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BeyondHeadlines > Latest News > रमज़ान की मुबारकबाद…
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रमज़ान की मुबारकबाद…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 20, 2012 33 Views
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6 Min Read
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BeyondHeadlines News Desk

रमज़ान का पवित्र महीना कल से शुरु होने वाला है. इस्लामी कैलेंडर का यह नवां महीना हक़ीक़त में अपने साथ बेशुमार रहमत व बरकत लेकर आता है. दुनिया भर के मुसलमान बेचैनी से इसका इंतज़ार करते हैं, क्योंकि इस महीने में किए गए एक काम के बदले खुदा बंदे को सत्तर नेकियां देता है. इस महीने का हर रोज़, ‘रोज़-ए-सईद’ (सौभाग्यशाली दिन) है, और हर शब, ‘शब-ए-मुबारक’. दिन रौशन होता है तो अनगिनत बंदों को यह सआदत (सौभाग्य) नसीब होती है कि वह अपने ‘मालिक’ की आज्ञापालन और खुश करने के ख़ातिर अपने जिस्म की जायज़ ख्वाहिशों और ज़रुरी इच्छाओं तक को तर्क करके यह गवाही दे कि सिर्फ़ अल्लाह ही उनका रब है. उसकी आज्ञापालन और बंदगी की तलब ही ज़िंदगी की असल भूख और प्यास है. रात को अंधेरा छा जाता है तो बेशुमार बंदे अल्लाह तआला के हज़ूर-क़याम, उसके कलाम और उसके ज़िक्र की लज़्ज़त व बरकत से मालामाल होते हैं, और उनके दिलें शीशे-चिरागों की तरह ऐसे जगमगा उठते हैं, जैसे आसमानों पर रात के सितारे…

दरअसल, ‘रमज़ान’ शब्द अरबी भाषा के ‘रम्ज़ा’ शब्द से आया है, जिसका अर्थ होता है- ‘तपती ज़मीन’. जिस समय हज़रत मुहम्मद पर क़ुरआन उतारा गया वह अत्यंत गर्मी का महीना था. यही नहीं, सौभाग्यवश इससे पूर्व पैगम्बरों पर अन्य आसमानी किताबें (ईश्वरीय ग्रंथ) भी इसी महीने उतारी गई थी.

इस माह की हर घड़ी में बरकत का इतना बड़ा ख़ज़ाना पोशीदा है कि ‘नफील’ फर्ज़ के दर्जे को पहुंच जाते हैं, और फरायज़ सत्तर गुना ज़्यादा वज़नी और बुलंद हो जाते हैं. आसमान के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और रहमतों की बारिश होती है. जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और नेकी के रास्तों पर चलने की सहुलत और तौफीक़ आम हो जाती है. जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं. शैतानों को ज़ंजीरों में जकड़ दिया जाता है और बुराई के मौक़े कम से कम हो जाते हैं.

रमज़ान के इस मुबारक महीने में सारे मुसलमानों के लिए रोज़े रखने का हुक्म है. दरअसल, रोज़े को अरबी में ‘सौम’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है किसी काम या वस्तु का रुक जाना, मगर शरई रुप में इसका मतलब ‘इबादत के लिए समर्पित हो जाना’ है.

खुद क़रआन में अल्लाह फरमाता है- ‘मुसलमानों! तुम्हारे ऊपर रोज़ा फर्ज़ किया गया है जिस तरह तुमसे पहले की उम्मतों पर फर्ज़ किया गया था.’ हदीस के मुताबिक ‘रमज़ान के रोज़े बंदे को जन्नत तक पहुंचा देती है.’ इस तरह रमज़ान के इस महीने में रोज़े की बड़ी फज़ीलत है.

· रोज़ा किन पर फर्ज़ है…?
रमज़ान के रोज़े हर मुसलमान पर (चाहे मर्द हो या औरत) फर्ज़ है, अगर उनमें यह शर्ते मिलती हैं-
1. जो शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से स्वस्थ हो.
2. जो बालिग़ (व्यस्क) हो. लेकिन 14 वर्ष के बच्चों को रोज़ा रखने पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, ताकि वो बालिग़ होते-होते पूरी अभ्यस्त हो जाएं.
3. सफ़र की हालत न हो, अपने शहर, अपने फार्म, अपने कारखाने और अपने घर में निवास हो.
4. यह स्पष्ट रुप से निश्चित हो कि रोज़ा कोई क्षति नहीं पहुंचाएगा, न शारिरीक, न मानसिक. (भूख-प्यास इसमें शामिल नहीं है)

· रोज़ा जिन पर फर्ज़ नहीं…
इन लोगों पर रोज़ा फर्ज़ नहीं है-
1. बच्चे, जो नाबालिग़ हों.
2. ऐसे मानसिक रोगी या पागल जिनके किसी कार्य पर कोई पकड़ नहीं.
3. वे मर्द और औरतें, जो इतने बूढ़े और कमज़ोर हों कि रोज़ा रखने में समर्थ ही न हों. ऐसे लोगों को क़ज़ा तो नहीं भरना है, लेकिन इसके बदले में एक मोहताज गरीब मुसलमान को पूरे दिन का पेट भर खाना या उसकी क़ीमत चुकानी होगी.
4. ऐसे बीमार, जिनकी बीमारी रोज़ा रखने से प्रभावित हो सकती है, ऐसे लोग बीमारी की हालत में रोज़ा न रखे, तो कोई हरज नहीं, लेकिन बाद में इन्हें क़ज़ा अदा करना पड़ेगा.
5. ऐसे मुसाफिर, जो लगभग 50 मील या उससे अधिक का सफर कर रहे हों. ऐसी स्थिति में जब तक सफर चल रहा हो, रोज़ा न रखने की छूट है.
6. ऐसी औरतें, जिनके बच्चे बहुत छोटे और दूध पीते हों, वे भी रोज़ा क़ज़ा कर सकती हैं.
7. वे औरतें, जिन्हें मासिक धर्म आता हो (अधिक से अधिक दस दिन) और वे औरतें जो प्रसूति-गृह में हों, ऐसी सभी औरतों पर निश्चित अवधि तक रोज़ा माफ है.

रमज़ान के रोज़े जान-बूझकर खाने-पीने या धूम्रपान करने से टूट जाता है. संभोग से भी रोज़ा टूट जाता है. अगर ऐसा कोई करे तो सज़ा के तौर पर उसे साठ दिन के लगातार रोज़े रखने पड़ेंगे या फिर उसे एक दिन के रोज़े के बदले में साठ गरीबों को पेट भर खाना खिलाना होगा.

· रोज़ा रखने की दुआ… (सहरी के समय)
“बेसौमे ग़दिन नवैतो मिन शहरे रमज़ान”
अनुवाद- मैंने रमज़ान के महीने के रोज़े की नियत की.

· रोज़ा खोलने के वक़्त की दुआ… (इफ्तार के समय)
“अल्लाहुम-म ल-क सुम्तो व बे- क आमन्तो व अलै- क तवक्कलतो व अला रिज़्क़ि- क अफ्तरतो”
अनुवाद- ऐ अल्लाह! मैंने तेरे लिए रोज़ा रखा और तुझ पर ईमान लाया और तुझ पर भरोसा किया और तेरी दी हुई रोज़ी से इफ्तार किया.

TAGGED:रमज़ानरमज़ान की मुबारकबाद...रोज़ा
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