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Reading: सोनभद्र में अवैध खनन पर एक रिपोर्ट
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सोनभद्र में अवैध खनन पर एक रिपोर्ट

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 10, 2012 78 Views
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14 Min Read
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BeyondHeadlines News Desk

उत्तरप्रदेश के सोनभद्र के बिल्ली मारकुंडी के आसपास खादान में आधा दर्जन ट्रैक्टर व लगभग 40 की संख्या में मजदूरों को लगाकर दिन दहाड़े कुछ लोग खनन करा रहे थे. खनन के पूर्व उस खादान में दर्जन भर से अधिक होल करके विस्फोटकों के ज़रिये एक बड़े पहाड़ी हिस्से को उड़ाया गया था. विस्फोट के कुछ ही मिनट बाद खादान में मजदूरों को उतार दिया गया. खादान हज़ारों फीट गहरी थी कि उसमें उतरने के बाद कोई जल्दी बाहर निकलना चाहे तो नहीं निकल सकता था. मजदूरों के उसमें जाने के कुछ ही देर बाद विस्फोट से हिल रही पहाड़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा भरभरा कर ढहना शुरू हो गया. पहाड़ी के ढहने से दर्जन भर से अधिक मजदूर मलवे के नीचे दब गये. और चीख पुकार मच गई. नौ मजदूरों की मौत हो गयी. अवैध खनन स्थल को देखने पर पता चला कि यहां पिछले कई वर्षों से यह खेल जारी है. पेश है जांच दल की एक रिपोर्ट…

जांच दल द्वारा 5 अप्रैल 2012 को उत्तरप्रदेश के सोनभद्र के बिल्ली मारकुंडी में 27 फरवरी, 2012 को एक अवैध ढंग से संचालित पत्थर खदान में हृदय विदारक हादसा की जांच की गई. हादसे वाले दिन सांय पांच बजे के आसपास खादान में आधा दर्जन ट्रैक्टर व लगभग 40 की संख्या में मजदूरों को लगाकर दिन दहाड़े कुछ लोग खनन करा रहे थे. खनन के पूर्व उस खादान में दर्जन भर से अधिक होल करके विस्फोटकों के ज़रिये एक बड़े पहाड़ी हिस्से को उड़ाया गया था. विस्फोट के कुछ ही मिनट बाद खादान में मजदूरों को उतार दिया गया. खादान हज़ारों फीट गहरी थी कि उसमें उतरने के बाद कोई जल्दी बाहर निकलना चाहे तो  नहीं निकल सकता था. मजदूरों के उसमें जाने के कुछ ही देर बाद विस्फोट से हिल रही पहाड़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा भरभरा कर ढहना शुरू हो गया. पहाड़ी के ढहने से दर्जन भर से अधिक मजदूर मलवे के नीचे दब गये. और चीख पुकार मच गई. नौ मजदूरों की मौत हो गयी. सभी मजदूर छत्तीसगढ़ के थे. तीन दिनों तक प्रशासन मलबा हटाता रहा. अंत में मलबा हटाने का काम चौथे दिन बंद कर दिया गया. इस मामले में  जिला प्रशासन ने आनन-फानन में खान विभाग के एक सर्वेयर को निलम्बित किया. पुलिस अधीक्षक ने ओबरा थानाध्यक्ष समेत दो सिपाहियों को निलम्बित किया. इसके बाद किसी भी सरकारी कर्मचारी अथवा अधिकारी पर कोई कार्यवाही शासन प्रशासन स्तर पर नहीं की गयी. एक स्थानीय मृतक के भाई अर्जुन पुत्र सोमारू की तहरीर पर 16 अवैध खननकर्ताओं जिसमें बिल्ली मारकुण्डी का ग्राम प्रधान राजाराम यादव प्राथिमिकी टेम्पो गुप्ता, सच्चितानन्द तिवारी, फौजदार सिंह, राजबहादुर भारती, धीरज जायसवाल, शिवशरण भारती, पम्पू पानी, रोहित मल्होत्रा, सुन्दर मिश्र, पिन्टू पटेल, सनोज चौधरी, मनोज चौधरी, रामनारायण यादव, अनिल मौर्य, पीके सिंह, पर प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी. इसमें एक लखनऊ में पत्रकारिता करने वाले आशुतोष सिंह के पिता जी भी हैं. इसके बाद मामले की पूरी लिपापोती शुरू कर दी गयी. प्राथमिकी के बाद सिर्फ तीन लोगों को ही गिरफ्तार किया गया. शेष आराम से घूमते रहे और घटना के 15 दिन बाद राजाराम, राजबहादुर, पम्पूपानी,  शिवशरण, धीरज, योगेन्द्र सिंह, हाईकोर्ट से स्टे आर्डर लाने में सफल रहे.

छत्तीसगढ़ के मजदूरों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया. घटना के लगभग डेढ़ माह बाद 17 अप्रैल को जब जांच टीम घटना स्थल पर पहुंची तो वहां का नजारा देखकर भौचक थी. खदान में मलबे नीचे लाल रंग का एक ट्रैक्टर पड़ा हुआ था. हादसे वाली खदान के लगभग 200 मीटर दूरी पर ही ग्राम प्रधान राजाराम यादव का मकान था. खदान से ठीक पचास गज की दूरी पर जानवरों के बाड़े की तरह छोटे-छोटे ढाई दर्जन ईट के चार फिट ऊंची दीवार पर शेड रखकर कमरे बने पाये गये. इनमें सभी में मिट्टी के चुल्हे बने हुये थे और लगता था कि इसमें लोग रहते भी हैं. पूछने पर बताया गया कि जो मजदूर इस खदान हादसे में मौत का शिकार हुये वह सभी इसी कमरों में रहते थे. फिलहाल उस वक्त समूचे खनन क्षेत्र में कार्य बंद था इसलिये एक भी मजदूर मौके पर नहीं मिला. जो खदान हादसे का कारण बनी थी उस खदान का रकबा नम्बर 4452 बताया गया जो अभिलेखों में इन्द्रजीत मल्होत्रा व हंसराज की पायी गयी. इस पर कोई खनन पट्टा जारी नहीं हुआ था.  इसी तरह 4471 नम्बर की जमीन 12.89 हेक्टेयर क्षेत्रफल की थी जो विभिन्न कास्तकारों के नाम 1.783 हेक्टेयर दर्ज है. शेष पहाड़ व 8 हे. से जमीन सुरक्षित वन क्षेत्र है. यह भी हादसे वाले खदान में ही सम्मिलित है. इसमें 2 हे. को छोड़कर लगभग सारे क्षेत्रफल पर खनन पाया गया. 4449 नम्बर की ज़मीन पहाड़ के नाम दर्ज है इस पर भी खनन का कार्य किया गया था. 4450 नम्बर की ज़मीन श्रेणी एक संक्रमणीय भूमिधर के नाम दर्ज थी इस पर भी खनन हुआ था. खनन भी इस कदर हुआ था कि लगता ही नहीं कि इसकी निगरानी के लिये भी कोई विभाग बना है. अवैध खनन स्थल को देखने पर पता चला कि यहां पिछले कई वर्षों से यह खेल जारी है. जिसमें सारे लोग सम्मिलित हैं. खनन विभाग व वन विभाग की भूमिका सर्वाधिक संदेह के दायरे में है. क्योंकि जिस ज़मीन पर खनन हुआ वह सुरक्षित वन क्षेत्र है और वगैर वन विभाग की संलिप्तता के अवैध खनन वहां संचालित ही नहीं हो सकता. खनन का कार्य खान विभाग के अधिकारियों  व कर्मचारियों द्वारा समय-समय पर देखा व जांचा जाता है. उनके द्वारा भी पूरी तरह अनदेखी करने का स्पष्ट उदाहरण मिला. क्योंकि अगर उन्होंने जांच की होती तो इतने बड़े व्यापक क्षेत्र में अवैध खनन संभव नहीं था. इसके अलावा राजस्व विभाग के तहसीलदार लेखपाल व कानूनगो द्वारा भी समय-समय पर क्षेत्र में सर्वे करने की बात बतायी गयी. लेकिन किसी विभाग ने अवैध खनन को बंद करने के लिये कोई रिपोर्ट उच्चाधिकारियों अथवा शासन को प्रेषित नहीं की थी. इससे साफ जाहिर है कि खदान हादसे में नौ मजदूरों की मौत के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार यह सरकारी विभाग हैं. दुर्घटना के बाद सोनभद्र के कुछ अखबारों में खबरें प्रकाशित हुई जो अच्छी थी जिससे जाहिर हुआ की इस अवैध खनन के कारोबार में स्थानीय स्तर पर पत्रकार भी शामिल हैं जो बकायदा इन अवैध खनन कर्ताओं से अपना हिस्सा लिया करते थे. दुर्घटना के बाद तमाम राजनीतिक दलों के लोग हो हल्ला मचाना शुरू किये लेकिन वह सब इसलिये किया गया ताकि जिला प्रशासन पर दबाव बनाकर मामले को रफा-दफा किया जा सके. क्योंकि लगभग सभी राजनीतिक दलों के लोगों के परिवार की खदानें वहां पायी गयी. जैसे – भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के भतीजे जयप्रकाश सिंह पुत्र श्री सूर्यनाथ सिंह की खदान बिल्ली मारकुण्डी में 6229 नम्बर में संचालित होती है. जिसका खनन पट्टा 01.12.2001 को जारी हुआ था. भाजपा के जिला उपाध्यक्ष अशोक कुमार मिश्र की खदान 7407 नम्बर में स्थित है. इसी तरह कई अन्य भाजपा नेताओं की खदाने वहां स्थित हैं. कांग्रेस के पूर्व मंत्री स्वर्गीय बच्चा पाठक के भतीजे कपिन्द्र नाथ पाठक की खदान भी बिल्ली मारकुण्डी में डेढ़ एकड़ में है. इसके अलावा कांग्रेस के पीसीसी सदस्य राहुल श्रीवास्तव व जिले में प्रभावी स्थान रखने वाले कांग्रेसी ज्ञानेन्द्र पति त्रिपाठी की भी खदान है. बसपा विधायक व छात्र शक्ति कन्ट्रक्शन कम्पनी के निदेशक उमाशंकर सिंह के नाम भी खदान है. इसी तरह सपा के कई नेताओं जैसे- रमेश वैश्य, धर्मवीर सिंह यादव समेत कई लोग अपनी खदाने संचालित कर रहे हैं. राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बृषभान अग्रवाल की भी बिल्ली मारकुण्डी में खदान है. इसके अलावां जिले में पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने जाने वाले बशीर वेग, मनोज तिवारी, रवि जालान, राहुल श्रीवास्तव, इम्तियाज अहमद, समेत कई लोग जो अपनी गाडि़यों पर प्रेस लिखकर चलते हैं उनकी खदान हैं. ऐसे में सारे लोगों ने मिलकर इस मामले को दबाने में लगे हुये हैं. इस पूरे खेल में  सोनभद्र का वन विभाग, राजस्व विभाग व खान विभाग संलिप्त है और सबकी हिस्सेदारी अवैध खनन के जरिये होने वाली आय में बंधी हुयी है.

खादान ढहने और नौ मजदूरों की मौत के मामले में सिर्फ 16 आम लोगों पर प्राथमिकी दर्ज करना हास्यास्पद लग रहा है क्योंकि यह बगैर सरकारी विभागों के लोगों द्वारा छूट दिये नहीं हो सकता. इस मुद्दे को लेकर जांच टीम के सदस्य जनपद-सोनभद्र के वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत 16 मार्च को भूख हड़ताल पर बैठे थे जिसमें वन विभाग, राजस्व विभाग व खनन विभाग के लोगो पर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गयी थी. खादान हादसे में मरे हुये लोगों को पर्याप्त मुआवजा व पूरे खनन क्षेत्र की सीबीआई जांच की भी मांग रखी गयी थी. लेकिन अभी तक कोई भी कार्यवाही सरकारी महकमें के लोगों के खिलाफ नहीं की गयी. सिर्फ कुछ ऐसे लोगों का निलम्बन किया गया जो अधिकारियों के दिशा निर्देश पर नहीं चलते थे. या यह कहा जाय कि वह कर्मचारी इस अवैध खनन के विरोध में रहते थे औार अधिकारियों से ताल-मेल नहीं था. आज स्थिति यह है कि सारे दलों के तमाम लोग एकजुट होकर खादानों को चालू कराने के लिये धरना प्रदर्शन आंदोलन कर रहे हैं. स्थानीय समाचार पत्र भी उन्हें अच्छी कवरेज दे रहे हैं जबकि जो मजदूर काल के गाल में समा गये और उन्हें छह माह बाद भी मुआवजा नहीं मिला उनके लिये एक शब्द भी नहीं बोल रहे. धरना प्रदर्शन आंदोलन में सर्वाधिक संख्या उन्हीं लोगों की दिखायी दे रही है जो वन क्षेत्र में अथवा अवैध रूप से खनन कार्य पूर्व में कर चुके हैं. खादानो को संचालित करने के लिये पर्यावरण निदेशालय भी संदेश के घेरे में है क्योकि मौके पर खादानों को देखने से यह लगा कि पर्यावरण मानकों की अनदेखी की जा रही है.

जांच दल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत हादसे वाले खाता न0 की भूमि रिकार्डो की स्थिति के बारे में सूचना मांगने पर अचम्भित करने वाली सूचनाएं आई हैं. जहां हादसा हुआ था उस भूमि को न ही राजस्व विभाग, न वनविभाग और न ही खनन विभाग अपनी भूमि मान रहे हैं. सूचना के अधिकार के तहत यह स्पष्ट हो गया है कि खनन की अधिकांश भूमि वनभूमि है जो कि भारतीय वनअधिनियम की धारा 4 के तहत दर्ज हैं. इन भूमियों पर जिस तरह से खनन हुआ है वह लगातार कई वर्षो से चल रहा है क्योंकि यह खदानें हजारों फीट गहरी हो चुकी हैं जहां पर अब पानी भी निकल चुका है. इस अवैध खनन में क्षेत्रीय प्रभागीय वनाधिकारी डीएफओ ओबरा ओ.पी चौरसिया, खान अधिकारी के उपर तत्काल  एफ0आई0आर दर्ज की जानी चाहिए. साथ ही इस खनन को चालू करने में पूर्व के सभी जिलाधिकारीयों की भूमिका के बारे में जांच की जानी चाहिए व दोषी जिलाधिकारीयों के खिलाफ भी प्राथमिकी दर्ज कर उनपर अपराधिक कार्यवाही की जानी चाहिए.

(जांच टीम सदस्य- संदीप पांडेय (सामाजिक कार्यकर्ता- लखनऊ), रोमा एवं शांताभट्टाचार्य (राष्ट्रीय वनजन श्रमजीवी मंच), विजय विनीत (पत्रकार), रमाशंकर (सदस्य कैमूर क्षेत्र मजदूर महिला किसान संघर्ष समिति), जय शंकर पाण्डेय (सामाजिक कार्यकर्ता- चंदौली)

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