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BeyondHeadlines > Latest News > मैं सुधरना नहीं चाहता…
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मैं सुधरना नहीं चाहता…

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published July 16, 2013 21 Views
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7 Min Read
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मन की बात कहूँ… अगर राजपूत बने रहने की कसौटी मेरी संवेदनाओं की आहूति है तो मैं ऐसी राजपूती शान को अपने पैरों तले कुचल देना चाहता हूँ. मुझे इस तरह का ‘राजपूत’ कहलाने का कोई शौक नहीं है. और न ही बहुत गर्व है कि मेरा इस कुल में जन्म हुआ है. मेरे कुछ पूर्वजों ने जो गलतियाँ की है उसकी सजा भुगतने के लिए मैं कतई तैयार नहीं हूँ…

Ashutosh Kumar Singh for BeyondHeadlines

खुशी की चाहत किसको नहीं होती. सब खुश रहना चाहते हैं. लेकिन अहम सवाल यह है कि खुशी आती कैसे है? उसका उद्गम स्थल क्या है? दुर्भाग्य हमारा! हम खुशी तो पाना चाहते हैं लेकिन खुशी देना नहीं चाहते. बांटना नहीं चाहते. खुशी पाने की तमीज़ भूल बैठे हैं. अपने अहंकार के चक्रव्यूह में हम इस क़दर उलझ चुके है कि दरवाजे पर आयी खुशी को भी दुत्कार देते हैं. अपने अहम भाव में हम इतने उलझे हुए हैं सुलझे हुए को भी उलझाने की कोशिश करते रहते हैं.

I do not want to be reformedये सारी बाते मैं इसलिये कर रहा हूं क्योंकि मैं खुद इन उलझे हुए लोगों की उलझन से बहुत परेशान हो चुका हूँ. एक छोटी सी घटना का जिक्र करना चाहता हूं (मैं नहीं जानता कि यह सही है कि नहीं, लेकिन जो है उसको बताना तो पड़ता ही है.) एक मित्र ने मुझसे कहा कि जो लोग दलितों के साथ रहते हैं वे भी पिछड़ जाते हैं… दलितों के साथ उठना बैठना… उस मित्र को अच्छा नहीं लगा.

उस मित्र ने एक और बात कही कि मुझमें राजपूती शान नहीं है. यहीं कारण है कि वह अपने बाकी मित्रों से मुझे मिलाता नहीं है. उसके मन में यह बात है कि मैं राजपूत खानदान में पैदा हुआ हूं तो मुझमें भी वहीं राजपूती शान (गंवारों की अहमवादी सोच का प्रतिफल) होनी चाहिए. मुझे भी वही गलती दुहरानी चाहिए, जिसे हमारे बाप-दादा करते आए हैं. शायद तभी सही मायने मैं ‘राजपूत’ कहलाने लायक बनूँगा. और ‘एक खास वर्ग’ में मुझे इज्जत मिलेगी.

सच में, अगर मैं अपने मित्र की सलाह मान लूँ और वैसा ही व्यवहार करने लगूँ जैसा मेरे पूर्वज करते थे तो आज का समाज क्या मुझे सिर-आँखों पर बिठा लेगा? मैं एक अलग वर्ग-वर्ण का कहलाउंगा!

अलग क्लास का कहलाना इतना सुखदायी है! क्या यह सब मान कर मैं 21 वीं सदी का मानव कहलाने के योग्य बन पाऊंगा! क्या समाज जिसमें मैं रहता हूं, जिसके बहुत से ऋण मुझ पर है वह मुझे एक जातिवादी इंसान के रूप में देखना चाहता है. वह मुझे ‘राजपूत’ के रूप में ही स्वीकारेगा! क्या मुझे ‘राजपूत’ बने रहने के लिए अपनी मानवीय संवेदनाओं को नष्ट कर लेनी चाहिए. क्या मैं अपनी संवेदनाओं को जीवित रखकर राजपूत बना नहीं रह सकता? इस तरह के अनेक सवाल है जो मुझे परेशान करने लगे हैं.

मन की बात कहूँ- अगर राजपूत बने रहने की कसौटी मेरी संवेदनाओं की आहूति है तो मैं ऐसी राजपूती शान को अपने पैरों तले कुचल देना चाहता हूँ. मुझे इस तरह का ‘राजपूत’ कहलाने का कोई शौक नहीं है. और न ही बहुत गर्व है कि मेरा इस कुल में जन्म हुआ है. मेरे कुछ पूर्वजों ने जो गलतियाँ की है उसकी सजा भुगतने के लिए मैं कतई तैयार नहीं हूं.

मेरे जिस दोस्त-साथी को लगता है कि मुझमें राजपूती शान की कमी है, वे अपनी शान बनाएं रखें. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें, मैं सुधरना नहीं चाहता…

वैसे भी जात के नाम पर चल रहे आडंबरों से मुझे बहुत घृणा होती है. मुझे किसी की सहायता करनी है, तो करनी है. जिस मित्र ने यह सलाह दिया था उसे मैं बौद्धिक स्तर पर बहुत ही परिपक्व समझता था. लेकिन वह इतना अपरिपक्व बात करेगा इसकी कल्पना मात्र से मैं सिहरा जा रहा हूँ. कुछ हद तक व्यथित भी हूँ.

21 सदी के पढ़े-लिखे लोगों के मन में भी जातिवादी अवधारणाएँ इस क़दर मज़बूत है, सुनकर दंग रह गया. ऐसे लोगों की सोच पर तरस आती है. आखिर ये लोग क्यों पढ़-लिखकर अपने को बुद्धिजीवी कहलवाने का ढ़ोंग कर रहे हैं? जिनके अंदर मानवीय संवेदना का स्थान नहीं वे बुद्धिजीवी कैसे हो सकते हैं? जिनमें जीवों के द्वंद्व को समझने की चेतना नहीं है वे सामाजिक कैसे हो सकते हैं? समाज को दिशा देने का काम कैसे कर सकते है?

ऐसे लोगों को यह समझ में नहीं आता है कि जीवन की इस धारा में सब का साथ ज़रूरी है. सबकी हँसी ज़रूरी है. सबका प्यार ज़रूरी है. यह तभी मिलेगा जब हममें सबके प्रति इस तरह का भाव होगा. भावशून्य होकर, इस बात की चाहत हम कैसे रख सकते है कि कोई मेरी भावना को समझे? अपनी भावना को समझाने के पूर्व हममें दूसरों की भावना समझने की ताकत भी तो होनी चाहिए.

मुझे दुःखद-आश्चर्य हो रहा है कि मेरा मित्र अपनी भावना के दबाव और प्रभाव में इतना कमजोर हो चुका है कि उसमें दूसरों की भावना को समझने की चेतना ही नहीं बची है.

इस भौतिक युग में इस तरह भावशून्य होना, अपने आप से जीवन को छीनने जैसा ही तो है. मानो हम जी-जी कर मरने की ओर न बढ़ रहे हो बल्कि मर-मर कर जीने की चाहत पाल बैठे हों. इस शून्यता में हमें यह तो दिखाई देता है कि हमारी बातों को दूसरा ख्याल नहीं रखता? लेकिन हम यह भूल जाते है कि क्या हम दूसरे के भावों को समझ पाए हैं!

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