहली बार नहीं है. हर बार की तरह इस बार भी पाकिस्तान अंतर-राष्ट्रीय समुदाय का रुख कहीं ओर मोड़ना चाह रहा है. पाकिस्तान ने अपने आप को आतंकवाद पर इतना घिरा हुआ कभी नहीं देखा. अबू जंदाल का भारतीय कस्टडी में होना और रोज उसका किसी नए राज़ पर से पर्दा उठाना पाकिस्तान को बेहद परेशान कर रहा है. इसीलिए द्विस्तरीय वार्ता शुरू होने से पहले ही फिर से कश्मीर का शिगूफा छेड़ दिया गया है. अगर इतिहास पर नज़र डालें तो भारत-पकिस्तान के बीच वार्ताओं और शिखर सम्मेलनों का अनुभव कुछ ज्यादा अच्छा नहीं रहा है. चाहे वह शिमला समझौता हो या आगरा शिखर सम्मेलन हर जगह और हर बार भारत ने ही मुंह की खाई है. किसी भी समझौते पर पाक ने उस वक्त तो हामी भरी है लेकिन फिर उस पर से मुकर गया है. बीते वर्ष ही इस्लामाबाद में द्विपक्षीय विदेश सचिव स्तरीय वार्ता में पाकिस्तान द्वारा भारत को व्यापार के लिए मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिए जाने की अपार संभावनाएं थी लेकिन इसके लिए पकिस्तान भारत को घुमाता रहा. और अभी हाल ही में सरबजीत-सुरजीत मामले में इस राष्ट्र ने बेहद कूटनीतिक दाँव खेला है. इससे पाकिस्तान की नेक नियति का साफ़ पता चलता है.

पाकिस्तान केवल अपना हित देखना चाहता है वह चाहता है कि सियाचिन को खाली छोड दिया जाए, मुंबई हमलों में उसका नाम न घसीटा जाए और बार-बार अमरीका से उसे घुड़की न दिलवाई जाए. यानी टोटल प्रोफिट. भारत को चाहिए कि वह इन वार्ताओं ओर शिखर सम्मेलनों के लिए जो केवल आउटडोर ट्रिप का जरिया बन चुके हैं उन पर कड़े फेसले ले. एक दिशा निर्धारित कि जाए ताकि कोई भी आकर ऐसे किसी छुट भैय्या नेता कि जगह केन्द्रीय नेतृत्व से सीधे विश्वास बहाली के प्रयास करे. वैसे भी इस वार्ता का हाल पहली जैसी वार्ताओं कि तरह ही होने वाला है. अब इंतज़ार करते है अगली वार्ता का जो वहीँ होगी और दो विदेश मंत्रियों के बीच में…

(लेखक जामिया में पत्रकारिता के छात्र हैं)

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