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Reading: ख़ालिद मुजाहिदः सीधे सवालों से क्यों बच रही है सरकार?
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BeyondHeadlines > Exclusive > ख़ालिद मुजाहिदः सीधे सवालों से क्यों बच रही है सरकार?
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ख़ालिद मुजाहिदः सीधे सवालों से क्यों बच रही है सरकार?

Beyond Headlines
Beyond Headlines Published August 30, 2013 23 Views
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8 Min Read
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Afroz Alam Sahil

इंडियन मुजाहिदीन के कथित आंतकवादी ख़ालिद मुज़ाहिद की पुलिस हिरासत में मौत एक ऐसा मामला है जिस पर यूपी की अखिलेश सरकार पर्दा डाल देना चाहती है.  लेकिन सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी रिहाई मंच का प्रदर्शन 100 दिन पूरे करने के बाद भी जारी है.

BeyondHeadlines ने ख़ालिद मुजाहिद की मौत से जुड़े तमाम तथ्य जनता के सामने लाने की कोशिश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय व गृह-गोपन एवं कारागार प्रशासन से सूचना के अधिकार के तहत कुछ अहम सवालों के जवाब चाहे.

No Information from Chief Minister Office on Financial Help: Khalid Mujahid’s Familyहमने ख़ालिद मुजाहिद की हत्या की सीबीआई जाँच का आग्रह पत्र, उनके परिवार को दिए गए मुआवज़े (जो मुख्यधारा की मीडिया की सुर्खियों में रहा) से संबंधित तमाम दस्तावेज़, तारिक़ क़ासमी और ख़ालिद मुजाहिद के ऊपर से मामले हटाए जाने के संबंध में फ़ैजाबाद की अदालत में दाख़िल किए गए दस्तावेज़ और विभिन्न संगठनों द्वारा सरकार को इनकी रिहाई के संबंध में लिखे गए दस्तावेज़ों की कॉपी माँगी थी.

हमने बाराबंकी में हुए ख़ालिद मुजाहिद के पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट की कॉपी तथा निमेष कमीशन की रिपोर्ट की अधिकारिक कॉपी (इस रिपोर्ट की गैर अधिकारिक कॉपी BeyondHeadlines के पास पहले से मौजूद है) भी माँगी थी.

लेकिन यूपी सरकार और गृह विभाग ने बेहद सरल सवालों के जबाव देने के बजाए इनसे बचने की हर संभव कोशिश की.

जब हमारी आरटीआई के आवेदन का तय समय में जबाव नहीं आया तो हमने प्रथम अपील दायर की, जिसके बाद वक़्त ज़ाया करने की कोशिश में हमारे आवेदन को अन्य विभागों में प्रेषित कर दिया गया.

BeyondHeadlines की आरटीआई गृह विभाग के प्रमुख सचिव व मुख्यालय पुलिस महानिदेशक, उप सचिव गृह (पुलिस) अनुभाग, उत्तर प्रदेश और पुलिस महानिदेशक लखनउ जोन, लखनउ परिक्षेत्र के समस्त अपर पुलिस अधीक्षक के दफ़्तर, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फैज़ाबाद के दफ़्तर और लखनउ परिक्षेत्र व फैज़ाबाद के पुलिस उप महानिरीक्षक कार्यालय के चक्कर काटती रही.

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक फैज़ाबाद ने अपना पल्ला झाड़ते हुए याचिका को पुलिस अधीक्षक बाराबंकी, सुल्तानपुर, अम्बेडकर नगर और अमेठी को प्रेषित कर दिया. एक दूसरे पर टालने का सिलसिला यहीं नहीं रूका. बल्कि आगे भी सभी अपने निचले दफ्तरों को भेजते रहें. पुलिस अधीक्षक अमेठी ने इस आरटीआई को थाना गौरीगंज, थाना मुन्शीगंज, थाना जामो, थाना अमेठी, थाना पीपरपुर, थाना संग्रामपुर, थाना जायस, थाना मोहनगंज, थाना शिवरतगंज, थाना फुरसतगंज, मुसाफिरखाना के सारे थाना प्रभारियों को भेज दिया. और जवाब में सबका कहना है कि उनके कार्यालय में सूचना शुन्य है.

दिलचस्प है कि बाराबंकी पुलिस निरीक्षक ने भी जवाब में बताया कि कोई सूचना उनके पास नहीं है. बस पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बारे में कहा कि उसे रिकोर्ड कीपर से हासिल किया जा सकता है.

सिर्फ गृह (पुलिस) अनुभाग-4 ने बताया कि श्री खालिद मुजाहिद की हत्या/मृत्यु की जांच सी.बी.आई. से कराए जाने हेतु शासनादेश संख्या-01 सी.बी.आई./ छ:-पु. -4-13-17(65)बी/ 13 दिनांक 19.05.13 द्वारा सचिव, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली से अनुरोध किया गया है.

ख़ालिद मुजाहिद की मौत के तथ्यों के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया है कि अभियुक्त खालिद मुजाहिद थाना- कोतवाली नगर, फैजाबाद में दर्ज मु.अ.सं.-3398/2007 धारा-302/307/121/121ए भा.दं.वि. व 3/4/5 विस्फोटक पदार्थ अधिनियम आदि में आरोपी था. दिनांक 18-05-2013 को उसे लखनउ जिला जेल से फैजाबाद में न्यायालय में पेशी पर ले जाया गया था तथा उसे लखनऊ वापस ले जाया जा रहा था. रास्ते में कथित रूप से उसकी तबीयत खराब होने पर जब उसे जिला अस्पताल, बाराबंकी में इलाज हेतु लाया गया तो उसे चिकित्सक द्वारा मृत घोषित कर दिया गया. इस संबंध में मु.अ.सं.-295/2013 धारा-302/120 बी भा.दं.वि. पंजीकृत किया गया, जिसकी विवेचना प्रचलित है.

सी.बी.आई. को जाँच सौंपने का कारण ख़ालिद मुजाहिद की मौत का कारण स्पष्ट न होना बताया गया है. साथ ही यह भी बताया गया है कि स्थानीय पुलिस भी मामले की विवेचना कर रही है.

लेकिन सबसे अहम सवालों का जबाव टाल दिया गया है. ख़ालिद मुजाहिद के परिवार को मुआवज़ा देने के बारे में युपी सरकार ने कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं करवाई है. इस मुआवज़े को लेकर हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक याचिका भी दायर की गई है.

अब सवाल यह उठता है कि आख़िर उत्तर प्रदेश सरकार ख़ालिद मुजाहिद की मौत से जुड़े तथ्यों को सामने लाने से क्यों डर रही है. ऐसा क्या है जिसे छुपाने की कोशिश की जा रही है.

गौरतलब है कि ख़ालिद मुजाहिद की मौत के बाद से ही रिहाई मंच इस मामले में न्याय की माँग को लेकर धरना कर रहा है. 100 दिन के बाद भी धरना जारी है, लेकिन सरकार की ओर से इस दिशा में अभी कोई भी सकारात्मक क़दम नहीं उठाया गया है.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न उपलब्ध करवाना सरकार के छुपे मंसूबों की ओर भी इशारा करता है.

दरअसल, यह मुद्दा अब यूपी सरकार के गले की फाँस बन गया है. लोकसभा चुनाव सिर पर हैं और उत्तर प्रदेश के मुसलमान ख़ालिद मुजाहिद के साथ हुए अन्याय को अपने साथ हुआ अन्याय मान रहे हैं. यूँ तो पुलिस रिकार्डों में ख़ालिद मुजाहिद कथित आतंकी है, लेकिन समुदाय की नज़र में वो एक  बेगुनाह है जो पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के मुसलमानों के प्रति स्थापित नकारात्मक नज़रिए की भेंट चढ़ गया.

जैसा कि निमेष आयोग रिपोर्ट में उल्लेखित है, यदि ख़ालिद मुजाहिद की मौत का सच सामने आ गया तो यूपी सरकार के सामने मुश्किल हालात पैदा हो जाएंगे.

वैसे भी बेगुनाहों की मौतें अक्सर सरकारों की सत्ता हिलाती रही हैं. और ख़ालिद मुजाहिद की मौत के बाद मुस्लिम समाज का एकजुट होना और नेताओं का घेराव करना यह संकेत दे रहा है कि आने वाले वक्त में यह मामला यूपी सरकार के लिए और मुश्किलें पैदा करेगा.

इस मामले से उठे सवालों के यदि जल्द जबाव नहीं मिलें तो सरकार के प्रति बढ़ रहे असंतोष का नतीज़ा चुनावों में भी नज़र आ सकता है. यूँ भी ऐसी सरकार का समर्थन कौन करना चाहेगा जिसमें बेगुनाह पुलिस हिरासत में मारे जाते हों और सरकार के मुखिया विरोध के आवाज़ों से आँख-कान मूँद कर तुष्टिकरण की नीति पर निर्भर रहते हों.

चलते-चलते बस इतना ही कहेंगे कि हर बेगुनाह की मौत से जुड़े तथ्यों को सामने लाने की BeyondHeadlines की कोशिशें जारी रहेगी.

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