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हिन्दू-मुस्लिम और भारत की सियासत (अतीत से वर्तमान तक)

Yogesh Garg for BeyondHeadlines

इस्लाम… मध्य एशिया में अपने पूर्ववर्ती धर्म के सुधार के तौर पर जन्मा था और भारत में इसके आने के बाद समय के साथ बुद्ध, महावीर, नानक की तरह मुहम्मद साहब को भी इसी सनातन धर्म की भारतीय संस्कृति में घोल लिया जाता. उन्हें भी एक अवतार या पंथ का दर्जा दे दिया जाता, पर सियासी दुकानदारों ने होने नहीं दिया.

इस्लाम यूं भी अपने प्राचीन धर्म के प्रतिक्रिया स्वरुप जन्मा था वो हर उस कर्मकाण्ड/रुढि/­तरीको का विरोध करता है, जो प्राचीन सनातन धर्म में थी. कालान्तर में इसी धार्मिक मान्यता के विरोध को सियासत ने हथियार दे दिये तो धर्म, धर्म ना होकर राजनीति और साम्राज्यवाद का औजार हो गया.

Photo Courtesy: halabol.comअकबर ने अपने समय में बहुत प्रयास किये दोनों धर्मो को निकट लाने के लिए, लेकिन न तो ये इस्लामिक कठमुल्लों को मजूंर था ना हिन्दू पंडो को. अकबर की विरासत दाराशिकोह तक चली, लेकिन औरंगजेब ने दारा को मारकर हिन्दू मुस्लिम सांस्कृतिक /सामाजिक एकता के स्वप्न को भंग कर दिया और इसी के साथ मुग़ल सल्तनत का भी पतन हो गया.

उसके बाद 250 सालों के इतिहास में हिन्दू और मुस्लिम को सामाजिक और सांस्कृतिक रुप से एक करने/समझने के लिये प्रयास न के बराबर ही हुये हैं. 1857 के बाद अंग्रेजों ने सीधे भारत का शासन हाथ में लेने के बाद फिर कभी मौका नहीं दिया कि हिन्दू-मुस्लिम एक साझा राष्ट्रीयता का विकास कर सके.

अंग्रेजों को भारत में जमे रहने के लिये यही तरीका ठीक लगा कि “अल्पसंख्यक  मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं का भय दिखाते रहो और बहुसंख्यक हिन्दूओं पर मुसलमानों के शोषण के आरोप लगाते रहो. ” जिस सम्मलित शक्ति का सामना उन्होंने 1857 में किया था, उन्हें ही उसके बाद एक दूसरे के सामने खड़ा कर दिया और हम धर्मान्ध लोग इस चाल को ना तब समझ पाये ना अब भी समझ पाते हैं.

ये सौभाग्य ही था कि अधिकांश जनमत का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में था, जो व्यक्तिगत तौर पर हिन्दु धर्म मानते हुये भी हिन्दू-मुस्लिम दोनों की एक साझा राष्ट्रीयता के विकास के पक्षधर थे. ऐसे में मुसलमानो के दमन के आरोपो पर उनकी प्रतिक्रिया रक्षात्मक हो जाती थी. क्योंकि भारत में बहुसंख्यक जनमत को हिन्दू कट्टरपंथियों ने राष्ट्रवाद के नाम पर उकसाना शुरु कर दिया, जिसका चोला सांस्कृतिक था पर अन्दर से थे साम्प्रदायिक ही…

ऐसे में कांग्रेस की छटपटाहट बढ़ती जाती थी, जब मुस्लिम चरम पंथी नेता जिन्ना कांग्रेस को हिन्दुओं का संगठन कहते थे. अपने साम्प्रदायिक न होने के बाद भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के अस्तित्व और बाद में जिन्ना को उसके नेतृत्व को स्वीकार कर जाने-अनजाने में उस हिन्दु-मुस्लिम की साझा राष्ट्रीयता का अन्त कर दिया, जिसका निर्माण खुद कांग्रेस के ही कौमी एकता दल कर रहे थे.

गांधी जी जिन्ना को ‘कायदे आज़म’ की उपाधि दे आते हैं, लेकिन वो नहीं जानते थे कि अप्रत्यक्ष रुप से वो हिन्दू और मुस्लिम की अलग-अलग राष्ट्रीयता के विचार को मान्यता ही दे रहे थे. चाहे प्रतिक्रिया के तौर पर ही सही.

रही सही कसर ‘सावरकर’ के ‘ हिन्दुत्व’ ने पूरी कर दी जिसके बाद बहुसंख्यक हिन्दुओं का एक साम्प्रदायिक संगठन जन्मा, जो राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक विकास के नाम पर देश की साझा संस्कृति में भय और नफ़रत का ज़हर घोल रहा था.

जिन्ना ने ‘ सीधी कार्यवाही ‘ के नाम पर लाखों बेगुनाह हिन्दू-मुस्लिमों को अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा की बली चढा दिया, जिस इस्लामिक राष्ट्र और तहजीब की बात जिन्ना करते थे, उससे व्यक्तिगत तौर पर जिन्ना का कोई वास्ता ना था. पर सियासत करने लिये अलग मुल्क बनाने के लिये उन्हें औजार चाहिये था और वो औजार उन्होंने इस्लाम को बनाया और जिसका सामान भारत के मुस्लिम बने.

“फांसीवाद अक्सर देश में धार्मिकता /सांस्कृतिकता का चोला पहन कर आ जाता है” जब दोनों साम्प्रदायिकता शक्तियां एक दूसरे के खिलाफ खड़ी होने लगती है तो फिर अन्तिम रास्ता विनाश की और ही जाता है. व्यापक नरसंहार और दंगो के बाद देश का विभाजन हुआ. इस्लामिक राष्ट्र का मुगालता पाले चरमपंथी पाकिस्तान चले गये. लेकिन ये नासूर खत्म ना हुआ, जो शेष रह गये उनमें से अधिकतर ने भारत को अपना मादरे-वतन माना पर उनमें से कुछ ऐसे भी थे, जिनकी दिल में पाकिस्तान ना जाने की कसक थी. उन्होंने इस देश में ही ‘पाकिस्तान’ पैदा कर दिये. जिनसे हम आज भी जूझ रहे है.

हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियां भारत का शासन ना मिल पाने से तिलमिलाई हुई थी. देश धर्म-निरपेक्ष होने जा रहा था. उन्हे बड़ी खीज थी कि इतने संघर्ष के बाद भी एक हिन्दू राष्ट्र ना बना, और इसका खामियाजा गांधी ने अपनी जान देकर चुकाया.

साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण जारी रहा… हिन्दु और मुस्लिम दोनों की ही साम्प्रदायिक शक्तियों ने लड़ने के लिये नया रण क्षेत्र चुन लिया. वो था कश्मीर… जो संघर्ष नये नये नाम रुपको से आज भी जारी है…

नेहरु ने आजादी के बाद धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की नींव रखी, लेकिन उन्होंने कभी मुस्लिम साम्प्रदायिक शक्तियों पर खुलकर प्रहार नहीं किया. आजादी के बाद भी हिन्दु और मुस्लिम भारत मां के बेटे ही थे लेकिन कांग्रेस के राजनीति के सिद्धान्त इस आधार पर ही थे कि “परिवार में जो छोटा बच्चा जिद्दी है, बार बार रोता चिल्लाता है, हाथ पैर पटकता है, और खुद को शक्तिशाली से भयभीत बताता है, और मागंता है कि परिवार में आई चीज पर पहला हक़ उसका है, और इस तरह वो कभी-कभी तो अपने हिस्से से अधिक दूसरो का हिस्सा भी वह खा जाता है.”

अंग्रेज चले गये लेकिन भारत/पाकिस्तान पर सियासत करने वाले नेताओं के लिये अचूक नुस्खा छोड़ गये. सरकारें बदलती रही… हिन्दू मुस्लिम के बीच दूरियां बढती रही… जिस धर्म-निरपेक्षता का दावा कांग्रेस करती रही, जिसे अपने जीते-जी नेहरु ने जिन्दा रखने की कोशिश की, उसी धर्म-निरपेक्षता की उसने हत्या कर दी और शव को कुर्सी पर सजा कर दिया, ताकि दुनिया को लगे कि कांग्रेस की धर्म-निरपेक्षता जिन्दा है.

समाजवादी भी पाखण्डी निकले, जिन्होने 1977 में इन्दिरा के पतन के बाद समाजवाद का नारा बुलन्द किया. लेकिन गठबन्धन किया भी तो साम्प्रदायिक दलों से, जो एक ज़माने से धर्म-निरपेक्ष भारत में अपने पैर जमाने के लिये ज़मीन तलाश कर रहे थे.

भिण्डरेवाला से लेकर मोदी तक और उसके पहले से भी… एक के बाद एक ‘भस्मासुर’ सत्ता लोलुप कांग्रेसियों/समाजवादियों ने ही पैदा किये हैं. संघ और बीजेपी ने तो इन्हें पोषण देने का काम किया है.

सियासत कितना ही हिन्दु -मुस्लिम एकता की जड़ में मठ्ठा डाले, हम अपनी एक साझी संस्कृति और इतिहास के साथ आज भी एक सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न, पंथ निरपेक्ष राष्ट्र के रुप मे जिन्दा हैं. और आगे भी रहेगें… क्योंकि इतिहास गवाह है कि इस भारत देश में शान्ति और उन्नति का सफेद रंग हमेशा से ही सियासी झंडाबरदारो के हरे, भगवा, लाल रंग से अधिक प्रभावी और असरदार रहा है.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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