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BeyondHeadlines > India > क्या सरकार खालिद की तरह ही मेरे बेटे तारिक़ को मारना चाहती है?
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क्या सरकार खालिद की तरह ही मेरे बेटे तारिक़ को मारना चाहती है?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 20, 2013 9 Views
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BeyondHeadlines News Desk

लखनऊ : मौलाना खालिद मुजाहिद के इंसाफ के लिए विधानसभा लखनऊ धरना स्थल पर रिहाई मंच के अनिश्चितकालीन धरने का आज एक माह पूरा होने पर कचहरी धमाकों के आरोप में फर्जी तरीके से आज़मगढ़ से गिरफ्तार तारिक़ कासमी के चचा हाफिज़ फैयाज़ अहमद ने ‘अनिश्चितकालीन धरने के एक माह पर सपा सरकार द्वारा मौलाना खालिद मुजाहिद के न्याय के मार्ग में बाधा डालने वाले प्रयासों पर रिहाई मंच की रिपोर्ट’ को जारी किया.

इस मौके पर अनेक राजनीतिक, सामाजिक और मानवाधिकार संगठनों के लोगों ने समर्थन देते हुए मांग की कि सपा सरकार तत्काल आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन लेते हुए तारिक़ कासमी को रिहा करे और जिन दोषी पुलिस अधिकारियों ने गलत तरीके से मौलाना खालिद मुजाहिद और तारिक़ कासमी को फंसाया उनकों तत्काल प्रभाव से गिरफ्तार करे.

Rihai Manch completed 1 month Dharna for the justice of Khalidअनिश्चितकालीन धरने के 30वें दिन क्रमिक उपवास पर कचहरी धमाकों के आरोप में फर्जी तरीके से आज़मगढ़ से गिरफ्तार तारिक़ कासमी के चचा हाफिज़ फैयाज़ अहमद, आज़मगढ़ के निवासी हबीब फलाही जो अहमदाबाद की साबरमती जेल में बंद हैं उनके भाई अबू आमिर, गोण्डा के मोहम्मद जुबैर खान, जौनपुर के मोहम्मद आरिफ, फैजानुल हक, जैद अहमद फारुकी, विजय शील भंते, अभिनव गुप्ता, फरुखाबाद के योगेन्द्र यादव बैठे.

धरने के समर्थन के जागरुक नागरिक मंच व नौजवान भारत सभा के कार्यकताओं लालचंद्र, रामबाबू, संजय श्रीवास्तव और रीतिका ने ‘सबसे बड़ा लोकतंत्र या फिर खूनी लोकतंत्र’ नामक एक पोस्टर प्रदर्शनी का भी आयोजन धरना स्थल पर किया. शिवा, श्रृजन और शिप्रा ने धरने के समर्थन में प्रगतिशील कवि गोरख पांडे की कार्पोरेट समाजवाद पर कटाक्ष करती भोजपुरी कविता ‘समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’ को प्रस्तुत किया.

धरने को संबोधित करते हुए दिशा छात्र संगठन के लालचन्द्र ने कहा कि आज भारतीय राज्य का चरित्र औपनिवेशिक हो गया है, जिसका न्याय तंत्र मुठ्ठी भर दौलत वालों की सेवा करता है. वास्तव में पुलिस राज्य की राज्य प्रायोजित संगठित हिंसा का गिरोह है. संविधान भी औपनिवेशिक है जिसमें जनता को कुछ सीमित जनवादी अधिकार मिले हैं. संसद और विधान सभा पूंजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी होती हैं. इसी कारण राज्य आम मजदूरों किसानों के हक़ पर डाका डालता है.

कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में जारी आम जनता का दमन यह साबित करता है कि आज भी भारतीय राज्य कहने को लोकतांत्रिक है. ऐसे में वंचित तबकों पर हमलावर विशेष काले कानूनों के खात्मे से ही राज्य के दमन को रोक पाना संभव हो पाएगा.

कचहरी धमाकों के आरोप में फर्जी तरीके से आज़मगढ़ से गिरफ्तार तारिक कासमी के चचा हाफिज़ फैयाज अहमद ने कहा कि हमारा पूरा परिवार 12 दिसंबर 2007 से जब से तारिक़ को पुलिस वालों ने उठाया तब से ऐसे मानसिक हालात में जीने को मजबूर हैं कि हमें हर पल डर लगता है कि अगले पल क्या होगा?

तारिक़ को पहले तो 12 दिसंबर से 22 दिसंबर 2007 तक एसटीएफ वालों ने गायब रखा उसके बाद जब 22 दिसंबर 2007 को उसका पता चला तो उस पर आतंकी का ठप्पा लगा दिया था सरकार ने. फिर उसकी जांच के लिए 14 मार्च 2008 को उस समय की सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन गठित किया, जिसको छह महीने में रिपोर्ट देनी थी लेकिन आरडी निमेष को छह महीने तक कार्यालय ही नहीं मिला. जब मिला तो उन्होंने 31 अगस्त 2012 को यूपी के मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंप दी तो उन्होंने उसको तब जारी किया जब एक लड़का खालिद जिसको निमेष कमीशन की रिपोर्ट बेगुनाह साबित करती है उसके मारे जाने पर.

अगर सरकार को इस रिपोर्ट को स्वीकारना ही था तो यह काम वह नौ महीने पहले ही कर सकती थी, और अब जब स्वीकारा है तो उस पर कोई कार्यवाई ही नहीं कर रही है. मैं सरकार से पूछना चाहता हूं कि वो किसका इंतजार कर रही है, क्या वो खालिद की तरह ही मेरे बेटे तारिक़ को मारना चाहती है.

उन्होंने कहा कि उनके भतीजे तारिक की गिरफ्तारी के बाद से वो नाउम्मीद हो चुके थे, लेकिन रिहाई मंच के आंदोलन से उनके अंदर यह आस जगी है कि यह आंदोलन तारिक़ कासमी की रिहाई की मुकम्मल कोशिश करेगा.

रिहाई मंच के प्रवक्ता राजीव यादव ने कहा कि रिहाई मंच के आंदोलन के एक माह पूरे होने पर नए सिरे से सरकारों के नीतिगत मुस्लिम विरोधी मंसूबों को लागू करने वाली एजेंसियों का पर्दाफाश करने के लिए कुछ अहम मसौदा भी तैयार किया गया है. रिहाई मंच ने इससे पहले के डीजीपी ए.सी. शर्मा को हटाने की पुरजोर मांग की थी कि 1992 के कानपुर दंगों का आरोपी कोई व्यक्ति यूपी का डीजीपी नहीं हो सकता और सरकार को हमारी मांग के आगे झुकना पड़ा.

आज फिर हम मांग उठाते हैं कि मालेगांव धमाकों के मामले में बेगुनाहों की गलत विवेचना करके मुस्लिम युवकों को जेल में सड़ने के लिए मजबूर करने वाले और अभिनव भारत जैसे संगठन को बचाने की कोशिश करने वाले वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के एडीजी कानून व्यवस्था अरुण कुमार को सरकार तत्काल पद से हटाए.

जब तक खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस व आईबी अधिकारियों की गिरफ्तारी, आरडी निमेष आयोग की रिपोर्ट पर सरकार द्वारा एक्शन टेकन रिपोर्ट जारी कर दोषी पुलिस व आईबी के अधिकारियों को गिरफ्तार करने और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा करने की मांग पूरी नहीं करती सरकार तब तक रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा.

धरने का संचालन रिहाई मंच के नेता हरे राम मिश्र ने किया. धरने को रिहाई मंच के अध्यक्ष मो0 शुएब, गोण्डा के जुबैर, शफी, रिहाई मंच इलाहाबाद के प्रभारी राघवेन्द्र प्रताप सिंह, तारिक शफीक, पूर्व सांसद इलियास आज़मी, कानुपर से अभिनव गुप्ता, एसआईओ के साकिब, अवामी काउंसिल के महासचिव एडवोकेट असद हयात, सादिक, सोशलिस्ट फ्रंट के मो0 आफाक, शुएब, जनवादी पार्टी के अध्यक्ष संजय विद्यार्थी, एपवा की ताहिरा हसन, इंडियन नेशनल लीग के मो0 समी, पीछड़ा महासभा के एहसानुल हक मलिक, भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील, भंवरनाथ पासवान, सैय्यद मोइद अहमद, वकारुल हसनैन, सोशलिस्ट पार्टी के ओमकार सिंह, अबु आमिर, जैद फारुकी, शम्स तबरेज खान, पीस पार्टी के रिजवान अहमद, क़मर सीतापुरी, जुबैर जौनपुरी, फरुखाबाद के योगेन्द्र यादव, आमिना खातून, इशहाक, सामाजिक संगठन आली की रेशमा, शशी, आदियोग, फैज, जमात ए इस्लामी के मौलाना खालिद, कानपुर के अहमद हुसैन, वाराणसी से डा मुनिजा रफीक़ खान, अमित मिश्रा, इंडियन जस्टिस पार्टी के इसराउल्ला सिद्दीकी आदि शामिल हुए.

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