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नरेन्द्र मोदी की यादें…

Pravin Kumar Singh for BeyondHeadlines

याद कभी इंसान का पीछा नहीं छोड़ता है. जब-तब यदा-कदा आता रहता है. आदमी पहले कुछ अच्छा किया होता है तो अपने भाई-बन्धुओं को बता कर उनसे अपनी वाह-वाही सुनकर खुश होता रहता है. वैसे वाह-वाही के हम सभी भूखे होते है. लेकिन यह कर्म फलेषु के अनुसार मिलता है.

क्या करे, इंसान कोई भूल किया होता है तो अफसोस और चिन्ता करता रहता है. उसकी भूल के बारे में सुनकर लोग उसे दिलासा देते रहते है. चलो कोई बात नहीं हर इंसान कोई न कोई भूल करता है. वो ऐसे ध्यान मग्न होकर सुनता है जैसे वो महाभारत का अर्जुन हो और समझाने वाला सचमुच भगवान श्रीकृष्ण…

हर इंसान गलती या पाप किया होता है. उस पाप की वजह से परलोक सिधारने के बाद स्वर्ग या जन्नत नहीं मिलने का खतरा रहता है. भला कौन नर्क का भागीदार बनना चाहेगा?

Memories of Narendra Modiफिर अगला जन्म व पुर्नजन्म खराब होने का भी खतरा है. कहीं पाप की वजह से अगले जन्म में इंसान से कीड़ा-मकौड़ा या कुछ और बन कर जन्म लिया तो मनुष्य होने का भौतिक सुख कहां मिलेगा? वैसे भी अपने देश में पुर्नजन्म के कितने किस्से-कहानियां हैं.

फिल्मों में करण अर्जुन की स्टोरी सबसे हिट है. आदमी अगला जन्म सुधारने के लिए क्या-क्या नहीं करता है. दान-पुण्य मन्दिर-मस्जिद, गुरूद्वारा पीर-पैगम्बर का चक्कर लगाता रहता है. अगर इससे भी संतुष्टि नहीं मिली तो बाबाओं के दर्शन और आशीर्वाद के लिए दौड़ता रहता है. वैसे भी टीवी पर दिन रात बाबाजी, ग्रह, नक्षत्र, साती, साढ़ेसाती और हर दैविक व भौतिक समस्या का सफल ईलाज बताते रहते है.

कुछ इंसान अपने पाप को सत्कर्म बनाने के प्रयास में रहते हैं. अगर अपने काम में सफल नहीं हुए तो कीचड़ में कमल का उदाहरण देते है. अर्थात् कमल की तरह अपने को निर्मल और कोमल दिखाते हैं. अब कमल बेचारे का क्या गुनाह। उनका तर्क सुनकर कमल क्या कुम्हला नहीं जायेगा.

गर्वीला शेर नरेन्द्र भाई मोदी को भी 2002 की याद यदा-कदा आ ही जाती है. इसमें क्या बुरा है? मोदी भाई तो राजधर्म के पुजारी हैं. एसआईटी का क्लीन चिट ने उनको मिस्टर क्लीन का उपाधि दिया है. लेकिन कोर्ट द्वारा दिया गया नीरो का उपाधि भी मिट नहीं पा रहा है.

जबकि मोदी भाई ने सत्य और असत्य के द्वंद में अपने पराये का गम भुलाकर युधिष्ठिर की तरह सत्य का साथ दिया. कौन ऐसा माई का लाल कर सकता है. मतलब, अरे भाई माया कोडवानी और बाबू बजरंगी के लिए फांसी की मांग किये. नरेन्द्र भाई को तारीफ बजाय निंदा क्यों? पर ऐसी न्याय-प्रियता से घर में बिभीषण बनने का खतरा ज्यादा हो जाता है.

मोदी भाई का नरम दिली देखिये… पिल्ले को गाड़ी से दबने का गम भी दबा नहीं पाये. इसलिए स्वयं ड्राईविंग नहीं करते है कि पता नहीं कौन गाड़ी के नीचे दब जाय. ग़म का गुबार मीडिया में निकाल दिये. नरेन्द्र भाई के नरम और कोमल दिल का लोग चटकारे लेने लगे. जैसे दिल नहीं खिलवाड़ हुआ.

मोदी भाई ने उत्तराखण्ड में आये सैलाब में तीर्थयात्रीओं को फंसा देखा तो जान की बाजी लगाकर 15 हजार गुजराती तीर्थयात्रीओं को बचाया. यह आपदा राहत कार्य के इतिहास में कीर्तिमान है. मोदी भाई ने राहतकार्य में आर्मी को भी पीछे छोड़ दिया. इसके लिए नरेन्द्र भाई को सम्मानित करना चाहिये.

लेकिन क्या कहें नासपिटों नामुरादों को कोई 15 हजार की संख्या पर चकित हो रहा है तो कोई गुजरातीओं के बचाने पर क्षेत्रीयता का सतही आरोप लगा रहा है. 50 की जान बचाया या 50 हजार क्या फर्क पड़ता है. उसके जोड़ घटाना के गणित में क्या रखा है. जिनकी जान बची वो तो मोदी भाई की जय जयकार करेगें. जो वहां गुजराती नहीं थे उसके लिए मोदी भाई का क्या दोष है. वैसे चिन्ता न करे नरेन्द्र भाई पूरे देश को गुजरात बनाने का सपना देख रहे है. यह क्षेत्रीयता नहीं, राष्ट्रीयता है भाई!

नरेन्द्र भाई का ब्रांडिंग कंपनी एपको उनके दरियादिली के फार्मूले को पूरे देश में पहुंचानें में लगा हुआ है. अब वो दरियादिली भी किस काम की जो लोगो के सीधे दिल में न प्रवेश कर जाय. वैसे भी ब्राडिंग का ज़माना है. जब कोलड्रिंक पीने से इंसान फौलादी बन जाता है तो भला मोदी भाई पीछे क्यों रहें. राजनीति और एक्टिंग दोनों में विज्ञापन जरूरी है. वैसे भी एक्टर नेता का रोल निभाते रहते है और नेता तो साक्षात् एक्टिंग करते हैं. बस एक में जनता का मनोरंनजन होता है दूसरे में जनता स्वयं मनोरंजन बन जाती है. सब खेल तो जनता के लिए है. अब देखना है जनता किसको पसन्द करती है?

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