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खुर्शीद अनवर की बेईमान पत्रकारिता का सुबूत “बांग्लादेश के युद्ध अपराधी”

Ziyaul Islam for BeyondHeadlines

एक साहब हैं खुर्शीद अनवर, उन्हें आज कल जनसत्ता ने इस्लाम और मुसलामानों के खिलाफ लिखने की सुपारी दी हुई है. कुछ भी लिखेंगे कुछ भी बकेंगे… आज (24 September 2013) बांग्लादेश में जमाअत-ए-इस्लामी के बारे में घटिया भाषा में बौद्धिक उलटी की है. ऐसा लग रहा है कि किसी गुंडे की गोद में बैठ कर कमजोर दुश्मन को गरिया रहे हों.

उन्हें पता है कि जनसत्ता कभी दूसरा पक्ष छापता ही नहीं. ख़ास तौर पर जब मुद्दा इस्लाम और मुसलामानों से सम्बंधित हो. ज़रुरी है कि दुनिया भर में बांग्लादेश में 1971 की घटनाओं के बारे में दुसरे पक्ष के बारे जो कुछ लिखा जा रहा है. उसे भी सामने रखा जाय. ये ज़रूरी नहीं है कि जमाअत-ए-इस्लामी दूध की धुली हो, लेकिन शेख मुजीबुर्रहमान और मुक्ति वाहिनी के काले कारनामें भी कम नहीं हैं.

खुर्शीद अनवर अपने लेख में बुनियादी तौर पर जमात के खिलाफ भड़ास निकालते हुए ये भूल जाते हैं कि न्याय और मानव अधिकार और सभ्यता के सारे उसूल जमाअत-ए-इस्लामी का नाम आते ही ख़त्म नहीं हो जाते. जमाअत-ए-इस्लामी से उन्हें सैंधान्तिक विरोध है और वो कोई अकेले व्यक्ति या अकेले मुसलमान (वो स्वयं को मुसलमान नहीं कहते हैं, लेकिन जनसत्ता में उनके लेख की USP उनके मुसलमान नाम से ही है) नहीं हैं और उनके विरोध का सम्मान है.

लेकिन विरोध करते-करते जिस अभद्र भाषा के प्रयोग पर वो उतर जाते हैं और फिर उसी किस्म के किस्से कहानी सुनाने बैठ जाते हैं, जैसे जॉर्ज बुश ने आतंकवाद के विरोध में और भाजपा ने पोटा के लिए गढ़े थे.

झूठे आरोपों में वो भी शेख हसीना वाजिदा के सियासी खेल में शामिल हो गए हैं और एक आदमी पर हज़ारों औरतों के बलात्कार का आरोप लगाते समय ये भी ख्याल नहीं करते हैं की क्या ये संभव है भी या नहीं?

इसमें कोई दो राय नहीं कि जमाअत-ए-इस्लामी का ये अपराध है कि इसने बंग्लादेश बनाने का विरोध किया और ये उसकी अपनी उस विचारधारा की वजह से था, जो इसने राष्ट्रवाद के खिलाफ तैयार की थी और जिसकी वजह से इसने शुरुआत के दिनों में पाकिस्तान बनाने का भी विरोध किया था. लेकिन बाद में इसका समर्थन कर दिया था.

article in jansattaराष्ट्रवाद के विरोध में जमाअत-ए-इस्लामी अकेला संगठन नहीं था. बीसवीं सदी में जब मुस्लिम राज्य का पतन हो गया तो सारी दुनिया में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए कई आन्दोलन खड़े हुए और उन सभी आंदोलनों ने राष्ट्रवाद का विरोध किया और एक वैश्विक इस्लाम का नज़रिया बनाया, जिसमें ज़्यादातर आन्दोलन फेल हो गए, लेकिन इस्लामी राज्यों के बीच में सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनने लगे जिसमें आर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कांफ्रेंस और अरब लीग प्रमुख हैं.

इस्लामी राज्य और राष्ट्रवाद में सीधा टकराव कभी भी नहीं बताया गया बल्कि मुस्लिम ब्रदर के संस्थापक हसन अल बनना ने राष्ट्र को इस्लाम का अंग बताया था. साथ ही उन्होंने भाषाओं के बारे में भी यही बात कही. जमाअत-ए-इस्लामी के संस्थापक अबुल आला मौदूदी ने उर्दू के अलावा भाषाओं के खिलाफ या उनके भाषाई राष्ट्रीयताओं के खिलाफ थे. ऐसा कहीं नहीं पाया जाता, लेकिन इतना ज़रूर है कि बंगलादेश की त्रासदी में दक्षिण एशिया में वर्चस्व की जंग में जुटे भारत और पाकिस्तान का पूरा योगदान है.

खुर्शीद अनवर बाताएं कि क्या अगर सन 1947 में ही बांग्लादेश को एक अलग देश घोषित कर दिया जाता तो क्या भारत अलग बांग्लादेश का समर्थन करता? कभी नहीं करता! इसी वर्चस्व की लड़ाई में कश्मीर नाम का इलाका पिस रहा है, जहाँ पाकिस्तान परदे के पीछे बांग्लादेश में अपनी हार का बदला ले रहा है. राष्ट्रवाद अपने आप में इस टकराव को जन्म देता है.

जमाअत-ए-इस्लामी की इस समझ के मुताबिक़ शायद 1947 में बंटवारा होता ही नहीं और एक विशाल हिन्दुस्तान बनता. लेकिन जाहिर है कि राजनीति तमन्नाओं का नाम नहीं है. खुर्शीद अनवर ने मौदूदी की किताब अल-जिहाद फिल इस्लाम के कितने पेज पढ़े हैं ये तो नहीं मालूम, लेकिन जिस तरह से उन्होंने “गैर-इस्लामी विचारों को कुचल दिया जाए और कुरान की मुखालफत करने वाले लोगों का ज़मीन से सफाया कर दिया जाए” का नतीजा निकाला है उससे ये समझा जा सकता है कि उन्होंने कुछ भी नहीं पढ़ा है. वरना वो ये ज़रूर जानते कि मौदूदी ने अपनी की किताबों में इस्लामी राज्य में गैर-मुस्लिम नागरिकों के अधिकारों पर लिखा है, जिसमें उन्होंने मंदिर बनाने, पूजा करने, स्कूल बनाने, अपनी भाषा में शिक्षा समेत तमाम अधिकारों की बात की है.

लेकिन ये कोई नई बात नहीं थी. मौदूदी ने वही दुहराया जो पुरानी किताबों में अरबी फ़ारसी में लिखा पड़ा है. खुर्शीद अनवर का कहना है “अहमदिया का कत्लेआम तो खुद मौदूदी ने करवाया” इस तथ्य की जांच अवश्य होनी चाहिए. लेकिन इस के सहारे जो फर्जी सन्दर्भ वो बनाकर बांग्लादेश की जमाअत-ए-इस्लामी को अपराधी क़रार देने की मुहिम पर जुटे हैं, वो उनके काम नहीं आएगी.

बाकी अपने लेख में खुर्शीद अनवर ने उन अपराधी गतिविधियों पर बात की है, जो अवामी लीग के बारे में उतनी ही सच है. लेकिन हिंसा का आरोप कोई भी अपने सर पर लेने को आमादा नहीं होता है.

सवाल ये है कि 1971 की घटना में जो लोग मरे क्या वो सब के सब आवामी लीग के कार्यकर्ता  थे? क्या उसमें अन्य लोग नहीं मारे गए? क्या उसमें उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसलमानों का दमन नहीं किया गया? क्या उनकी औरतों का बलात्कार नहीं किया गया? और आज भी उर्दू बोलने वाले बिहारी मुसलमान दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रह रहे हैं, क्या इस पर भी चिंता की ज़रूरत है खुर्शीद अनवर के लिए?

ये घटनायें एक असामान्य और राजनितिक थीं, जिसमें पाकिस्तान, बांग्ला अवाम और भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी शामिल था. जिन हत्याओं और बलात्कार के लिए एक से ज्यादा देशों के लोगों पर आरोप हों, उसके के लिए मुक़दमा एक अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ही चलाया जाना चाहिए था.

मुख्य सवाल यहाँ ये है कि जिन घटनाओं को खुर्शीद अनवर पूरे विश्वास के साथ जमात इस्लामी पर मढ़ रहे हैं, और इसके आड़ में जमाअत-ए-इस्लामी और अन्य मुस्लिम संगठनों को अपराधी क़रार देने पर तुले हैं. उनके लिए क्या ये ज़रूरी नहीं हैं कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, मानव अधिकार संगठनों की रिपोर्टों को भी सामने रखा जाय. एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वाच की कई रिपोर्टों ने बांग्लादेश के वार ट्रिबुनेल पर जायज़ सवाल उठाये हैं.

अब खुर्शीद अनवर उनको जमाअत-ए-इस्लामी का सदस्य न कह दें, इसलिए उन लोगों के बयान भी देखने चाहिए, जिन्होंने इन घटनाओं का गहराई से खुद जाकर जायजा लिया है.

रिचर्ड सेस्सोन और लियो रोज़ ने अपनी कैलिफोर्निया विश्विद्यालय से छपी अपनी पुस्तक War and Secession Pakistan, India, and the Creation of Bangladesh में जो वर्णन दिया है क्या उसे खुर्शीद अनवर कूड़ेदान में डाल देंगे? 2011 में शर्मीला बोस की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस से Dead Reckoning: Memories of the 1971 Bangladesh War नाम की विवादित किताब लिख कर हलचल मचा दी थी.

उन्होंने अवामी लीग द्वारा किये जा रहे जमात विरोधी दावों को चैलेंज किया था. दुनिया भर में बांग्लादेश के कथित वार ट्रिबुनेल के खिलाफ जायज़ आपत्तियां की गई हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि खुर्शीद अनवर ने तय कर लिया है कि अवामी लीग दूध की धुली हुई है और जमाअत-ए-इस्लामी का जन्म सिर्फ जंगी अपराध करने के लिए हुआ था.

जिस तरह से खुर्शीद अनवर अपने विचारों को विरोध के बावजूद पढ़े जाने, समझे जाने और उस पर आजादी से बात किये जाने की उम्मीद करते हैं. उसी तरह से उन्हें दुसरे को भी यही मौक़ा देना चाहिए और दूसरों का भी सम्मान करना चाहिए. विचारों की दुनिया में हिटलर बनने की चाहत किसी की पूरी नहीं हुई है और खुर्शीद अनवर को भी वैचारिक हिटलर बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए.

पाठकों के लिए बांग्लादेश में जंगी अपराध के खिलाफ दूसरा पक्ष समझने के लिए निम्न लिखित लेखों की लिस्ट दी जा रही है जो जमाअत-ए-इस्लामी या उनके सदस्यों ने नहीं तैयार की है. इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन हैं. कई देशों की सरकारें हैं. कई अकादमिक हस्तियाँ हैं. कई डिप्लोमेट हैं. जिसमें उन घटनाओं के बारे में अवामी लीग के प्रोपगंडा अभियान के अलावा दूसरी तस्वीर देखने को मिल सकती है.

(ज़ियाउल इस्लाम मुंबई स्थित युवा ब्लॉगर, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और आईटी प्रोफेशनल हैं, उनसे [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है.)

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