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शबे-बरात : एक बनावटी त्योहार?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published June 24, 2013 27 Views
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8 Min Read
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Afroz Alam Sahil for BeyondHeadlines

शबे-बरात को आमतौर पर मुसलमानों का एक त्योहार समझा जाता है. इसके कुछ रीति-रिवाज भी तय कर लिए गए हैं, जिनकी सख्ती के साथ पाबंदी भी की जाती है. मगर सच्ची बात यह है कि यह एक बनावटी त्योहार है. न कुरआन जैसी पाक किताब में इसका कोई ज़िक्र मिलता है, न हदीस में, न ही सहाबा-ए-कराम के ज़माने के इतिहास में ही इसका कोई पता व निशान है, और न ही शुरूआती ज़माने के इस्लामी आलिमों ने ही इसको इस्लाम का त्योहार माना है.

शबे-बरात : एक बनावटी त्योहारवास्तव में ‘इस्लाम’ रीति-रिवाजों और त्योहारों का मज़हब है ही नहीं. यह तो एक सीधा और सभ्य मज़हब है, जो इंसानों को रीति-रिवाजों की जकड़-बंदियों से, खेल-तमाशों की बेफायदा व्यस्तता से और अनावश्यक कामों में वक़्त, मेहनत और दौलत की बर्बादियों से बचाकर ज़िन्दगी की ठोस हक़ीक़तों के तरफ ध्यान दिलाता है. और न उन कामों में आदमी को व्यस्त करना चाहता है, जो संसार और परलोक की सफलता का माध्यम न हो.

ऐसे मज़हब के स्वभाव से यह बिल्कुल मेल नहीं खाता कि वह साल में एक दिन हलवा पकाने और आतिशबाज़ी करने के लिए मशहूर कर दे, और स्थायी तौर पर हर साल अपनी ज़िन्दगी के कुछ क़ीमती घंटे और मेहनत से कमाए हुए रूपये बर्बाद करता रहे.

इससे ज़्यादा सोचने की बात यह है कि वह किसी ऐसे रिवाज़ों का इंसान को पाबंद न बनाए, जो सिर्फ वक़्त और पैसे ही बर्बाद नहीं करती, बल्कि कभी-कभार प्राणों को भी नष्ट कर देती है. हद तो यह है कि कभी-कभी घर तक फूंक डालती है. इस तरह के बेकार कामों का हुक्म इस्लाम कभी नहीं देगा. अगर ऐसी कोई रीति-रिवाज रसूल (सल्ल.) के ज़माने में होती तो निःसन्देह इसको सख्त हुक्मों के साथ रोक दिया जाता.

मगर जब हम तलाश करते हैं कि शअबान के महीना में इस ख़ास दिन के साथ कोई मज़हबी अक़ीदा या कोई लाज़िमी इबादत मुकर्रर है तो हमको इसका भी कोई निशान हमें नहीं मिलता. ज़्यादा से ज़्यादा हदीस में जो बात मिलती है, कि एक बार शअबान की पंद्रहवीं रात को हज़रत आएशा रज़ि. ने रसूल सल्ल. को बिस्तर पर न पाया. तो आप सल्ल. को तलाश करने के लिए निकलीं. खोजते-खोजते ‘बकीअ’ के कब्रिस्तान पहुंची. वहां पर आप सल्ल. को मौजूद पाया.

वजह मालूम करने पर आप सल्ल. ने फरमाया कि इस रात अल्लाह तआला दुनिया की तरफ ध्यान फरमाता है, और इंसानों के गुनाह माफ करता है. लेकिन हदीस के मशहूर इमाम ‘तिरमीज़ी रहमतुल्लाह’ ने इस रिवायत (कथन) को गलत क़रार दिया, और बयान किया है कि इसका सबूत सही तौर पर हज़रत आएशा रज़ि. तक नहीं पहुंचती.

बाज़ दूसरी रिवायत (कथन) भी है, जो छोटी किताबों में मिलते हैं जिसमें इस रात की यह फज़ीलत बयान की गई है कि इसमें क़िस्मतों के फैसले किए किये जाते हैं, और पैदाइश और मौत के मामलात तय होते हैं. लेकिन यह सब रिवायतें ग़लत हैं. हरेक के सबूत में कोई न कोई कमज़ोरी ज़रूर मौजूद है.

इसलिए हदीस की पुरानी और विश्वासपात्र किताबों में भी इनका ज़िक्र कहीं नहीं मिलता. तथापि अगर इनकी कोई असलियत हम स्वीकार भी लें, तो हद से हद बस इतना ही नतीजा आ सकता है कि इस रात में इबादत करना और ख़ुदा से अपनी माफी की दुआ करना एक अच्छा कर्म है, जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग करें तो सवाब पाएंगे. इससे बढ़कर कोई ऐसी चीज़ इन रिवायतों (कथनों) से साबित नहीं होती, जिससे समझा जाए कि चौदहवीं तारीख़ को या पंद्रहवीं रात को इस्लाम में त्योहार क़रार दिया गया है, या कोई सामूहिक इबादत मुक़र्रर की गई है.

हदीस की ज़्यादा मशहूर किताबों से जो बात साबित होती है, वह यह है कि रसूल सल्ल. पर रमज़ान के आने से पहले ही शअबान के महीना में एक खास कैफियत तारी हो जाती थी. रमज़ान का महीना वह महीना है, जिसमें रसूल सल्ल. को अल्लाह ने अपना पैग़म्बर बनाया और कुरआन जैसी कभी न ख़त्म होने वाली किताब के अवतरण का प्रारंभ हुआ. इस वजह से आप सल्ल. की रूह खुदा से लग जाती थी.

हज़रत आएशा रज़ि. और हज़रत उम्मे-सलमा रज़ि. बयान करती हैं कि रमाज़ान के अलावा साल के बाकी 11 महीनों में सिर्फ शअबान ही एक ऐसी महीना था, जिसमें आप सल्ल. सबसे ज़्यादा रोज़े रखते थे, बल्कि पूरा महीना ही रोज़ा रखने में गुज़र जाता था. लेकिन रसूल सल्ल.  ने आम मुसलमानों को हिदायत फरमा दी थी कि शअबान के महीने के आखिरी पंद्रह दिनों में रोज़ा न रखा करें, क्योंकि इससे अंदेशा था कि यदि स्वभावतः लोग इस महीना के अंतिम दिनों में रोज़ा रखने लगे तो धीरे-धीरे एक लाज़िमी रिवाज बन जाएगी, और रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़े पर बिला वजह दस-पंद्रह रोज़ों का इज़ाफा हो जाएगा. इस तरह से लोगों के ऊपर वह भाड़ पड़ जाएगा, जो अल्लाह तआला ने उन पर नहीं रखा है.

कुरआन रीति-रिवाजों को जंजीरों से तश्बीह देता है, और रसूल सल्ल. के मिशन का एक बड़ा काम यह बताता है कि उन जंज़ीरों को काट फेंके, जिसमें इंसान ने अपने आपको खुद कस रखा है. यही वजह है कि शरीअते-मुहम्मदी सल्ल. में फर्ज़ का एक निहायत हल्का और सादा नियम लागू करके बाकी सारे रीति-रिवाजों को समाप्त कर दिया गया है.

ईद और बकरीद के अलावा कोई त्योहार न रखा गया. हज के सिवा कोई यात्रा न रखी गई, ज़कात के सिवा कोई दान-पुन को फर्ज़ न किया गया और हमेशा के लिए यह उसूल तय कर दिया गया कि इंसान को जिस तरह अल्लाह के द्वारा फर्ज़ किए कामों में कोई चीज़ कम करने का हक़ नहीं है, उसी तरह कोई चीज़ बढ़ाने का भी हक़ नहीं है.

जो चीज़ शरीअत में नहीं है, उसे खास महत्व देना, या जिस चीज़ की शरीअत में जो हैसियत है, उससे अधिक अहमियत देना बिदअत है, और हर बिदअत गुमराही है. यही बिदअत हम शबे-बरात में करते हैं. इसे बड़ी धूम-धाम से मनाते हैं. हलवा बनाकर लोगों में बांटते हैं और आतिशबाज़ियां करते हैं, जबकि सभी बातों को इस्लाम ने सख्ती से मना किया है.

(यह लेख मौलाना मौदूदी की पुस्तक शबे-बरात की हक़ीक़त (उर्दू) के अध्ययन के आधार पर लिखा गया है.)    

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