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BeyondHeadlines > Latest News > मध्य प्रदेश में ‘महिला सशक्तिकरण’ का एक सच
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मध्य प्रदेश में ‘महिला सशक्तिकरण’ का एक सच

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published September 12, 2012 20 Views
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11 Min Read
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Keshav Patel for BeyondHeadlines

Contents
राजनीतिक स्थिति और हक़ीक़तअत्याचार और महिलाएंप्रशासन की योजनाएं और महिलाएं

मध्य प्रदेश  में ‘बेटी बचाओ आंदोलन’ की समीक्षा के दौरान एक रोचक वायका हुआ… सितम्बर 11  को समीक्षा बैठक के दौरान सतना के कलेक्टर महोदय ने बड़े ही असाधारण ढंग से मुख्यमंत्री और तमाम संबंधित मंत्रियों की भरी बैठक में इस बात पर बहस शुरू कर दी कि जब प्रदेश में ‘बेटी बचाओ अभियान’ को लेकर इतनी मारा मारी हो रही है तो फिर सरकार क्यों नहीं किसी महिला को गृह मंत्री बना देती… तमतमाए मंत्रीगण ने  कलेक्टर महोदय को डांट-डपट के चुप तो करा दिया पर… सवाल तो खड़ा हो ही गया…

मध्य प्रदेश में इन दिनों प्रशासन प्रदेश में महिलाओं सुदृढ़ स्थिति को लेकर फुले नहीं समा रहा है. राज्य सरकार का मानना है कि प्रदेश में महिलाओं की दयनीय हालत में सुधार हुआ है… विगत विधान सभा से लेकर पंचायत चुनावों तक महिलाएं सशक्त रूप से सामने आई है, लेकिन इस महिमामंडन के बाद भी प्रदेश में महिलाओं के साथ क्या-क्या हो रहा है यह बात किसी से छुपी नहीं है… प्रदेश में महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए ना जाने कितने तरह से प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके हालात अब भी चिंता जनक ही हैं.

 

राजनीतिक स्थिति और हक़ीक़त

 

शासन का दावा है कि प्रदेश में महिलाओं के मौजूदा हालातों में सुधार हुआ है. महिलाओं को पुरूषों के बराबर का स्थान मिला है. पर कितना? प्रशासन की कहना है कि इस समय प्रदेश में 01लाख 80 हजार महिला पंच हैं. 11520 महिला सरपंच हैं. 3400 महिला जनपद सदस्य हैं. 415 महिला जिला पंचायत सदस्य हैं. 556 जनपदों और 25 जिला पंचायतों में महिला अध्यक्ष हैं. 1780  महिला पार्षद हैं. 95 नगर पंचायत में महिला अध्यक्ष हैं. 32 नगर पालिका में महिला अध्यक्ष हैं. 8 नगर निगमों में महिला महापौर हैं.

ये आंकड़े हैं राज्य भर में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के, यानी की प्रदेश की कुल 6 करोड़ की आबादी में महिलाओं की जनसंख्या 2.5 करोड के आसपास हैं. इस पूरी जनसंख्या में 3 करोड़ से भी ज्यादा पुरूष हैं. ऐसे में सिर्फ उंगलियों की संख्या में गिनी जाने वाली महिलाओं की इस उपलब्धता पर किसे गर्व करना चाहिए?

6 करोड़ आबादी वाले इस प्रदेश में महिलाएं आज भी हाशिये पर हैं. इनके पास आज भी इनकी आंखों में आंसुओं के आलवा कुछ भी नहीं है. शिवराज द्वारा घोषित महिला नीति का अभी तक क्रियान्वयन नहीं हुआ. प्रदेश सरकार भले ही यह कहकर हल्ला मचा रही है कि राज्य में महिलाओं को पुरूषों के बराबर हक़ दिया गया है तो खुद शिवराज की सरकार में महिलाओं की कितनी पहुंच है, इसका जीता जागता प्रमाण भी है कि 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कुल 25 महिलाएं विधायक हैं, सिर्फ दो महिलाएं ही मंत्रिमंडल में जगह पा सकीं एक हैं. कैबिनेट मंत्री अर्चना चिटनीस हैं तो दूसरी स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री रंजना बघेल हैं. शिवराज सिंह चौहान के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद होने वाले पहले विस्तार को लेकर महिला विधायक अपनी बारी का इंतजार कर रहीं थीं, मगर ऐसा नहीं हुआ.

 

अत्याचार और महिलाएं


यानी कहा जाये कि शासन के आकंड़े सिर्फ दिखावे के लिए हैं तो कोई ज्यादती नहीं होगी. ये बात रही महिलाओं की राजनीतिक पोजिशन की. लेकिन इन सबसे दूर समाज की एक और हकीकत है जहां आज भी महिलाओं पर अत्याचार बदस्तूर जारी हैं. ख़ुद को घुटन से आजादी दिलाने में लगी महिलाओं ने जब भी अपने लिए आवाज़ उठाई हैं, उन्हें इस पुरूष-प्रधान समाज में अगर कुछ मिला है तो सिर्फ यातना और कुछ नहीं. हालात को चाहे जैसे दिखाया जाये, लेकिन राज्य भर में महिला उत्पीड़न के मामले बढ़ते जा रहे हैं.

प्रदेश सरकार भले अपने 5 सालों के आंकड़ों पर गर्व से सीना ठोंक रही हो, लेकिन पिछले एक साल के आंकड़े ही इस पूरे महिमामंडन का मिथक तोड़ रहैं हैं. आज भी महिलाएं समाज के ठेकेदारों के लिए सिर्फ अपने रौब को जमाने का माध्यम मात्र हैं. इसकी जीती जागती मिसाल है ये आंकड़े…

देश में महिलाओं के साथ बलात्कार के मामलों में तीस प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है. इसमें मध्यप्रदेश पहले नंबर है. भाजपा की प्रदेश में सरकार बनने से लेकर अब 13 हजार से भी ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना घटी हैं. धार जिले में दो महिलाओं को बुरी तरह पीटा गया और उनके मुंह पर कालिख पोतकर उन्हें निर्वस्त्र किया गया. प्रदेश में आदिवासी, दलित एवं नाबालिक युवतियां बड़ी संख्या में बलात्कार की शिकार हुई हैं.

शिवपुरी जिले के पिछोर थाना एक मां अपनी सामाजिक प्रताड़ना से तंग आकर तीन बेटियों के साथ आत्महत्या कर लेती हैं. सिर्फ इतना ही नही ये आंकड़े तो उन जगहों के हैं, जहां पर महिलाओं का शोषण कोई नयी बात नहीं है. लेकिन एक और पहलु है जहां पर महिलाएं की सुरक्षा खुद कई सवाल खड़े करती है.

जी हां! मैं बात कर रहा हूं पुलिस महकमे की. प्रदेश में ऐसे कई घटनाएं हैं जिन्होंने कानून को भी दीगर शोषणकर्ताओं के साथ लाकर खड़ा कर दिया है. कानून के ठेकेदार आज खुद ही महिलाओं के दलाल बन गये हैं. प्रदेश में ऐसे कई मामले हैं जिनसे वर्दी भी दागदार हुई है. बालाघाट जेल में 15 फरवरी 05 की रात 9 बजे एक जेल अधिकारी ने महिला वार्ड खुलवाकर महिला बन्दियों के साथ बलात्कार किया. आमला थाने में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. नीमच में 20 अक्टूबर 07 को 15 वर्षीय बालिका के साथ 5 युवकों ने बलात्कार किया और विरोध करने पर भरी पंचायत में बालिका के परिवार को अपमान सहना पड़ा.

इन आकंड़ों पर तो कोई भी कह सकता है कि पुरानी बात है, लेकिन मैं आपको बता कि जनवरी 2009 से जनवरी 2010 तक आंकड़े किसी की भी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त होगें. इस एक साल के महिलाओं पर हुए आत्याचारों पर नज़र डाली जाये तो इस समय सीमा में पूरे प्रदेश के 17 जिलों में महिलाओं के साथ बलात्कार के 755, हत्या के 110, हत्या के प्रयास के 147, दहेज से मौत के 248 और अपहरण के 220 मामले सामने आये हैं. इनमें बलात्कार के सबसे ज्यादा मामलों में बैतूल 130 खंडवा 70 राजगढ़ में 67 और छ्त्तरपुर में 64 मामले दर्ज किये गये हैं. ताजा-तरीन मामला तो शिवपुरी का जहां मई 2012 से अगस्त 2012 के बीच में ही 22 नाबालिगों को किसी दूसरे शहर में जाकर बेच दिया गया. ये तो वे आकंड़े हैं जो पुलिस रिकार्ड़ में दर्ज हैं. इनके आलावा ना जाने और ऐसे कितने अमानवीय कृत्य हैं जिनकी सच्चाई सामाजिक बंधनों और डर की वज़ह से सामने नहीं आ पाये.

 

प्रशासन की योजनाएं और महिलाएं

यह अलग बात है कि शासन हर स्तर पर महिलाओं के लिए शासकीय योजनाओं का ढ़ींढ़ोरा तो पीटती रहती है. महिलाओं के हितों में काम करने के लिए शासन के कई विभाग बना दिये गये हैं. कई योजनाएं क्रियान्वित की गई, लेकिन हालात आज भी वहीं की वहीं हैं.

समाचार पत्रों और बड़े-बड़े आयोजनों के माध्यम से मध्य-प्रदेश में महिला सशक्तिकरण की मुनादी भले ही की जा रही है. पूर्व से संचालित परिवार परामर्श केन्द्रों की तरफ शासन का ध्यान शायद हट सा गया है. इनके कर्मचारियों को वेतन तक नहीं दिया जा रहा है. यह परिवार परामर्श केन्द्र बंद होने की स्थिति में आज खड़े हैं. यही हाल महिला परामर्श केन्द्रों का भी है. वहाँ भी शिशु-बालिका भ्रूण हत्या को प्रदेश सरकार ने कठोर अपराधों की श्रेणी में रखा है. लेकिन पिछले कई वर्षों में एक भी प्रकरण इसके अंतर्गत पंजीबद्ध नहीं किया.

इसी प्रकार भ्रूण हत्या की जानकारी देने वाले व्यक्ति की 10 हजार रुपये का इनाम देने की घोषणा इस सरकार ने की थी, किंतु पिछले वर्षों से किसी को भी यह ईनाम नहीं बांटा गया. इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत के 14 जिलों में से मध्यप्रदेश के भिण्ड और मुरैना में सर्वाधिक भ्रूण हत्याऐं होती हैं. महिलाओं के लिये संचालित अनेक योजनाएँ भ्रष्टाचार से अछुती नहीं हैं. आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका पर्यवेक्षक आदि की नियुक्ति में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है. साइकिल घोटाला, जननी सुरक्षा योजना, पोषण आहार, गरीबी रेखा, राशन कार्ड में धांधाली, पेंशन, नर्सिंग, कन्यादान योजनान्तर्गत दहेज खरीदी, लाड़ली लक्ष्मी योजना, अन्न प्राशन योजना, गोद भराई आदि योजनाएँ मात्र विज्ञापन और कागजों पर ही फलफूल रही हैं.

मुख्य मंत्री कन्यादान योजना के अंतर्गत शहडोल जिलें में जिस तरह से महिलाओं के साथ कौमार्य परीक्षण का मामला हमारे सामने है. बावजूद इसके शासन का यह दावा कि प्रदेश में महिलाएं सुरक्षित, समृद्ध और सशक्त हैं किसी अलिफ लैला व हातिम ताई की कहानियों से कम दिलचस्प नहीं है.

TAGGED:‘बेटी बचाओ आंदोलन’Status of Women in Madhya Pradesh
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