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Reading: क्या भाजपा और कांग्रेस में मिलीभगत है?
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BeyondHeadlines > Latest News > क्या भाजपा और कांग्रेस में मिलीभगत है?
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क्या भाजपा और कांग्रेस में मिलीभगत है?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published May 12, 2013 18 Views
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12 Min Read
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Anurag Bakshi for BeyondHeadlines

यह बिलकुल भी ठीक नहीं कि सत्तापक्ष-विपक्ष की जिद के चलते संसद का बजट सत्र तय अवधि से दो दिन पहले अनिश्चितकालीन के लिए स्थगित हो जाए और कहीं कोई अफसोस का भाव न दिखे.

देश में अभूतपूर्व स्थिति है. संसद ठप है. पाकिस्तान हर दूसरे दिन भारत को अपमानित कर रहा है. 1962 के बाद चीन ने दोबारा भारत को ललकारने का दुस्साहस किया है. उसके सैनिक भारतीय सीमा में करीब 20 किलोमीटर अंदर घुस आए थे और पांच अस्थायी चौकियों का निर्माण भी कर लिया था. उन्होंने उक्त अतिक्रमण वाले क्षेत्र में बोर्ड लगाया था, जिस पर लिखा था ‘आप चीनी सीमा में हैं.’

1962 में भारत को अपमानित कर चीनी सेना अपनी सीमा में लौट गई थी. ठीक उसी तर्ज पर अब भी वापस हो गई.
परंतु इस कांड से भारत की सुरक्षा तैयारी की पोल पूरे विश्व के सामने खुल गई है.

Collusion in the BJP and Congress?

दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार भारत और भारतीयों के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन कर रहा है. कुछ ही महीनों  पहले पाकिस्तान के सैनिक भारतीय सीमा में घुस एक भारतीय सैनिक का सिर काट ले गए. जनवरी माह में लाहौर के कोट लखपत जेल में कैद भारतीय चमेल सिंह को बर्बरतापूर्वक पीटकर मार डाला गया. उसी जेल में सरबजीत पाकिस्तानी कैदियों की हैवानियत का शिकार हुआ. उसके शरीर से दिल, किडनी, पैंक्त्रियाज आदि महत्वपूर्ण अंग निकाल लिए. इस तरह उसके पार्थिव शरीर को अधूरा अंतिम संस्कार ही मिल पाया.

सवाल यह है कि पाकिस्तान और चीन इस तरह का दुस्साहस कैसे कर पा रहे हैं? वास्तविकता तो यह है कि 2004 में लोकतंत्र के साथ कांग्रेस ने जो नया प्रयोग किया उसके कारण आज हमारे चारों ओर अराजकता का माहौल है. प्रधानमंत्री का पद तो मनमोहन सिंह के पास है, किंतु सारी शक्तियां संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी में समाहित हैं.  सोनिया गांधी पहले अपने रिमोट से सरकार चलाती थीं. अब वह लोकसभा को भी संचालित करने लगी हैं. विगत मंगलवार को जब लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज बोलने को खड़ी हुईं तो सोनिया गांधी के उकसावे पर सत्ता पक्ष के नेता निरंतर व्यवधान खड़ा करते रहे. उनके छह मिनट के संबोधन के दौरान लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने उन्हें 60 बार टोका.

इस अलोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण ही सत्ता शिखर पर निर्वात की स्थिति है. सरकार नीतिगत अपंगता का शिकार हुई है. स्वाभाविक तौर पर पूरी दुनिया के सामने हमारी स्थिति हास्यास्पद बनी है और पड़ोसी देश उसी कमजोरी का लाभ उठा रहे हैं.

चीन ल्हासा तक सड़क और रेलमार्ग विकसित कर चुका है. उसकी तुलना में सीमांत और पर्वतीय क्षेत्रों में जो विकास ब्रितानी शासक कर गए थे, हम वहीं ठहरे हुए हैं. अनेक पर्यटन स्थलों से घिरे होने के बावजूद उत्तराखंड में रेल की अंतिम पहुंच काठगोदाम तक ही है.

चीन को पता है कि युद्ध की स्थिति में वांछित साजो-सामान सीमा तक पहुंचाने में ही भारत को कई दिन लग जाएंगे. प्रत्यक्ष युद्धों में भारत के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद और अलगाववादी ताकतों का पोषण कर भारत को खंडित करने की मुहिम में जुटा है. उसके इस एजेंडे को चीन का पूरा समर्थन प्राप्त है.
कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के कार्यकाल में एक से एक बड़े घोटाले हुए, इन घोटालों के कारण राजकोष को 6.25 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ है.

सरकार उन पर शर्मिंदा होने की बजाय सीनाजोरी कर रही है. 2जी घोटाले में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा को बलि का बकरा बनाया जा रहा है. जबकि वह प्रमाणों के साथ यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने जो किया उसकी पूरी जानकारी प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्तमंत्री को भी थी. किंतु जांच के लिए गठित जेपीसी ने इकतरफा निष्कर्ष निकाल सरकार को क्लीनचिट देने की तैयारी कर रखी है.

ऐसे में अदालत ने जो टिप्पणी की है वह अक्षरश: सत्य है. अदालत ने कहा है, यह इतना बड़ा विश्वासघात है कि उसने पूरी नींव को हिला कर रख दिया है… यह जानबूझकर किया गया धोखा है. पहले ही तय कर लिया गया था कि अदालत को जानकारी नहीं दी जाएगी.

संसद का ठप रहना और संसद में सोनिया गांधी के इशारों पर सत्तापक्ष द्वारा हंगामा खड़ा करना वस्तुत: सोची-समझी चाल है. सरकार अपनी कारगुजारियों पर पर्दा डालना चाहती है. संसद केवल भाषण देने का मंच नहीं है. यह जन-अपेक्षाओं की प्रतिनिधि है. सीबीआइ की रिपोर्ट को संशोधित कर सरकार ने न्यायपालिका को नखदंतहीन करने का संकेत दिया है.

वस्तुत: सरकार हर उस आवाज़ का गला घोंटना चाहती है, जो उसकी लूटखसोट का विरोध करता हो. किंतु यह अधिनायकवादी मानसिकता लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है. यह अराजकता को पैदा करता है. आश्चर्य नहीं कि उसी अराजक माहौल के कारण आज पाकिस्तान और चीन हमारे घर में घुसकर हमें ही ललकार रहे हैं.

कांग्रेस को कर्नाटक चुनाव के नतीजों से उत्साहित नहीं होना चाहिए, क्योंकि आपातकाल के बाद लोकसभा चुनाव के समय जब “खा गई शक्कर पी गई तेल” का नारा गूंज रहा था और उत्तर भारत में लोगों ने कांग्रेस को ठुकरा दिया था तब कर्नाटक समेत दक्षिण के अन्य राज्यों में वह सफाए से बच गई थी.

मनमोहन सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करते समय वित्तमंत्री के रूप में विक्टर ह्यूगो का हवाला देते हुए कहा था कि जिस विचार के अमल का समय आ गया हो उसे कोई नहीं रोक सकता. लगता है अब उनके जाने का समय आ गया है, जिसे शायद कांग्रेस कोर ग्रुप भी नहीं रोक सकता.

कोलगेट की मसौदा जांच रिपोर्ट के संबंध में सीबीआइ के हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री के लिए अपने पद पर बने रहना कठिन हो जाना चाहिए. “चाहिए” शब्द का इस्तेमाल इसलिए कि अब फैसला विपक्ष के दबाव और सोनिया गांधी के फैसले पर निर्भर है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद फौरी टिप्पणी में लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने एटार्नी जनरल और कानून मंत्री का इस्तीफा मांगा था, प्रधानमंत्री का नहीं. तो क्या राम जेठमलानी का आरोप सही है कि भाजपा और कांग्रेस में मिलीभगत है?

सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि रिपोर्ट में बहुत अहम बदलाव किए गए हैं. अदालत ने प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिवों पर फटकार लगाई है. सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिए इससे अपमानजनक स्थिति नहीं हो सकती, लेकिन मान-अपमान महसूस करने की चीज है. यह सरकार और इसके मुखिया ऐसी सांसारिक भावनाओं से मुक्त नजर आते हैं. मनमोहन सिंह के लिए प्रधानमंत्री पद और कांग्रेस के लिए सत्ता अंतिम सत्य हैं.

मान-अपमान की चिंता करना साधारण मनुष्यों का काम है. सवाल है कि अश्रि्वनी कुमार का अपराध क्या है? उन्होंने जो अपराध किया वह क्यों किया? जाहिर है कि अश्रि्वनी कुमार अपने प्रधानमंत्री को कोयला घोटाले की जांच की आंच से बचाने की कोशिश कर रहे थे.

अब दूसरा सवाल है कि जब प्रधानमंत्री ने कोई गलत काम नहीं किया है तो उन्हें बचाने की कोशिश क्यों की जा रही है. कानून मंत्री ने जो किया उससे एक निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि उनकी नज़र में प्रधानमंत्री दोषी हैं या उन्हें दोषी ठहराने का पर्याप्त आधार हैं और प्रधानमंत्री कानून मंत्री के बचाव में खड़े नज़र आ रहे हैं. सीबीआई के बारे में सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वह पिंजरे में बंद तोता है जो अपने मालिक की बोली बोलता है.

सीबीआइ के मालिक प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्री चारों ओर से घिर गए हैं. कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्रवाई किए बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा नज़र आना चाहता है. दरअसल कांग्रेस नेतृत्व इतना भयभीत है कि वह अपने नेताओं-मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप भी नहीं सुनना चाहता, कार्रवाई की बात तो बहुत दूर है.
उसे डर है कि जिस तरह से घोटालों का सिलसिला नहीं रुक रहा उसी तरह अगर उसने कार्रवाई शुरू की तो उसका सिलसिला कहां रुकेगा किसी को पता नहीं.

पिछले महीने भर से अदालत, संसद और सड़क पर हंगामा मचा हुआ है. पर क्या किसी ने सुना कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के क्या विचार हैं? क्या ऐसा लगता है कि इस सरकार और पार्टी को तो छोड़िए इस देश से भी उनका कोई सरोकार है? प्रधानमंत्री कहते हैं कि उनकी चुप्पी हजारों सवालों की आबरू बचा लेती है. पर भ्रष्ट लोगों के बचाव में ही उनकी चुप्पी क्यों टूटती है. उन्हें देश को बताना चाहिए. अब सवाल है कि राहुल गांधी की चुप्पी किसकी आबरू की रक्षा कर रही है?

उनकी सरकार और पार्टी की आबरू तो भरी अदालत से लेकर चौराहे तक नीलाम हो रही है. प्रधानमंत्री अब सीधे निशाने पर हैं. देश की सर्वोच्च अदालत की टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री के सारे कवच ध्वस्त हो गए हैं. राजनीतिक शतरंज के इस खेल में राजा को शह मिल चुकी है. राजनीति में मात बोलने का अधिकार मतदाता के पास होता है. इसलिए मात के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे तक इंतजार करना पड़ेगा.

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने पिछले नौ साल में एक नई आर्थिक नीति का ईजाद किया है. इस नई आर्थिक नीति की खूबी यह है कि यह केवल सरकारी पार्टी के नेताओं और उनके परिजनों को अमीर बनाती है. देश को उम्मीद थी कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री देश की गरीबी दूर करने के लिए आर्थिक नीतियां और कार्यक्रम बनाएंगे. पर ऐसा लगता है कि इन्हीं लोगों को उन्होंने देश मान लिया है. आजादी के बाद काफी समय तक विपक्ष कमजोर था या कहें कि था ही नहीं,
लेकिन इसके बावजूद तत्कालीन सरकारों में मजबूत नैतिक मूल्य थे और अनेक राजनेताओं ने खुद पर आरोप लगने पर खुद ही इस्तीफे दे दिए थे. लेकिन अब तो दोष होने पर भी इस्तीफा देने से तब तक बचा जाता है.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भी यही ध्वनित होता है कि सरकार अपनी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन ठीक तरह से नहीं कर रही. साफ है कि देश की राजनीतिक, सामाजिक और वैधानिक व्यवस्था चरमरा चुकी है और हर तरफ विसंगतियां और विडंबनाएं हैं. स्थिति यह है कि कुछ भी ठीक नहीं चल रहा. देश भयंकर दुर्दशा और दिशाहीनता की तरफ बढ़ रहा है.

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