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ज़मीन की लड़ाई…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 17, 2013 10 Views
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23 Min Read
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Saurabh Verma for BeyondHeadlines

दिल्ली के 10 जनपथ से लगभग 1850 किलोमीटर दूर एक राज्य है ओड़िशा… जिसके एक किनारे पर है विशाल समुद्र तो दूसरी और पूरा राज्य अपार प्राकर्तिक संसाधनों से भरा पड़ा है. लेकिन इन संसाधनों को लुटने की फ़ेहरिस्त देसी-विदेशी कंपनियों से भरी पडी है.

वेदांता, पॉस्को, टाटा और भी बहुत बड़ी-बड़ी कंपनिया यहाँ विशाल कारखाने लगा रही हैं. जिनके रास्ते में अगर विभिन्न आंदोलनों की दीवारे न हो तो अगले 10 वर्षो में ये ओडिशा को पूरी तरह से नष्ट कर देंगी. ख़त्म हो जायेंगे गगन चुम्बी बाक्साइड और नियमगिरि जैसे जंगलो से भरे पहाड़… पान-चावल जैसी सैकड़ों किस्म की फसले और मजबूर हो जायेंगे हजारो ग्रामीण किसान, आदिवासी और मछुवारे शहरो में जाकर मजदूरी करने को…

भुवनेश्वर से 3 घंटे की दूरी पर है ग्राम पंचायत धिनकिया जहाँ सेज, मनमोहन सरकार… नवउदारवादी नीति के साथ मिलकर विशालतम एफ.डी.आई.दक्षिण कोरिया की कंपनी पॉस्को अपनी 3600 अरब रूपये की स्टील परियोजना लगाने के लिए ग्रामीणों और जंगल की 4004 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण करना चहती है. इसमें उसका साथ दे रही है राज्य सरकार और प्रशासन.

अधिग्रहण के दायरे में गोबिंदपुर, पटना, धिनकिया, आस-पास के छोटे गॉव और जंगल की ज़मीन आती है जहाँ ग्रामीण पान की खेती (पान बारज) करते है. लगभग 15 साल पहले जिले के पास ही में लगे आई.ओ.सी.एल. के प्लांट की वजह से बेघर और गोबिंदपुर, धिनकिया और कई गॉवो में मजदूरी करने को मजबूर ग्रामीणों को देखकर ही गोबिंदपुर और बाकी गॉवो के लोगो में इस प्लांट के खिलाफ खड़े होने की ताकत पैदा हो सकी और उन्होंने 8 साल पहले ‘पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति’ का गठन किया.

battle for land8 साल पुराने इस आंदोलन के कारण ही सरकार और पॉस्को अब तक स्टील परियोजना लगाने में असमर्थ थी. आन्दोलन को ख़त्म करने के लिए पुलिस ने एक साजिश के तहत तीनो गांवो के लोगों के ऊपर फर्जी आरोप लगाने शुरू किये. जिस कारण जब भी विरोध होता तो सभी पुरुषो को फर्जी आरोपों की आड़ में गिरफ्तार कर प्रताड़ित किया जाता. इसी साजिश के तहत आंदोलन के प्रमुख अभय साहू अभी भी जेल में हैं. साथ ही ग्रामीण महिला प्रमुख मनोरमा खट्वाके ऊपर अभी 50 केस चल रहे है जिनमें 302, हत्या और बलात्कार जैसे केस भी शामिल हैं.

इस लड़ाई में हिस्सा लेने वाले लगभग-लगभग सभी पुरुषों पर पुलिस ने फर्जी मुक़दमे चला रखे हैं. जिस कारण वो न तो विरोध में हिस्सा ले पाते हैं और न ही गॉव से बाहर निकल पाते हैं. लेकिन इससे ग्रामीणों ने अपने आंदोलन को और भी मजबूत किया. अपने पान बारज को बचाने और पुलिस व पोस्को समर्थकों के खिलाफ विरोध और भी तेज़ कर दिया. इस लड़ाई में अब सबसे पहले खड़ी है बाल सेना उसके पीछे है महिलाएँ और अंत में है वृद्ध और पुरुष.

मानवाधिकारों और बालाधिकारो का उलंघन प्रशासन नहीं कर सकता इसी कारण पिछले 6 वर्षो से ये आंदोलन अपने चरम पर था. पॉस्को और पुलिस ग्रामीणों के पान बारजो को छू नहीं पा रही थी. लेकिन पिछले 2 वर्षो में दक्षिण कोरिया की सरकार और वहाँ के वाणिज्य मंत्री सुक होंग का ओडिशा सरकार और पी.एम.ओ. पर दबाव काफी बढ़ता जा रहा है, जिससे बचने के लिये अब राज्य सरकार पर्यावरण मंजूरी और वन अधिकारों को ताक पर रख चुका है.

इस आंदोलन को कमज़ोर करने के लिये नवंबर 2007 में बालितुठ पर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रही महिलाओं पर पॉस्को के गुंडों ने बम और तलवारों से हमला किया. फिर मई 2010 में जब नवीन पटनायक कुछ पत्रकारों से शांतिपूर्ण ओधोगिकरण की बात कर रहे थे तभी पुलिसवाले ग्रामीणों के शांतिपूर्ण धरने पर हमला कर रहे थे.

पॉस्को और राज्य सरकार के बीच 2005 में हुए अनुबंध की समयावधि वर्ष 2010 में ख़त्म होने के बावजूद पॉस्को का ज़मीन अधिग्रहण का काम अभी तक जारी है. 4 जुलाई 2013 को नवीन पटनायक की सरकार ने यह घोषणा की है कि “पॉस्को के लिए ज़मीन अधिग्रहण का काम पूरा हो चुका है और जो ज़मीन अधिग्रहित हुई है कंपनी उसी 2700 एकड़ में काम शुरू करेगी”. लेकिन इस घोषणा में भी सरकार और कंपनी की साजिश साफ झलकती है.

पॉस्को को फ़ायदा पहुचने के लिए साधी गयी इस चुप्पी का खामियाजा मासूम ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है. जो कभी पुलिस और पॉस्को समर्थको की बर्बरता झेल तो कभी अपनी जान देकर इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.

जुलाई और अगस्त 2013 के बीच में पुलिस, प्रशासन और पॉस्को समर्थको ने साथ मिलकर गोबिंदपुर के लोगो की पान बारज तोड़ी साथ ही ग्रामीणों के विरोध करने पर उनके साथ मार-पीट भी की. इस साजिश को पूरी तरह समझने के लिए भुवनेश्वर में जब मैंने पी.पी.एस.एस. के प्रवक्ता प्रशांत पाईक्रे से बात की तो पिछले 2 साल में गोबिंदपुर और बाकि गॉवो में जो घट रहा है उसकी तस्वीर साफ हुई.

गोबिंदपुर में ग्रामीण पिछले काफी समय से किसका विरोध कर रहे है और अभी हाल ही में क्या हुआ है, जरा विस्तार देंगे ?

वर्ष 2011 से पहले सरकार जंगल और ग्रामीणों की निजी ज़मीन को हाथ नहीं लगा रही थी, लेकिन 2011 में सरकार ने जंगल की 3000 एकड़ ज़मीन जो नुवागांव और गणकुजंग के बीच में है को निशाना बनाया जिसका ग्रामीण महिलाओं और बच्चों ने मानव चेन और बालू पर लेटकर काफी महीनों तक विरोध किया. प्रशासन ने फर्जी दस्तावेजों का हवाला देकर विरोध को ख़त्म करने की कोशिश भी की. इसके लिये व्यवस्था में बैठे उच्च अधिकारियो की जेबे भी गर्म की गयी. तब से लेकर आज तक ग्रामीण लगातार विरोध कर रहे हैं. लेकिन 2012 के अक्टूबर महीने में उसने कुछ दलालों, गुंडों, और भू-माफियाओ को खरीद कर इस आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की. फिर पॉस्को ने सी.एस.आर.(CORPORATE SOCIAL RESPONSIBILITY) को 200 करोड़ रूपये, उसके द्वारा लगाये जाने वाली परियोजना के आस-पास के विकास के नाम पर दिए. जब इन सभी से काम नहीं बना तो पॉस्को ने पुलिस के साथ मिलकर 3 फरवरी 2013 को गोबिंदपुर में आधी रात के समय अचानक महिलाओं और बच्चो हमला कर दिया, जिसमें पॉस्को का ज़मीन अधिकारी भी शामिल था. सभी ने मिलकर बच्चो, बूढों, महिलाओं हर किसी की बर्बरता से पिटाई की और उन्हें गॉव के काफी बाहर तक खदेड़ा और यह सब कुछ हुआ बिना किसी क़ानूनी आदेश के. आधी रात में घटी इस घटना के बाद सुबह होते ही पुलिस की 30 पेल्टून ज़मीन का अधिग्रहण करने गोबिंदपुर गॉव पहुँच गयी. जिसके बाद से लोग वहां रोजाना विरोध कर रहे थे और पुलिस भी वहां एक कैम्प लगाकर डेरा डालकर बैठ गयी.

 गोबिंदपुर से भागे लोग पटना और धिनकिया गॉव में छोटे-छोटे टेंट लगाकर ठहरे हुए है, चूँकि पुलिस उन्हें गॉव में घुसने ही नहीं दे रही है. खतरा न सिर्फ गोबिंदपुर पर है बल्कि पटना और धिनकिया जैसे कई गॉव भी सरकार और पॉस्को के निशाने पर है. फरवरी में पुलिस के अचानक हुए हमले के अगले ही महीने 2 मार्च को पटना में पी.पी.एस.एस.के नेता सुरा नन्ना के घर पर ग्रामीण और कुछ अन्य लोग बैठकर पॉस्को के खिलाफ़ होने वाले आगे के विरोधों की रणनीति तैयार रहे थे कि तभी (शाम को तक़रीबन 6 से 6:30 बज़े के बीच) कही से एक बम आकर गिरा और फट गया, इस धमाके में मानस जेना की मौके पर हो मौत हो गयी और लक्ष्मण प्रमाणिक, नवीन मंडल, नरहरि साहू बुरी तरह से घायल हो गए.

पी.पी.एस.एस.के वरिष्ठ लोग मौके पर पहुंचे और पुलिस को फ़ोन कर घटना की जानकारी दी. महज़ 1.5 किलोमीटर दूर पुलिस का कैम्प होने के बावजूद कोई भी पुलिस वाला बार-बार फ़ोन करने पर भी मौके पर नहीं पहुंचा. घटना के एक घंटे के बाद नरहरि साहू को मौत हो गयी और उसके आधे घंटे के भीतर नवीन मंडल ने भी दम तोड़ दिया. काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी जब कोई नहीं पहुंचा तो स्थानीय लोगों ने निज़ी वाहन से लक्ष्मण प्रमाणिक को कटक मेडिकल भेज दिया, जिसके बाद ठीक होने पर उन्हें पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया.

घटना स्थल पर तो कोई पुलिस वाला नहीं पहुचा लेकिन घटना के ठीक आधे घंटे बाद एस.पी. ने बयान जारी कर कहा की जब यह घटना घटी तब ग्रामीण, पुलिसवालों को मारने के लिए यहाँ बम बना रहे थे, पिछले 8 वर्षो में जिस आंदोलन ने किसी भी प्रकार की हिंसा न दिखाई उस पर हथियार बनाने का इल्ज़ाम पुलिस की मंशा साफ करता है.

असल में पॉस्को द्वारा रची इस साजिश का निशाना आन्दोलन के सबसे प्रमुख नेता अभय साहू थे लेकिन जब ये घटना घटी तब वो वहां मौजूद नहीं थे. जब वहां के स्थानीय लोग इस घटना से उभर भी नहीं पाए थे तभी अगले दिन सुबह 7 बजे से ज़मीन अधिग्रहण का काम शुरू हो गया जो कि सभी के लिए आश्चर्य की बात है.

लगभग 10 से 11 बजे के बीच पुलिस की एक पेल्टून गॉव में आई और सामान्य पूछ-ताछ करके चली गयी, मारे गए लोगों के परिवार के साथ जब कुछ ग्रामीण एफ.आई.आर. दर्ज कराने पुलिस के पास गये तो पहले उन्होंने साफ मना कर दिया. जब ग्रामीणों ने जोर दिया तो पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी कर उन्हें वहां से भगा दिया.

इसके कुछ समय बाद पॉस्को समर्थक नेता पुलिस के पास गया और एक एफ.आई.आर. दर्ज कराई जिसमें उसने लिखा था कि “ये ग्रामीण हमें मरने के लिए बम बना रहे थे जिसमे अभय साहू भी शामिल है”. पुलिस ने शाम होते ही ग्रामीणों को शवों को ले जाने के लिए कहा लेकिन ग्रामीणों ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि जब तक दोषियों के खिलाफ उचित कार्यवाही नहीं होगी वो लोग शवों को स्वीकार नहीं करेंगे. इस घटना के बाद लोगो में आक्रोश और अधिक बढ़ गया.

4 मार्च की सुबह पुलिस पटना गॉव में आयी और धरने की जगह पर धारा 144 लगा दी और उसी शाम तीनों शवों को धिनकिया गॉव भेज दिया गया. अगले दिन ग्रामीणों ने मिलकर पटना में जहाँ धारा 144 लागू थी शवों को लाकर उनका अंतिम संस्कार किया और आगे की रणनीति तैयार की.

7 मार्च को ग्रामीणों ने इस घटना की विरोध किया और पुलिस पर एफ.आई.आर. दर्ज करने का दबाव बनाया. पुलिस ने कार्यवाही तो की लेकिन विरोध करने आये ग्रामीणों की बर्बरता से पिटाई कर, जहाँ ग्रामीण महिलाओ के साथ बदसलूकी भी हुई. तब से लेकर आज तक लगातार पुलिस द्वारा ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है जिसका ग्रामीणों द्वारा विरोध भी जारी है.

आगे पॉस्को प्रतिरोध संग्राम समिति की क्या रणनीति है ?

कुछ समय पहले 25 पान के खेतों को पुलिस द्वारा तबहा कर दिया गया था, जिनको जल्द ही पुन: ठीक कर पी.पी.एस.एस.के कार्यकर्ता अपना विरोध प्रदर्शित करेंगे. और आगे भी विरोध करते रहेंगे. पॉस्को के खिलाफ अपनी ज़मीन को बचाने के लिए चल रही इस लड़ाई में काफ़ी ग्रामीणों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. कहीं तो एक ही परिवार से दो लोग भी जंगल और ज़मीन को बचाने की इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं, पुलिस ने ग्रामीणों पर लगभग 214 मुक़दमे दर्ज कर रखे हैं जिनमें तक़रीबन 500 महिलाये भी शामिल हैं, इन्हें भी समाप्त करने की हमारी कोशिश है. पी.पी.एस.एस.के लोग गोबिंदपुर जाकर टूटी हुई पान बारजो का दोबारा निर्माण भी करेंगे.

इस मामले में सी.पी.आई. क्या कर रही है ? 

ये बात आप उन्हीं लोगों से पूछिए, इस मामले में उनकी तरफ से कोई बयान नहीं देना चाहता.

गॉव के इतना नज़दीक अगर पॉस्को की परियोजना लगती है तो इससे प्रकति पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

 2011 से अब तक इस परियोजना के कारण ही जंगल से तक़रीबन 2,80,000 पेड़ो का सफाया किया जा चुका है. इतनी बड़ी तादात में अगर प्रकति के साथ खिलवाड़ होगा तो उतराखंड में आयी आपदा से भी बड़े और भीषण विनाश के लिए हम सबको तैयार हो जाना चाहिये, इससे पहले ओड़िशा 1999 में भी एक महा चक्रवात का सामना कर चुका है, जिसमें सब कुछ तबाह हो गया था और तक़रीबन 10,000 लोगों को जान गयी थी.

प्रशांत पाईक्रे से बात करने के बाद 10 जुलाई की सुबह मैं फ़िल्मकार फैज़ा खान, कुदनकुलम से जुड़े आंदोलनकारी फोटोग्राफर अमिरितराज, समदृष्टि पत्रिका के वीडियो पत्रकार तरुण और वीडियो वोलेंटियर के वीडियो पत्रकार राजेश के साथ इन तीनो गॉवो में गया. यहाँ सबसे पहले मैं पटना हाट पर पंहुचा, जहाँ तीनों गॉवो के लोग सुबह 7 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक विरोध जाहिर करने के लिए इकठा होते हैं.

गोबिंदपुर के लोगों की पान बारज पुलिस द्वारा तोड़े जाने के बाद इन लोगों के चहरों पर मायूसी साफ झलक रही थी. हम जाकर उनके पास बैठ गये और एक बार फिर से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली, लेकिन इस बार मिली जानकारी में लोगो की भावनाएं जुडी हुई थी. गोबिंदपुर के लोग कम थे क्योंकि वो अपनी टूटी हुई पान बारज से पान की बेल और ज़रुरत का सामान निकाल रहे थे इस उम्मीद से कि शायद एक बार फिरसे वो अपने पान बारज लगा सके. लगभग 2 घंटे जब हमने पटना और धिनकिया के लोगों से बात की तो उनमे अब अकेले पड़ जाने का डर साफ़ झलक रहा था. साथ था तो बस पी.पी.एस.एस. जिसमें कुछ सामाजिक कार्यकर्ता साथ दे रहे थे.

कुछ समय बाद गोबिंदपुर से 47 वर्षीय रमेश चंद्र महान्ति अपने टूटे हुए पान बारज से वहाँ पहुंचे, उनसे उनके बारज के बारे में मैंने जब पूछा तो उनकी आंखे नम हो गयी और बताया कि “29 जून की सुबह डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, एस.पी., ए.डी.एम., एस.डी.पी.ओ., कलेक्टर और थानेदार के साथ मिलकर पॉस्को के 60-70 गुंडे गॉव में घुस आये और सारे पान बारज तोड़ने लगे. सबसे पहले पुलिस ने पान बारजो की घेरा-बंदी की उसके बाद गुंडों ने उन्हें तोडना शुरू किया. जो ग्रामीण वहाँ काम कर रहे थे उन्हें जबरन मारते-पीटते और घसीटते हुए बराजो से बाहर फेंक दिया गया.

अधिग्रहण के समय मेरी माँ चंपा महान्ति उम्र 65 साल बराज में थी, पुलिस ने उन्हें विरोध करने पर घसीटते हुए बराज से बाहर कर दिया. मेरे विरोध करने पर ए.डी.एम.के कहने पर पुलिस ने मुझ पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए जहाँ एस.पी. और डी.एस.पी. खड़े होकर तमाशा देख रहे थे. उसके बाद तहसीलदार ने मुझे बुलाया और 1 लाख रूपये ज्यादा देने की पेशकश की. इन सभी के बीच जब मेरा फुफेरा भाई आया तो पहले तो कई पुलिसवालों ने उसे जमकर पीटा फिर एक दिन और रात के लिए थाने में रखा.

अब मुझ पर और पूरे गॉव के ऊपर ज़बरदस्ती ज़मीन बेचने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. गॉव के बहुत सारे लोगों को ज़बरदस्ती चेक थमाये जा रहे हैं. विरोध को दबाने के लिए पुलिस एक कैम्प लगाकर गॉव में जम गयी है और आये दिन ग्रामीणों से बदसलूकी करती रहती है. दो वक़्त की रोटी का ज़रिया सरकार ने हमसे छीन लिया है अब हमे आस-पास के गॉवो में मजदूरी करनी पड़ रही है.”

इसके बाद मैं बैरागी महान्ति के यहाँ खाने के लिए पहुंचा. बैरागी पिछले 7 साल से इसी आन्दोलन की वजह से बिस्तर पर हैं. उनके छोटा भाई कैलाश महान्ति पर 25  केस चल रहे हैं जिस कारण न तो वो आन्दोलन में शामिल हो पा रहा है और न ही कहीं जा पा रहा है. कैलाश की दो बेटियों की शादी हो चुकी है पर आज तक वो उनके घर मिलने नहीं जा सका  है.

खाना खाकर हम सभी लोग गोबिंदपुर की और चल दिए जहाँ सबसे पहले मेरी मुलाकात प्रतिमा दास के घर के बाहर चल रही बैठक में भमर से हुई. भमर बी.एस.सी. कर चुका था और अब अपने पान बारज में काम करता था. मुझे उसी से मुझे मालूम हुआ कि गॉव में साक्षर लोगो की संख्या ठीक-ठाक है. 12 डेसीमल बारज के मालिक भवर ने बताया कि 3 जुलाई को पुलिस के साथ मिलकर पॉस्को के गुंडों ने पहले उनकी माँ के साथ बदसलूकी की फिर उसकी भी बर्बरता से पिटाई की.

एस.डी.पी.ओ. ने उसे अपने पास बुलाया और बोला कि अगर तू खुद अपना पान बारज तोड़ देगा तो हम तुझे 2 डेसीमल के ज्यादा पैसे देंगे. भमर के मना करने पर उसने कहा कि अब हम तोड़ते है और देखते है कि हमें कौन रोकता है. भमर के ऊपर अभी 5 केस चल रहे हैं जो उसे स्वतंत्र रूप से आन्दोलन में हिस्सा लेने से रोक रहे हैं. रोजाना रात को 9 से 12  के बीच पुलिस के लोग पुरे गॉव में घूमते है और ग्रामीणों को परेशान करते हैं. भमर ने मुझे टूटे हुए पान बारजो की तस्वीरे दिखाई और अदालत में दाखिल याचिका की कापी भी, साथ ही एक पत्र भी जिसमे गॉव के हालातों के बारे में संशिप्त में लिखा था जिसको गॉव के कुछ लोगों ने निम्नलिखित विभागों में लगाया है-
1. National Commission for SC and ST, New Delhi.
2. Chief Minister Odisha.
3. Government of Odisha, Bhubaneswar.
4. Chief Secretariat of Odisha.
5. Collector Jagatsinghpur District.
6. RTC Central Division for Cuttack.
7. Minister of SC/ST Welfare.
8. Minister of SC/ST Odisha.

यहाँ जब में लोगो से बात कर रहा था तो पता चला कि कुछ लोग बारज टूटने के बाद से सदमे में है जिनमें से एक थी सुलोचना दास जो तभी से आतंक में है और हमेशा डरी हुई रहती है. अँधेरा अधिक हो जाने के बाद सभी लोग अपने-अपने घरों की और चल दिये, हम लोग रात को प्रतिमा दास के यहाँ रुके. यहाँ हमें उन्होंने बताया की पुलिस द्वारा लगाये गए कैम्प, बदसलूकी और मार-पिटाई से लोग आतंक में है. पूरी रात पुलिस के लोग गॉव में गश्त लगाते हैं. आन्दोलन धीरे-धीरे कमज़ोर होता जा रहा है. आये दिन पॉस्को समर्थक गॉव वालो को पी.पी.एस.एस.के खिलाफ भड़काते रहते है और तीनो गॉवो में फूट डालने की कोशिश करते रहते हैं.

अगले दिन मेरी मुलाकात आंदोलन में सबसे आगे रहने वाली बाल सेना के सैनिक जगन से हुई. 14 साल के जगन के चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी. बारज के बारे में पूछने पर बोला की “हमारा पान बारज टूट गया है हमारे पास सिर्फ यही था, सब कुछ ख़त्म हो गया है.” पूछने पर कि अब क्या करोगे उसने तुरंत ही जबाव दिया “आंदोलन करेंगे, लड़ेंगे और क्या ?”

अंत में मेरी मुलाकात इस आंदोलन की प्रमुख कड़ी में से एक और महिला प्रमुख मनोरमा खट्वा से हुई, उनके चहरे पर मुझे आत्मविश्वाश की चमक साफ दिखाई दे रही थी जिसकी इस आंदोलन को सबसे ज्यादा ज़रुरत है. अभय साहू और गोबिंदपुर के हालत के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि “अभय साहू के जेल में होने के कारण आंदोलन कमजोर बिल्कुल नहीं पड़ेगा और गोबिंदपुर के लोगों के साथ पटना, धिनकिया और पी.पी.एस.एस.के सभी साथी हैं. हम एक बार फिर से जिन लोगों की पान बारज टूटी है उन्हें ठीक करेंगे और आंदोलन में किसी भी तरह की फूट बिल्कुल नहीं पड़ने देंगे. अब यहाँ महिलाओं और बच्चों को प्रताड़ित किया जा रहा है. कोई भी ग्रामीण यहाँ से न तो बाहर जा सकता है और न ही अन्दर आ सकता है. लोग बीमार हो रहे है और बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे है.”

मेरे इस दौरे पर मैंने कई ग्रामीणों से बात की. घनश्याम महान्ति, शिशिर चन्द्र जना, बाबुल राउत, पालोक गोसांई, देवेन्द्र सवीन सभी लोग ज़मीन की इस लड़ाई में अकेले खड़े होकर अरबों रूपये की इस कंपनी और सरकार का विरोध कर रहे हैं. इस लड़ाई में कुछ लोग उनकी आवाज़ को उठा भी रहे हैं, लेकिन शायद अभी भी कमी है सामाजिक कार्यकर्ताओ, पत्रकारों और आप सभी की मेरी अपील है आप सभी से की ओडिशा में जो कुछ भी हो रहा है. उसमें आप यहाँ आकर ग्रामीणों के साथ मिलकर विकास के नाम पर विनाश की तरफ बढ़ रही सरकार और पूंजीपतियों के खिलाफ इस लड़ाई में उनका साथ दे.

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