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BeyondHeadlines > Latest News > दामिनी का एक पत्र देश के नाम…
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दामिनी का एक पत्र देश के नाम…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published December 30, 2012 19 Views
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9 Min Read
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Anita Gautam for BeyondHeadlines

मैं देश की एक बेटी, मेरा आज मरना कोई नई बात नहीं है. रोज़ मेरे जैसी अनेक भारत मां की बेटी पल-पल मरती हैं. बस फर्क इतना है कि आज आप सब मेरे बाद मेरे साथ हो, मेरे बलात्कार के बाद, मेरे दर्द के साथ और अब शायद मेरे पार्थिव शरीर के साथ. आपके साथ मेरी कोई जान-पहचान तो नहीं थी और न ही कोई रिश्तेदारी, पर हो सकता है शायद मैंने आपके किसी परिजन को अपने फिजियोथैरेपी के हुनर से ठीक किया हो. आप तो रायसीना की पहाडियों पर पुलिस की लाठियों के बीच पानी के बौछारों और आंसू गैस के गोलों के बीच में भी मेरे साथ थे.

क्या यह इत्तेफाकन इवेंट था जब मेरे अस्पताल पहुंचने से आप लोग एक बार ही सही, इकठ्ठा तो हो गए थे. उस रात ना सही पर आज तो हुए. चलो! मुझे इसका संतोष है कि मेरे मरने से मैं कुछ तो कर पाई. मेरी आंखें बंद होने से आप लोगों की आंखें तो खुली. सदियों से जो आंखे सूख गई थी, आज तो नम हुई. पर अब भी कहूंगी कि अपने इन बेशर्म सांसदों को, विधायकों को और ब्यूरोक्रेट्स को संभाल लो, संभाल लो पुलिस को जो आजाद भारत में आजादी के इतने सालों बाद भी आजादी का अर्थ तक नहीं समझ पा रहे हैं, और देश को अपने बाप की बपौती मानकर जेब में रखकर चल रहे हैं. अब मेरे मरने के बाद जनता जाग रही है.

मुझे अफ़सोस है कि जिस देश के मंत्री, नेता, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की भी बेटियां हैं वो इसका बखान भी मेरे बलात्कार के बाद कर रहे हैं. उस देश के उन जगहों का क्या होगा जहां मेरी जैसी बेटियों के बाप किसी बड़े पद पर नहीं होते…

देश भर के लोग लगे है ज्ञान देने में, और अब जब मैं नहीं रही तो जानना चाहते है मेरे घर के बारे में, मेरे मां-बाप के बारे में, मेरे बचपन के बारे में… उन 6 बलात्कारियों ने तो मेरे साथ जो किया सो किया, लोग बार-बार उस घटना के बारे में और उस बस की फुटेज को अपने फेसबुक वाल पर लगाये बयान बाजी कर रहे हैं. मीडिया को मेरी वो फुटेज तो मिल गई पर जब मैं बुरी हालत में सड़क पर पड़ी थी तब कोई भी मेरे पास नहीं आया. भला हो, उस मानुष का जो मेरे तन को ढ़क कर, हिम्मत करके हॉस्पिटल ले गया.

सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ कर मुझे सिंगापुर भेज दिया पर फिर भी मुझे भी लगा कि शायद मेरी सरकार मेरा भला ही चाहती होगी. मन में बचपन से गाए हुए गीत-सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गाद् अपि गरियसी, याद आ रहे थे. ऐसे मन्त्र भी हैं जो कहते हैं स्त्री तो मां बहन और भार्या होती है, जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता बसते है… पर अब जाना कि यह तो कलियुग है, अगर ऐसा ही होता तो शायद वो जिसने मेरे साथ ऐसा किया था किसी का बेटा या भाई वो मुझे बहन मानता.

मैं तो दिल्ली में सिर्फ पढ़ने आई थी.  फिजियोथेरेपिस्ट बन कर अपंगता को दूर करने आई थी. पर मुझे क्या पता इस देश का हर इंसान अपंग है. अपाहिज है… मानसिक रूप से भी विकलांक है. देश के नेता, बड़े पदों पर बैठे लोग, पुलिस कानून और प्रशासन सब लाईलाज रोग से ग्रसित हैं. बावजूद इसके कि सरकार मेरे मरने का बेसब्री से इंतजार कर रही थी, अब जान पड़ता है.

जिस देश में इंदिरा गांधी और प्रतिभा पाटील जैसी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ऐसे पद पर बैठ कर भी हम लड़कियों के लिए कुछ न कर सकीं तो यह मूक और कठपुतली बने प्रधानमंत्री क्या करेंगे? और बेचारे महामहिम वो क्या करेंगे, जो अपने बेटे तक को काबू में नहीं रख सकते. तो मैं महिला होने के नाते किसी महिला सांसद से भी क्या उम्मीद लगाऊं? वो तो सरे आम मुझे हौले-हौले 6 लोगों के साथ चुपचाप रेप करवाने की सलाह देने लगीं. क्या वो औरत अपनी बेटी या बहन को भी यहीं सलाह देती, जो मुझे मरते वक्त दे गई?

मैं तो आज इस हैवानों की बस्ती से दर्द से कराहते हुए, पल-पल मरते हुए रोते बिलखते हुए चली गई पर मेरे देश की लड़कियों, तुम तो अब जागो और विरोध करो, उखाड़ फेंको ऐसी व्यवस्था को…. तुम क्यों आत्महत्या कर रही हो? तुम कोई दोषी नहीं हो. तुम इस समाज का नव निर्माण करने वाली मां-बहन-बेटी हो. ऐसे रीति-रिवाजों को छोड़ दो जो तुम्हें इंसान होने से भी रोकते हैं. ये लोग तुम्हें सिर्फ उपभोग की वस्तु मानते है और बर्तन धोने वाले साबुन से लेकर मर्दों को गोरा करने वाली क्रीम यहां तक की दाढ़ी बनाने के ब्रश के विज्ञापन में सिर्फ तुम्हारा ही इस्तेमाल करते हैं. विरोध करो इन विज्ञापनों का जो तुम्हें नग्न अवस्था में दूसरे के सामने परोसते हैं.

तुम्हें मेरे मरने के बाद सिर्फ मेरे गुनाहगारों को ही नहीं बल्कि पूरे देश से बदलना है. जो लोग मणिपुर में नग्न प्रदर्शन कर रही महिलाओं को जिज्ञासा से देखते हैं, नक्सलवाद के नाम पर महिलाओं को थानों में गिरफ्तार करके सामूहिक बलात्कार करते हैं. जो विधायक बलात्कार के बाद जान से मार कर टुकड़े-टुकड़े तक कर फेंक देते हैं. अपनी सभाओं में तुम्हें बुलाते हैं और तुम्हारी कहानी प्रदर्शित करते हैं. और फिर अपनी हवस मिटाने के बाद तुम्हें ही बदनाम करते हैं. यहां तक कि जो लोग अपनी पत्नी के साथ जबरन बदसलुकी करते हैं. उन्हें मारते-पिटते और गंदी-गंदी गालियां देते हैं. 7 फेरों के बंधनों को भूल अपनी पत्नि को शादी की पहली ही रात अपने दोस्तों के हवाले तक कर देते हैं. और अब क्या कहूं और क्या ना कहूं …. मेरी बहनों तुम्हें ऐसे समाज को बदलना है.

जिन्दा रहने के बाद मैं शायद पल-पल मरती, कोई मुझसे शादी भी नहीं करता तब मेरे साथ मेरे घर वाले और खासतौर से मेरी मां भी पल-पल मरती क्योंकि मां ने तो जन्म से ही मेरी शादी के सपने देखे थे. मुझे अपने हाथों से दुल्हन बनाकर लाल जोड़े में विदा करना चाहती थी, पर आज मेरी लाश पर सफेद कफन ओढ़ाए रो रही है.  मां ने तो पापा के चोरी-चोरी दो-चार गहने भी बनवाए थे. और मेरे पापा तो अपनी तनख्वाह में से मेरी पढ़ाई के लिए जैसे-तैसे पैसे निकालते. मेरे घर वाले चाहते थे मैं देश में अपंगता दूर करूं. शायद उनकी सोच सही ही थी. मैं आज आप लोगों के साथ मिलकर अपंगता को दूर कर रही हूं और बस अब आप सबको एक सूत्र में पिरो गई हूं. अच्छा हुआ, मैं आज मर गई.

बस, अब मेरे नाम पर सियासत करना बंद करो. और कुछ ऐसा करो कि इस देश से ये पितृ सत्ता खत्म हो जाए जिसमें सब रंगे हुए हैं. यह खत लिखकर सुकून महसूस कर रही हूं. पर मलाल है इस बाद का कि काश कि मैं अपने देश में अंतिम सांस ले पाती. भारत माता की लाड़ली मैं, सीता, सावित्री और द्रोपदी के देश में जी पाती. जीना तो हो नहीं पाया कम-से-कम इस धरती पर ही मर जाती, खैर….

अंत में मैं मेरे घर वालों से मांफी चाहूंगी कि मैं तुम्हारे सपने पूरे नहीं कर पाई मैं एक आम लड़की, एक फिजियोथेरेपिस्ट, का कर्ज अपने सर पर लिये हुई हूं. इस संसार से न्याय की मांग करते हुए चली गई. पर मैं वादा करती हूं मां कि अगली बार तेरी ही कोख से इसी देश में पुनः जन्म लूंगी और फिर दुर्गा बनकर बताउंगी कि लड़की होना क्या होता है…

तेरी बेटी दामिनी…

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